राहुलजी, बातें बनाने से वोट नहीं मिलते

जयपुर के चिंतन-शिविर में से निकला क्या? किसी भी कांग्रेसी से यह सवाल पूछिए तो वह कहता है, ‘राहुल गांधी’। क्या सचमुच राहुल गांधी को उछालने के लिए जयपुर-शिविर की जरुरत थी? राहुल तो पहले से ही उछले हुए थे, जयपुर या अ-जयपुर! राहुल के सिर पर उपाध्यक्ष की पगड़ी रख देने से क्या उनका कद ऊंचा हो गया है? कांग्रेस के महासचिव रहते हुए क्या उनके पास शक्ति की कोई कमी थी? क्या कोई ऐसा महासचिव भी था, जो यह दावा कर सके कि वह राहुल से ज्यादा शक्तिशाली था? क्या किसी महासचिव की इतनी हिम्मत थी कि वह अपनी उम्र और अनुभव का हवाला देकर अपनी श्रेष्ठता बघार सके? सर्वश्रेष्ठ और सर्व-शक्तिशाली महासचिव रहते हुए भी राहुल ने कोई ऐसा जलवा नहीं दिखाया कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में आशा का संचार हो। बल्कि उलटा ही हुआ। बिहार और उप्र के चुनावों ने ‘युवा नेतृत्व’ की सारी कलई उतार दी।

तो अब उन्हें उपाध्यक्ष बना देने का अर्थ क्या हुआ? यह नहीं कि अब वे पार्टी में नम्बर दो हैं। दो तो वे थे ही। अब वे वास्तव में नम्बर-एक हो गए हैं। उनके उपाध्यक्ष होने की तुलना अर्जुनसिंह और जितेंद्र प्रसाद से करना यथार्थ को अनदेखा करना है। क्या दरबारियों की तुलना युवराज से हो सकती है? उनके पास अब अध्यक्ष के सारे अधिकार होंगे। ये अधिकार उनके पास पहले भी थे। जहां सारी शक्ति मां और बेटे में केंद्रित हो, वहां कौन पहला और कौन दूसरा? अब फर्क यह हुआ है कि जयपुर-शिविर में सोनिया गांधी ने अपना ताज उतार दिया है। यह शिविर राहुल के सिर पर ताज रखे जाने के लिए नहीं बल्कि सोनिया द्वारा अपने ताज-त्याग के लिए जाना जाएगा।

सोनिया की आंखों में आंसू इसीलिए छलक आए थे। सोनिया को पता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठने का मतलब क्या होता है? उन्होंने अपने पति और अपनी सास के जीवन से सत्ता की कीमत चुकाई है। वे सोचती हैं कि कांग्रेस अब तीसरी बार भी सत्ता में आएगी तो प्रधानमंत्री तो उनका पुत्र ही बनेगा। प्रधानमंत्री का पद कहीं बलिवेदी न बन जाए? एक मां को यह विचार भूकंप की तरह झकझोर दे, यह स्वाभाविक है। लेकिन यहां मूल प्रश्न यह है कि ‘अगर जान प्यारी है तो उसकी गली में जाएं ही क्यों?’ यहां सवाल मां-बेटे का नहीं है, देश का है। देश के लिए कुर्बानी करने से डर लगता है तो आपको मजबूर कौन कर रहा है? लाखों माताएं अपने बच्चों को फौज में क्यों भेजती हैं? क्या उनकी आंखों में उन्हें भेजते वक्त आंसू होते हैं?

पिछले 7-8 वर्षों में सत्ता का केंद्र एक नहीं रहा है, दो रहे हैं, सोनिया और मनमोहन सिंह! इसमें खतरा कुछ कम है। अब यदि कांग्रेस लौटी तो सत्ता का केंद्र एक ही होगा। पहले की तरह प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ही होंगे। खतरा बहुत ज्यादा होगा। इस खतरे ने मां-बेटे को हिला दिया, यह स्वाभाविक है लेकिन समझ में नहीं आता कि अपने भाषण में इसका ढिंढौरा पीटने की जरुरत क्या थी? राहुल का यह भोलापन ही आगे जाकर उनके गले का हार न बन जाए, यह डर तर्कसंगत है। यह ठीक है कि उक्त प्रसंग के साथ-साथ अन्य मार्मिक घटनाओं के उल्लेख ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भवावेश में डुबा दिया लेकिन इसके दूरगामी निहितार्थ गंभीर चुनौतियों से जूझ रही किसी भी पार्टी के लिए श्रेयस्कर नहीं हैं। कांग्रेस को आज शेर की दहाड़ चाहिए, कोई रोता-गाता विदाई-संगीत नहीं।

