राम की शक्तिपूजा में पूरा सामन्तवाद है

बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को हिदायत दी थी कि वे कभी भी उनके वचनों को छांदस (उस समय की सामन्ती भाषा) में न लिखें। निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ छांदस हिन्दी (सामन्ती भाषा) में क्यों लिखी? उन्होंने नागार्जुन की तरह जनभाषा में कविता की रचना क्यों नहीं की? क्या इससे यह साबित नहीं होता कि निराला के सारे संस्कार सामन्ती थे? भाषा से ही विचार भी निर्मित होते हैं। सामन्ती भाषा के स्तर पर यही अन्तर जयशंकर प्रसाद और प्रेमचन्द में था। दोनों समकालीन थे। पर प्रसाद जहां पुनरुत्थानवादी ही बने रहे, वहां प्रेमचन्द कई शताब्दियों तक प्रगतिशील धारा को ऊर्जा देते रहेंगे।

‘राम की शक्ति पूजा’ में राम कौन हैं? क्या वह साधारण पुरुष हैं? वे सामन्त नहीं हैं, तो कौन हैं? दूसरा सवाल-शक्ति कौन है? किस महाशक्ति की आराधना राम ने की? उत्तर है-दुर्गा की। (देखा राम ने सामने श्री दुर्गा, भास्वर) तीसरा सवाल-किस लिये आराधना की? क्या जनता के कल्याण के लिये? उत्तर है-युद्ध के लिये, रावण को मार कर ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद कायम करने के लिये। क्या यह सामन्तवादी मूल्य नहीं है?

‘पूरा करता हूं देकर मात, एक नयन’-निराला के राम दुर्गा को प्रसन्न करने के लिये अपनी एक आंख निकाल कर भेंट करने के लिये जैसे ही ब्रह्मशर हाथ में उठाते हैं, दुर्गा उनके हाथ को तत्काल पकड़ लेती है-साधु साधु, साधक वीर, धर्म धन धान्य राम/कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम/ दुर्गा ने कहा-‘राम तुम धन्य हो। क्या यह सारी प्रशस्ति एक सामन्त की नहीं है? एक सामन्त की आंख लेते हुए भी दुर्गा को डर लगता है। कितने ही लोग भक्ति के अन्धविश्वास में अपनी आंख, जीभ और सिर काट कर दुर्गा को चढ़ा देते हैं। दुर्गा उनका हाथ क्यों नहीं पकड़ती? क्या इसलिये कि वे आम जन हैं?

एक सामन्त की प्रशस्ति में जो-जो कहा जा सकता है, वह सब ‘राम की शक्ति पूजा’ में मौजूद है। एक सामन्त की भक्ति को देखकर ‘कांपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय।’ यह ब्रह्माण्ड तब क्यों नहीं कांपता, जब कोई गरीब भक्त अपना सिर काटकर चढ़ा देता है? ‘रघु नायक आगे अवनी पर नवनीत चरण’-इस प्रशस्ति में यदि रघु की जगह ‘शिवा’ कर दें, तो अर्थ होगा-‘भूषण कह रहे हैं कि धरती पर शिवाजी के मक्खन जैसे मुलायम चरण पड़ रहे हैं।’ यह सामन्तवाद का प्रलाप नहीं है, तो क्या है? आम आदमी के चरण कहां होते हैं, पैर होते हैं और वे भी मक्खन जैसे मुलायम कहां होते हैं, जिनकी कोई इस तरह प्रशंसा करे?

