रामविलास पासवान वाली स्थिति ना हो जाए अरविंद केजरीवाल की

दिल्ली में सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से महज सात पायदान दूर रहे आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा न तो किसी को समर्थन देने और न किसी से समर्थन लेने का अडिग फैसला और दिल्ली की जनता को एक बार फिर मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने की उनकी मंशा उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। अरविंद चाहते तो वह बिना शर्त कांग्रेस या बीजेपी के समर्थन से सरकार बना सकते थे पर उन्होंने ऐसा न करने का फैसला लेकर दिल्ली को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेल शायद अपने और अपनी पार्टी के पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली है। 
 
कहीं ऐसा तो नहीं कि केजरीवाल ने अपनी पार्टी को सरकार में आने पर दिल्ली की जनता से प्रति परिवार प्रतिदिन 700 लीटर पीने का पानी और वर्त्तमान से आधे दर पर बिजली देने का जो वादा किया था उसे पूरा ना करने की सम्भावना को देखते हुए उन्होंने सरकार बनाने का फैसला नहीं किया क्योंकि दिल्ली के लिए ही क्या ये किसी राज्य में सरकार बनाने वाले किसी दल के लिए संभव नहीं हैं. 
 
भारत के लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास में यह 70 के दशक से ही देखा जा रहा है कि जिस दल या उसके नेता ने देश या किसी राज्य को अपनी हठधर्मिता के कारण मध्यावधि चुनाव की आग में धकेला उसका हश्र क्या हुआ। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘आप’ का भी हश्र कहीं लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान की तरह न हो जाए जिन्होंने बिहार में फरवरी-2005 के चुनाव के बाद ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर काम कर अपने 29 निर्वाचित विधायकों और अपने ‘बंगले’ की चाबी लेकर गायब हो गए। बाद के मध्यावधि चुनाव चुनाव में स्थिति स्थिति यह हुई कि रामविलास अपने बंगले के चौकीदार भी ना रह सके। राजद से अलग होकर लड़े और बिहार के 29 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का परचम लहराने वाले रामविलास अगर उस वक्त नीतीश कुमार को समर्थन दे देते तो बिहार में ना तो राष्ट्रपति शासन लगता ना ही बिहार के लोगों को आठ माह बाद मध्यावधि चुनाव का दंश झेलना पड़ता। अक्टूबर-2005 में हुए मध्यावधि चुनाव में जहां रामविलास पासवान को 10 सीटों पर तो 2010 के चुनाव में महज 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा उसमें भी उनके तीन विधायक बाद में जदयू में शामिल हो गए। 
 
मध्यावधि चुनाव से आजिज जनता का मूड बदलने में देर नहीं लगता इसका उदाहरण इंदिरा गांधी के जमाने से देखा जा रहा है वो भी तब जब इतनी महंगाई नहीं थी। 1974 में बिहार से शुरू हुए छात्र आंदोलन के बाद तत्कालीन र्प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में आपातकाल लगाया तो जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश में जोरदार आंदोलन चला और जनता पार्टी की नींव पड़ी। 1977 में हुए 6वें लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी 298 सीटें जीतकर सत्ता में आई। यहां तक कि इस चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी दोनों अपने संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार गए थे और कांग्रेस अपने छह सहयोगी पार्टियों के साथ महज 153 सीट पर ही सिमट कर रह गई थी। पर इसी जनता पार्टी ने जब ढाई साल बाद यानी 1980 में देश की जनता पर मध्यावधि चुनाव का बोझ डाला तो जनता ने फिर से कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों को 353 सीट से विजेता बना अपार बहुमत देकर यह संकेत दिया कि जनता चुनाव का ज्यादा बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस चुनाव में जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल महज 31 और चरण सिंह की अगुवाई वाली जनता पार्टी (सेक्युलर)और उनके सहयोगी दल महज 41 सीट पर सिमट कर रह गए थे। 
 
जिस तरह दिल्ली में ‘आप’ को 28 सीटें दिलाने में युवाओं की बड़ी भूमिका रही कभी इसी तरह 1977 में जनता पार्टी को देश की सत्ता में लाने की युवाओं की भूमिका थी पर इन्हीं युवाओं ने 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए हुए मध्यावधि चुनाव में पासा पलट दिया था। अरविंद केजरीवाल ने शायद भारत के राजनीतिक इतिहास और यहां के मतदाताओं के मन और मूड का पूरी तरह अध्ययन नहीं किया है। जिन मुद्दों के खिलाफ मतदाताओं ने उनकी पार्टी को वोट दिया संभव है सरकार न बनने और मध्यावधि चुनाव की नौबत की स्थिति तक वो मुद्दे खत्म हो जाएं और मतदाता का मूड बदल जाए। अरविंद केजरीवाल की हठधर्मिता से जहां कांग्रेस को कुछ फायदा मिल सकता है वहीं बीजेपी को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। अगर दिल्ली में फिर से चुनाव की स्थिति बनी तो इसका सबसे ज्यादा घाटा अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को ही उठाना पड़ सकता है।
 
लेखक विनायक विजेता वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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