राहुल ने अपने भाषण में सत्ता को ‘ज़हर’ बताया। क्या खूब? इसका अर्थ यह हुआ कि वे जिनका नेतृत्व करने के लिए बेताब हैं, उनके बारे में उन्हें अभी तक ‘क,ख,ग’ भी नहीं मालूम! उन्हें पता होना चाहिए कि सारी दुनिया की सभी पार्टियों में कांग्रेस से बढ़कर सत्ताप्रेमी पार्टी कोई और नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में किसी भी पार्टी ने लगातार 50 साल तक राज नहीं किया है? इंदिराजी के बाद चाहे मोरारजी, चरणसिंह, वि.प्र. सिंह, चंद्रशेखर और गुजराल आदि प्रधानमंत्री रहे हों, थे सभी कमोबेश कांग्रेसी ही! सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस ने कौन-कौन से द्राविड़-प्राणायाम नहीं किए? यदि सत्ता विष है तो कांग्रेस सबसे बड़ी विषपायी है। यदि राहुल ‘सत्ता ज़हर है’, यही लकीर पीटते रहे तो वे इंदिरा कांग्रेस को निजलिंगप्पा कांग्रेस बना बैठेंगे। हां, यदि वे सत्ता को जहर इसलिए कह रहे हैं कि उसमें मौत का खतरा है तो उनकी बात ठीक है। वरना सत्ता तो सेवा का सबसे बड़ा साधन है। कांग्रेसियों पर कोई कैसे भी आरोप लगाए लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि सत्ता से सेवा और सेवा से सत्ता प्राप्त करने की कला में कांग्रेसी बेजोड़ हैं।

लेकिन स्वयं सोनिया गांधी और राहुल गांधी इस सिद्धांत के उलट हैं। सत्ता में आने के पहले दोनों, मां-बेटे का सेवा का कोई इतिहास नहीं है। सत्ताप्रेमी कांग्रेसियों द्वारा नरसिंहराव और सीताराम केसरी के विरुद्ध किए गए तख्ता-पलट ने सोनिया को तख्त पर बिठा दिया और उन्होंने एक अराजनीतिक महिला होते हुए भी इस घोर यथार्थवादी पार्टी को पटरी पर चलाए रखा, यह कम बड़ी बात नहीं है लेकिन अपने विदाई-संगीत की वेला में उन्हें अपने बेटे को समझाना होगा कि उन्हें नेतागीरी करना है, पत्रकारिता नहीं। सत्ता के बिना राजनीति क्या है? कोरा झुनझुना है। इस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती 2014 के चुनाव हैं। सत्ता को अमृत समझेंगे, प्रिय राहुलजी, तो ही चुनाव में आप इस डूबती नाव को बचा पाएंगे।

कांग्रेस पार्टी ने तो राहुल को नेता मान लिया लेकिन देश तो कांग्रेस नहीं है। देश कैसे मानेगा? क्या मैं यह कहने की हिम्मत करुं कि इस देश के साधारण मतदाता याने आम आदमी इतने परिपक्व हैं कि उन्होंने हमेशा वंशवाद को रद्द किया है। ज़रा याद करें, 1967 में क्या हुआ था? इंदिराजी ने प्रधानमंत्री के तौर पर पहला चुनाव लड़ा था। उनमें एक सक्षम नेता का रुप उभर रहा था लेकिन नेहरु की बेटी को देश ने स्पष्ट साधारण बहुमत भी नहीं दिया। 1971 में वे इंदिरा गांधी बन चुकी थीं। बैकों का राष्ट्रीयकरण, कांग्रेस का विभाजन आदि कई घटनाओं के कारण वे अपने पांवों पर खड़ी हो गई थीं। वंशवाद की बेसाखी छूट गई थी। उन्हें प्रचंड बहुमत मिला। 1977 में जनता ने उन्हें इसलिए नहीं बख्शा कि वे नेहरु की बेटी थीं। 1984 में नेहरु के नाती और इंदिरा के बेटे राजीव को नहीं, शहीद इंदिरा गांधी को 410 सीटें मिली थीं। उसके बाद राजीव और सोनिया को आधी से भी कम सीटें मिलीं। आम आदमी ने वंशवाद को कभी परवान नहीं चढ़ाया। इसीलिए अगर कांग्रेसी यह आस लगाए बैठे हैं कि राहुलजी उन्हें तिरा देंगे तो वे कृपया इतिहास बारीकी से पढेंगा।