‘बैठे रघुकुल मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल, ले आये कर पद क्षालनार्थ पटु हनूमान’/सेवक का यही आदर्श तो सामन्तवाद में सर्वोच्च है। स्वामी शिला पर बैठे हैं और सेवक निर्मल जल लाकर स्वामी के हाथ-पैर न धोये, तो वह सेवक कैसा? सेवक का धर्म तो स्वामी के चरण कमलों में ही है- ‘बैठे मारुति देखते राम चरणाविन्द’ यदि सेवक के मन में यह इच्छा जागे कि वह स्वामी से बेहतर कर सकता है, तो ऐसा करने से पहले उसकी माता को ही यह बता देना चाहिए-‘तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य’। सामन्तवादी वर्णव्यवस्था में सेवा-कर्म ही तो् शूद्र का धर्म है।

‘रावण अधर्म रत भी अपना, मैं हुआ अपर, यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर शंकर’! निराला के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे ब्राह्मण, गौ और वर्णव्यवस्था के रक्षक हैं। इसी धर्म की रक्षा के लिये उनका अवतार हुआ हैं इसलिये वे चिन्तित हैं कि अधर्म-रत रावण महाशक्ति का अपना कैसे हो गया? वे पूछते हैं-‘हे शंकर, शक्ति का यह कैसा खेल है?’ धर्म-अधर्म का यह खेल नैतिक मूल्यों या मानव की पक्षधरता का नहीं है। वस्तुतः विप्र-भक्ति, गौ-सेवा और वर्णव्यवस्था की रक्षा का है, जो राम का पक्ष है। रावण इस धर्म का अनुयायी न था। इसलिये निराला की नजर में रावण अधर्म-रत था। यदि वे प्रगतिशील मूल्यों के पक्षधर होते, तो सामन्ती मर्यादाओं के खिलाफ लड़ते, जिन्हें ब्राह्मणों ने अपने ऐशो-आराम के लिये धर्म का रूप दे दिया था और जिसकी रक्षा के लिये राम मर्यादा पुरुषोत्तम बने थे।

असल में ‘राम की शक्ति पूजा’ की सारी व्याख्याएं, टीकाएं और आलोचनाएं ब्राह्मण प्राध्यापकों द्वारा गढ़ी गयी हैं, जिनमें निराला को प्रेमचन्द के समकक्ष क्रान्तिकारी और प्रगतिशील दिखाने का सुनियोजित प्रयास किया गया है। यह रेत की दीवार खड़ी करने की कोशिश है, जो कामयाब हो भी गयी थी; पर दलित-चिन्तन के एक ही प्रहार से ढह गयी। दलित-चिन्तन निराला के ब्राह्मण आलोचकों से पूछता है कि निराला किस दृष्टिकोण से प्रगतिशील और जनवादी थे? न तो भाषा के स्तर पर और न विचारधारा के स्तर पर वे प्रगतिशील नजर आते हैं। वे ब्राह्मणवादी तुलसी के भक्त हैं और ‘रामचरितमानस’ में विज्ञान देखते हैं। वे दुर्गा, काली और वेदान्त पर मुग्ध हैं। ये ब्राह्मण आलोचक सत्य से उसी तरह भयभीत हैं, जिस तरह निराला के राम रावण से भयभीत हैं।

निराला का अपना भय भी इन पंक्तियों में दिखायी देता है- ‘स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय-भय’ /मतलब यह कि राघवेन्द्र (राम), जो स्थिर (अपरिवर्तनीय) धर्म-व्यवस्था चाहते हैं, उन्हें यह संशय हिला रहा है कि कहीं ऐसा न हो जाय कि रावण की जीत जाय और जग-जीवन की स्थिरता भंग हो जाय? निराला भी अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों से भयभीत थे। ‘राम की शक्ति पूजा’ में राम का यह द्वन्द्व- ‘कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार’ दरअसल निराला का ही अन्तद्र्वन्द्व है। वे परिवर्तन की स्वाभाविक गति के सामने असमर्थ थे। वे सामन्ती ढांचे के चरमराने से दुखी थे। इसलिये वे अपनी कविता में असमर्थ राम में महाशक्ति का प्रवेश करा देते हैं और उसके हाथों रावण का बध कराकर ब्राह्मणवादी धर्मव्यवस्था को बचाने की कल्पना करके खुश हो जाते हैं।

लेखक कंवल भारती जाने-माने दलित चिंतक और साहित्यकार हैं.

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