राजुल माहेश्वरी शर्म करो, अजय अग्रवाल और उनके अखबार ‘डीएलए’ से सबक लो

कभी राजुल माहेश्वरी, अजय अग्रवाल, अशोक अग्रवाल आदि एक हुआ करते थे. सभी अमर उजाला अखबार के मालिक हुआ करते थे. स्व. अतुल माहेश्वरी ने अपने जिंदा रहते हुए जाने क्या सोचा कि सब छिन्न भिन्न हो गए. पहले अजय अग्रवाल फिर अशोक अग्रवाल को अमर उजाला से अलग कर दिया गया. बाद में अतुल माहेश्वरी का निधन हो गया. अब सिर्फ राजुल माहेश्वरी हैं जो अमर उजाला के सर्वेसर्वा हैं. कहने को तो यह राजुल माहेश्वरी के लिए निजी तौर पर बहुत बड़ी उपलब्धि है कि वे इतने बड़े अखबार के अकेले मालिक हैं लेकिन पत्रकारिता और मीडिया के लिहाज से देखा जाए तो यह अमर उजाला के बुरे दिन की शुरुआत भी है.

अतुल माहेश्वरी में संपादकीय समझ और मीडिया वाली दबंगई खूब हुआ करती थी. उन्हें ऐसे मालिकों में शुमार किया जाता था जो खुद एक अच्छे पत्रकार भी थे. किस चीज को कैसे छापना है और किस मसले पर क्या स्टैंड लेना है, यह अतुल माहेश्वरी चुटकियों में तय कर लिया करते थे. अतुल माहेश्वरी के बाद संपादकीय समझ के मामले में अजय अग्रवाल का नाम लिया जाता है. अजय अग्रवाल को जब जबरन अमर उजाला से अलग किया गया तो अलगाव के चलते मिले पैसे के एक हिस्से से इन्होंने डीएलए अखबार का प्रकाशन आगरा समेत कई जगहों से किया. इस डीएलए अखबार में अमर उजाला, गोरखपुर के पत्रकार धर्मवीर की पिटाई की खबर विस्तार से प्रकाशित हुई है और एसएसपी के सस्पेंसन की मांग की गई है.

सोचिए, अमर उजाला ने अपने पत्रकार की पिटाई व विरोधस्वरूप शुरू हुए आंदोलन की एक लाइन खबर भी अपने यहां प्रकाशित नहीं की लेकिन जिन अजय अग्रवाल को अमर उजाला से अलग किया गया उन्होंने पत्रकार की पिटाई के मसले को अपने अखबार में प्रमुखता से छापा. थोड़ी भी संपादकीय समझ रखने वाला व्यक्ति जानता है कि अगर कोई पत्रकार बिना वजह पिटता है तो उसके लिए अगर हम नहीं लड़े, एकजुट नहीं हुए तो कल के दिन पीटने वालों का हौसला इतना बढ़ेगा कि वे अखबार के दफ्तर में घुसकर मारेंगे और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा. साथ ही ये भी कि इस लोकतंत्र में किसी भी पुलिस अधिकारी को बिना वजह किसी को पीटने का अधिकार नहीं दिया गया है.

अगर किसी की बाइक सड़क पर खड़ी है तो आप उसका चालान करिए, उसके खिलाफ मुकदमा लिखिए…. ऐसे कैसे हो सकता है कि आप उसे सड़क पर गिरा गिरा कर पीटना शुरू कर दें. पर इतना सब होने के बावजूद अमर उजाला वालों की कलम नहीं खुली न चली. अमर उजाला प्रबंधन एसएसपी के पक्ष में खड़ा रहा. एसएसपी ने मौखिक माफी मांग ली और अमर उजाला प्रबंधन गदगद हो गया. यह सब और कुछ नहीं बल्कि अमर उजाला के पतन की शुरुआत है. इस अखबार का हश्र क्या होना है, अब सबको पता चलने लगा है. इस अखबार को कोई अंबानी कई सौ करोड़ रुपये में खरीद लेगा और राजुल माहेश्वरी थोक में ढेर सारा पैसा लेकर अपनी नई दुनिया बसाने चल पड़ेंगे.

यूपी में तेजस्वी अखबार माना जाता था अमर उजाला. पर यह अखबार अपने वर्तमान कारनामे के कारण खासकर पत्रकारों की नजर में गिरने लगा है. राजुल माहेश्वरी को चाहिए कि वे अजय अग्रवाल और उनके अखबार डीएलए से सबक लें और अब भी अपनी गल्ती सुधारते हुए अपने पत्रकार की पिटाई की खबर छापते हुए एसएसपी को दंडित कराने के लिए अभियान छेड़ दें. सबको पता है, राजुल माहेश्वरी ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करने के लिए जो बुनियादी साहस व हिम्मत चाहिए होती है, शायद वो इनमें नहीं है या होते हुए भी भुला दिया है. फिलहाल हम यहां डीएलए अखबार में प्रकाशित खबर की कटिंग प्रकाशित कर रहे हैं…

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