राहत कैंपों के मजलूम

मुजफ्फरनगर के राहत कैंपों में रहे लोगों के नाम कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन उनमें एक बात समान हैं कि सब ‘मजलूम’ हैं। जिले में जगह-जगह राहत कैंप हैं। उनमें मौजूद हर आदमी की अपनी कहानी है। बस सुनने वाला चाहिए। मुजफ्फरनगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर कस्बे शाहपुर को देखकर लगता है, जैसे सब कुछ सामान्य है, लेकिन शाहपुर से एक किलोमीटर दूर बसी कलां गांव के एक मदरसे में बने राहत कैंप में कुछ भी सामान्य नहीं है।

कैंप में खेलती लगभग पांच साल की रानिया को नहीं पता कि वह रातोरात यहां क्यों है? लेकिन उसकी मां का चेहरा बता रहा है कि वह यहां क्यों है। चेहरे पर अपने गांव कुटबा के उजड़ने का दर्द साफ झलकता है। बसी कलां के इस कैंप का दौरा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कर चुके हैं, लेकिन विभिन्न गांवों से उजड़कर आए हजारों लोगों को उनसे पुनर्वास का आश्वासन नहीं मिला। पंद्रह दिन गुजर गए, लेकिन दंगों का खौफ लोगों को अपने-अपने गांव जाने नहीं देता। यहां सरकारी इमदाद ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। स्वयं सेवी संगठन हर तरह की मदद कर रहे हैं।

अलग-अलग शहरों से रसद के ट्रक लगातार आ रहे हैं। सामूहिक खाना बन रहा है। तंदूर जारी है। कपड़ों के ढेर लगे हैं। इस सबके बावजूद जिंदगी बेनूर है, लेकिन इसमें रंग भरने की कोशिशें जारी हैं। जिनकी शादियां पहले से तय थीं, कार्ड बंट चुके थे, उनकी शादियां हो रही हैं। राहत शिविरों के लोग ही बाराती भी हैं और घराती भी। इस कैंप में आज ही तीन निकाह पढ़ाए गए। नवजात बच्चों की किलकारियां भी गूंज रही हैं।

बुढ़ाना के सामुदायिक केंद्र में लगभग चार हजार लोग पनाह लिए हुए हैं। दोपहर के भोजन का वक्त हुआ तो खाने लेने वालों की लंबी लाइन लगी है। दो आदमी बारी-बारी से खाना दे रहे हैं। लगभग 15 साल की लड़की की प्लेट में खाना डाला जाता है, तो वह जार-जार रोने लगती है। बादल उमड़े तो अब सबको डर है कि बारिश हो गई, तो क्या होगा?

बुढ़ाना से पांच किलोमीटर कांधला रोड पर 40 हजार की आबादी वाला गांव है जौला। यहां बड़े मैदान पर बड़ा टैंट लगा है। टैंट के बीच में एक स्टेज बना है। हाजी गुलाम मोहम्मद माइक से व्यवस्था संभाल रहे हैं। उनके पास इमदाद देने आए लोग बैठे हैं। यहां भी सामूहिक खाना बन रहा है। जब उनसे पूछा जाता है कि सरकार की मदद कितनी आ रही है, तो उनके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान आ जाती है। वह कहते हैं, जितनी इमदाद सरकार कर रही है, उससे तो एक हजार लोगों का भी भला नहीं हो सकता। आप देख ही रहे हैं कि यहां कितने आदमी हैं। अचानक बारिश आई तो दिखा चारों तरफ पानी ही पानी। मुश्किलों में और इजाफा हो जाता है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क saleem_iect@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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