यह ठीक है कि राहुल अभी 42 वर्ष के हैं। इस उम्र के एक प्रौढ़ व्यक्ति को यदि कांग्रेसी युवा कहते हैं तो यह उनकी जिंदादिली का सबूत है। अपने यहां ‘साठा तो पाठा’ भी कहते हैं। लेकिन अगर वे इस भुलावे में हैं कि 42 साल के राहुल देश के 18 से 25 साल के करोड़ों युवाओं के स्वाभाविक नेता हैं तो उन्हें ज़रा अपनी कल्पना की दुबारा जांच करनी होगी। इस निष्कर्ष पर उ.प्र. के चुनाव ने भी मोहर लगाई है। बाजी कौन मार ले गया? अखिलेश या राहुल? नेतृत्व का शारीरिक उम्र से संबंध होता है लेकिन उसके निर्धारण में मानसिक उम्र की भूमिका सबसे अधिक होती है। इस अर्थ में राहुल अभी युवा भी नहीं हुए। वे किशोरावस्था के भी प्रारंभिक चरण में ही हैं। वरना क्या वजह है कि निर्भया के बलात्कार पर उनका खून नहीं खौला? कहां गए थे, वे? सारा देश हतप्रभ था। उनसे ज्यादा जवानी का परिचय तो शीला दीक्षित ने दिया। शीलाजी ने सिर्फ रिपोर्ट में हेराफेरी करनेवाली पुलिस को ही नहीं धमकाया, बल्कि एक युवा नेता की तरह वह भीड़ में घुस गईं, उस वीर बाला की याद में मोमबत्ती जलाने के लिए! अब बताइए, कौन युवा है, कौन नेता है? यह मामला सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है। भ्रष्टाचार के मामलों ने मनमोहन सरकार की छत उड़ा दी लेकिन राहुल छतरी तानकर भी खड़े न हो सके। रामदेव के हजारों भक्तों पर इतना नृशंस अत्याचार हुआ लेकिन पार्टी के युवराज में इतनी हिम्मत नहीं कि वे चिदम्बरम को डपट सकें। लोकपाल मामले में भी जुबान जरुर लड़खड़ाई। किसी का लिखा हुआ भाषण किसी किशोर की तरह पढ़ दिया लेकिन किया क्या? कुछ नहीं। जयपुर में भी देश की व्यथाएं जरुर गिनाईं लेकिन यह काम तो राहुल से भी अच्छा कोई अखबार का रिपोर्टर कर सकता है। राहुल से लोग उम्मीद करते हैं कि वे कुछ करेंगे। सारी सत्ता हाथ में होने के बावजूद आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं तो कल ये कांग्रेसी भी आपका साथ छोड़ देंगे। आप बातें कितनी ही अच्छी बनाएं, बातें बनाने से वोट नहीं मिलते।

राहुल ने कांग्रेस को एक परिवार कहा। पार्टी के लोगों के दिलों को छुआ लेकिन वे भूल गए कि यह देश का सबसे निर्मम परिवार है। किसी भी नेता को रद्दी की टोकरी के हवाले करने में कांग्रेसी ज़रा भी देर नहीं करते। ज़रा याद कीजिए मार्च 1977 से 1979 तक की इंदिरा गांधी को और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव को! क्या ही अच्छा होता कि जयपुर-शिविर के दौरान कांग्रेस का जो पट-परिवर्तन हुआ, उसकी जगह सरकार का पट-परिवर्तन होता। यदि सोनिया गांधी इतनी हिम्मत करती कि वे या तो नया उप-प्रधानमंत्री या फिर नया प्रधानमंत्री ही घोषित कर देतीं तो देश राहत की सांस लेता। उसे लगता कि भारत अब एक निकम्मे और भ्रष्ट शासनतंत्र से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है।

राहुल गांधी अब साल भर में क्या-क्या कर लेंगे? वे मनमोहन सरकार की खोई इज्जत कैसे लौटाएंगे? वे पार्टी में ऊपर से नामजदगी के सिद्धांत को खत्म कैसे करेंगे? वे खुद ऊपर से उतरे हैं। पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने की शुरुआत क्या वे खुद से करेंगे? वे महासचिव से उपाध्यक्ष बन गए याने खुद सत्ता का नया पायदान चढ़ गए और कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि सत्ता जहर है। जयपुर में और उसके बाद कांग्रेसी राहुलजी की विदावलियां जरुर गा रहे हैं लेकिन कोई उनकी आपसी और अंदरुनी बातें सुने तो वह दांतों तले उंगली दबाए बिना नहीं रहेगा। कांग्रेस एक महान पार्टी रही है। उसका जिंदा रहना और मजबूत रहना देश की एकता और लोकतंत्र के लिए बेहद जरुरी है लेकिन अब जबकि विपक्ष अपनी ही आग में झुलसा जा रहा है, कांग्रेस का इस अनिश्चय के दौर में प्रवेश करना चिंता का विषय है। जयपुर के शिविर ने कोई चिन्तन पैदा किया या नहीं लेकिन डर यही है कि वह कहीं देश के लिए चिंता का शिविर सिद्ध न हो।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार एवं स्‍तंभकार हैं. उनका यह लेख जनसत्‍ता में प्रकाशित हो चुका है.

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