राष्‍ट्रीय सहारा, पटना में चोरी करने वाले की जय-जय, खुलासा करने वाला बाहर

सहारा श्री सुब्रत रॉय बड़ी मेहनत और लगन के बाद इसकी टोपी उसके सिर पहनाकर आर्थिक साम्राज्‍य खड़ा किया. देश सेवा के लिए मीडिया में उतरे. अखबार लांच किया, चैनल लांच किया ताकि देश की लोगों की सेवा की जा सके. विज्ञापनों के माध्‍यम से भी सहारा श्री तमाम लोगों को ईमानदारी से काम करने की नसीहत देते रहते हैं, लेकिन लगता है कि इसका कोई असर उनके कर्मचारियों पर नहीं पड़ता है. वो बस अपने काम में व्‍यस्‍त रहते हैं. जैसे मेहनत करके सहाराश्री ने साम्राज्‍य बनाया वैसी ही कोशिश सहारा के कुछ कर्मचारी भी कर रहे हैं.

मामला राष्‍ट्रीय सहारा, पटना से जुड़ा हुआ है. अमूमन जैसा न्‍याय इस देश में होता है वैसा राष्‍ट्रीय सहारा, पटना में भी हुआ है. खुलासा करने वाला बलि का बकरा बन गया और चोरी करने वाला अपने वरिष्‍ठों के साथ मस्‍त है. सूत्रों का कहना है कि यहां दैनिक आधार पर काम करने वाले कर्मचारी दिलीप सिंह ने मशीन विभाग में चोरी करने की जानकारी यूनिट हेड प्रदीप सिन्‍हा समेत कई वरिष्‍ठों को दी. पर वरिष्‍ठ जांच के बाद आरोपी को निकाले जाने की बजाय इस मामले का खुलासा करने वाले दिलीप सिंह को ही बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. बताया जा रहा है कि इस गड़बड़ी की बहती गंगा में ऊपर से लेकर नीचे तक अपना हाथ धो रहे हैं.

सूत्रों के अनुसार प्रिंटिंग में काम आने वाला डैम्‍पर मोटर कार्बन की सेंट्रल परचेजिंग करके नोएडा से अन्‍य यूनिटों को भेजी जाती है. एक मोटर कार्बन की कीमत तीन सौ से पांच सौ रुपये के बीच होती है. जबकि पुराना कार्बन दस से बीस रुपये के बीच मिल जाता है. बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले नोएडा से पटना भेजे गए एक मशीन कर्मी इसमें घपला करता था. पब्लिशिंग के समय 75 एचपी के मशीन में आठ नया मोटर कार्बन लगता है, लेकिन यह कर्मचारी प्रिटिंग के समय पांच पुराना तथा तीन नया कार्बन यूज करता था. दिलीप को इस घपले की जानकारी हो गई.

सूत्रों का कहना है कि इसके बाद दिलीप ने अपने स्‍तर से जांच की तो पता चला कि मोटर कार्बन के अलावा डैम्‍पर मोटर में लगने वाले छोटे मोटर में भी घपला किया जा रहा है. एक छोटे मोटर की कीमत मार्केट में 1500 से 2000 रुपये के बीच है, जबकि पुराना मोटर सौ से डेढ़ सौ रुपये के बीच मिल जाता है. काफी समय से चल रहे इन घपलों की जानकारी पुख्‍ता होने के बाद दिलीप ने इसकी शिकायत यूनिट हेड प्रदीप सिन्‍हा से की. सूत्रों का कहना है कि इस बात की जानकारी प्रदीप सिन्‍हा को पहले से ही थी.

अब चूंकि मामला एक कर्मचारी उनके पास लेकर आया था तो उन्‍होंने जांच कराने के लिए पर्सलन हेड उपमा ठाकुर, प्रसार हेड अनुराग सिंह एवं एकाउंट हेड एलके झा की एक टीम गठित कर दी. सूत्रों का कहना है कि जांच में दिलीप के सारे आरोप सही पाए गए. टीम ने भी अपनी जांच रिपोर्ट सिन्‍हा को सौंप दी. लेकिन सिन्‍हा ने कोई कार्रवाई करने या नोएडा को इसकी जानकारी देने की बजाय दिलीप को ही बलि का बकरा बना दिया. उसको काम से निकाल दिया गया.

सूत्रों का कहना है कि इस मामले में प्रदीप सिन्‍हा की गर्दन भी फंस रही थी, लिहाजा उन्‍होंने जांच में दोषी पाए गए कर्मचारी पर कार्रवाई करने की बजाय इस मामले को उनके संज्ञान में लाने वाले दिलीप को ही कंपनी से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. इस संदर्भ में जब जानकारी के लिए जांच टीम में शामिल रहे एकाउंट हेड एलके झा से बात की गई तो उन्‍होंने कुछ भी बताने से इनकार करते हुए प्रदीप सिन्‍हा से जानकारी लेने की बात कही. प्रदीप सिन्‍हा से बात करने की कोशिश की गई तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

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