राम जेठमलानी के तर्क के बाद मीडिया गाइडलाइन पर नरम पड़ा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : अदालती कार्यवाही की कवरेज के लिए दिशानिर्देश तैयार करने पर सुनवाई कर रही उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने लचीला रुख अपनाते हुए कहा कि मीडिया रिपोर्टिंग के बारे में विभिन्न पक्षों से मिली सिफारिशों को मंजूरी के लिए संसद को भेजा जा सकता है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को यह बात उस वक्त कही जब वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा कि संसदीय विधान के जरिए यानी कानून बनाकर ही प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि हम सुझावों के लिए वरिष्ठ वकीलों से अनुरोध करते रहे हैं। अगर वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ ऐसा सोचते हैं तो इन सिफारिशों को संसद के विचार के लिए भेजा जा सकता है।

पीठ की यह टिप्पणी जेठमलानी के इस तर्क की पृष्ठभूमि में आई कि वक्त की जरूरत है कि वकील, न्यायाधीश और संपादक आपस में वार्ता कर कुछ दिशानिर्देश विकसित करने के बारे में विचार-विमर्श करें और इसे मंजूरी के लिए संसद को भेजें। जेठमलानी ने स्पष्ट कहा कि प्रेस की आजादी पर अंकुश के लिए कानूनी शक्ति होना जरूरी है जिसके लिए संसद से कानून पारित होना है। न्यायमूर्ति डी के जैन, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति जे एस खेहर की सदस्यता वाली पीठ के सामने जेठमलानी ने कहा कि किसी आत्मनियमन या दिशानिर्देश की जरूरत नहीं होगी। लेकिन वांछित परिणाम के लिए आपको संसद तक जाना होगा और ससंद आपका आदर करेगी। आपको इसे पारित कराने के लिए संसद को रजामंद करना होगा। पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर विधि आयोग ने भी सिफारिशें दी हैं। इसके अलावा आत्मनियमन और स्व नियंत्रण संबंधी कई गाइडलाइन बनाई गई हैं लेकिन आज तक इनका पालन नहीं हो सका।

जेठमलानी ने इस पर तर्क दिया कि उक्त दिशानिर्देश प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने के लिए नहीं थे और विधि आयोग की सिफारिशों पर फैसला तो जनप्रतिनिधियों के मंच यानी संसद को ही लेना होता है। ब्राडकास्टर्स एडिटर्स एसोसिएशन की ओर से पेश जेठमलानी ने कहा कि जब अदालत की अवमानना का कानून मौजूद है तो कोर्ट रिपोर्टिग पर कोई नए दिशानिर्देश तैयार करने की जरूरत नहीं है। अगर अदालत की अवमानना का कानून प्रभावी तरीके से लागू किया जाए तो दिशानिर्देश जारी किए जाने की जरूरत नहीं होगी। नए दिशानिर्देश जारी करने से बेहतर होगा कि इस कानून का सख्ती से पालन कराया जाए। उन्होंने आगाह किया कि अदालत की अवमानना के मामले में विधि अधिकारियों और न्यायाधीशों को प्रेस की प्रशंसा पाने के लिए लोकलुभावन नीति से काम नहीं करना चाहिए। ऐसे में कठोर फैसले लेकर जिम्मेदार लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अदालत की अवमानना के मामले में अटार्नी जनरल की राय सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक समाचार पत्र की ओर से पेश वकील माधवी दीवान ने कहा कि कानूनी शक्ति के अभाव में अदालती कार्यवाही के प्रकाशन या प्रसारण पर अस्थायी रोक लगाना अनुचित है। राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी और माधवी दीवान ने वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल के उन तर्को का प्रतिवाद किया जिन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 21 को मूलभूत अधिकारों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए और संविधान का अनुच्छेद 142 न्यायालय को दिशानिर्देश तय करने के स्वाभाविक शक्ति देता है। (एजेंसी)

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