राजस्थान में तो प्लॉट के लालच में पत्रकार बनने लगे लोग!

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पत्रकारों को रियायती दर (बाजार भाव से पच्चीस गुना कम में) भूखंड देने की योजना ने लोगों को पत्रकार बनने पर मजबूर कर दिया है। चाय वाला, टाइप वाला, मोबाइल वाला, पेपर वाला, फोटोग्राफर सभी पत्रकार बनने की दौड़ में शामिल है। यही वजह है कि समाचार पत्रों की संख्या बढ़ती जा रही है। गत दिनों उदयपुर में भूखंड देने के लिए आवेदन जमा कराने वालों में मोबाइल शॉप, दवाई की दुकान, डॉक्टर, हैंडीक्राफ्ट माफिया, समाचार पत्र में काम करने वाले विज्ञापन विभाग, मार्केटिंग, यूनिट हैड और उनकी पत्नियां भूखंड लेने वालों में शामिल है। ऐसे लोगों की बाजार में खूब थू-थू हो रही है।

जनप्रतिनिधि भी इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि कौन पत्रकार है और कौन नहीं है। हालाकि यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर पत्रकार कौन है? जिसकी आजीविका सिर्फ पत्रकारिता है या फिर मोबाइल शॉप, पेपर शॉप, मीडिया मैनेजमेंट, मार्केटिंग करने वाले, लोगों को ब्लैकमेल करने वाले। मासिक, पाक्षिक व साप्ताहिक पत्रिका निकालने वालों ने भी जमीन अपने नाम कराने के अलावा अपने पत्नी, संतान और रिश्तेदारों के नाम भूखंड लेने के लिए आवेदन कर दिए हैं। इस बात का खुलासा हुआ तब हुआ जब श्रमजीवी पत्रकारों ने इसका विरोध किया और कुछ ने मामले को कोर्ट में चुनौती दे डाली। कोर्ट ने यूआईटी से सभी आवेदन पर आपत्ति मांगने के निर्देश दिए। यूआईटी ने सभी आवेदकों की सूची अखबार में प्रकाशित करवा दी। यह सूची पढ़कर लोग इन पर थू-थू कर रहे हैं। शहर के सीनियर पत्रकारों के दोस्त भी पत्रकार बनकर भूखंड लेने के लिए आवेदन कर चुके हैं।

विभिन्न चैनल्स और कुछ दिन बड़े अखबारों की नौकरी कर पत्रकार का ठप्पा लगाने वाले पत्रकार माफियाओं ने लोगों को फ्री में भूखंड दिलाने का ठेका ले लिया है। पत्रकारों को मिलने वाले फ्री भूखंड की बाजार कीमत बीस लाख तक है जो पत्रकारों को एक से डेढ़ लाख रुपए में मिल रहे हैं। पत्रकार संगठनों के कुछ पदाधिकारियों ने लोगों को भूखंड दिलाने के नाम पर पचास हजार से एक लाख रुपए तक की रिश्वत ली है। ये सभी भ्रष्ट पत्रकार राजनीतिक कार्यक्रमों, प्रेस कांफे्रंसों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर पत्रकार होने का दावा पेश करते हैं। विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, व्यवसायिक संगठनों की प्रेस कांफे्रंस करवाने वाले कथित लोग जो खुद को पत्रकार मानते हैं, से प्रेस कांफे्रंस में नहीं बुलाने पर झगड़ा तक कर लेते हैं। इससे उनको दोहरा फायदा होता है। उनके पत्रकार होने का दावा मजबूत होने के साथ गिफ्ट भी मिल जाता है। मेरा सभी वरिष्ठ पत्रकारों साथियों से निवेदन है कि राष्ट्रीय स्तर पर श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा तय होनी चाहिए ताकि माफिया किस्म के लोग इस ईमानदारी वाले पेशे को बदनाम नहीं कर सके।
 

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