राहुल-मोदी के अपने-अपने संकट

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव इन दिनों भाजपा और कांग्रेस के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गए हैं। क्योंकि, लोकसभा चुनाव के ठीक पहले होने वाले इन चुनावों को 2014 के ‘सेमीफाइनल’ के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में, दोनों प्रमुख दलों के रणबांकुरे विजयश्री पाने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। चुनावी वैतरणी पार करने के लिए तरह-तरह के राजनीतिक प्रयोग किए जा रहे हैं। यहां तक कि सतही राजनीतिक हथकंडों से भी ज्यादा परहेज नहीं किया जा रहा। राज्यों के चुनाव में आमतौर पर स्थानीय मुद्दों का बोलबाला रहता है, लेकिन इस बार दोनों दलों ने राष्ट्रीय मुद्दों की मारक बौछारें एक-दूसरे के खिलाफ बरसानी शुरू कर दी हैं। भाजपा के प्रमुख रणबांकुरे हैं, नरेंद्र मोदी। जबकि, कांग्रेस ने इस बार इस भूमिका में पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को आगे खड़ा कर दिया है।

लंबी जद्दोजहद के बाद मोदी अपनी पार्टी में ‘पीएम इन वेटिंग’ बन गए हैं। जबकि, राहुल गांधी को अपनी पार्टी के अंदर ऐसी किसी राजनीतिक चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा। उनके लिए तो पूरी पार्टी सालों से पलक-पांवड़े बिछाई खड़ी है। लेकिन, राहुल गांधी ना-ना कहते हुए अपनी ‘त्यागमयी’ छवि भी गढ़ने में लगे रहे हैं। ताकि, संदेश यही जाए कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने के लिए मोदी की तरह एकदम बेचैन नहीं हैं। नेहरु-गांधी परिवार के ‘युवराज’ अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें पार्टी के अंदर राजनीतिक चुनौती देने वाला कोई और नहीं है। लेकिन, मोदी की स्थिति ऐसी नहीं थी। 

यूं तो विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा के चुनाव तक इन दोनों दिग्गजों को लगातार अग्नि-परीक्षाओं का सामना करना है। लेकिन, मोदी के लिए तो ‘करो या मरो’ की स्थिति है। क्योंकि, चार विधानसभा चुनावों में अनुकूल परिणाम नहीं आ पाए, तो राजनीतिक हल्कों में तमाम सवाल खड़े होंगे। यही कि मोदी में राजनीतिक करिश्मे का कितना दम है? कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मोदी का फेरा लगने के बाद भी भाजपा का चुनावी शो फ्लॉप हो गया था। इसको लेकर भी कहा गया था कि गुजरात के बाहर उनका राजनीतिक करिश्मा अभी तक कहीं देखने को नहीं मिला है। लेकिन, इस दौर तक वे औपचारिक रूप से ‘पीएम इन वेटिंग’ नहीं बने थे। लेकिन, अब स्थिति बदल गई है। 

दोनों देशव्यापी चुनावी अभियानों में जुट गए हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद गुजरात दंगों का भूत मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहा है। क्योंकि, ये ही दंगे मोदी के राजनीतिक जीवन में एक नया मोड़ लेकर आए थे। इन्हीं भीषण दंगों की लपटों ने भले गुजरात के हजारों परिवारों का सर्वनाश किया हो, लेकिन इन दंगों के चलते संघ परिवार की राजनीति में मोदी ‘हिंदू ह्रदय सम्राट’ बनकर अवतरित हुए थे। इसी छवि के चलते वे लगातार गुजरात विधानसभा के तीन चुनाव जीत चुके हैं। इस जीत के रिकॉर्ड ने ही उन्हें अब दिल्ली के नए मुकाम तक पहुंचा दिया है। धुर हिंदूवादी नेता की जिस छवि ने भाजपा की राजनीति में मोदी को ‘दबंग’ बना दिया, वही एक मायने में उनके लिए ‘अभिशाप’ भी साबित हो रही है। शायद, इसीलिए अपनी चर्चित दंगाई छवि से पीछा छुड़ाने के लिए वे ‘गुजरात विकास मॉडल’ का हवाला देकर ‘विकास पुरुष’ की नई छवि गढ़ने में लगे रहे हैं। उनकी कोर टीम की कोशिश भी यही है कि लोकसभा के चुनावी अभियान में उनका गुजरात विकास मॉडल सबके सिर पर चढ़कर बोले। 

हालांकि, उनके विकास मॉडल को लेकर भी कई तरह के विवाद हैं। सामाजिक विकास के मापदंडों के अनुसार, गुजरात के विकास का एक दूसरा चेहरा भी है, जो कि काफी पिछड़ेपन का है। चूं्कि, यह खुरदरा चेहरा भारत सरकार के आंकड़Þों पर आधारित है। ऐसे में, इसे एकदम नकार पाना भी मुश्किल हो रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद ‘मोदी एंड कंपनी’ की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि देश का मुस्लिम समाज उनकी राजनीति और नीयत पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। क्योंकि, गुजरात दंगों का ‘सच’ बार-बार मोदी को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। दंगों से जुड़े कुछ अहम मामले अभी तक अदालतों में लंबित भी हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और उनके खास सिपहसालार माने जाने वाले अमित शाह जैसे लोग पूरी तौर पर कानूनी शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाए हैं। दंगों से जुड़े कुछ आपराधिक मामलों में वे घिरे हैं। कोई नहीं जानता कि वे अदालती शिकंजे से बच पाएंगे या नहीं?

गुजरात, एकल भाषायी प्रांत है। यहां पर मोदी अपनी खास शैली में भले लंबे समय से राज करते आ रहे हों, लेकिन केंद्र की सरकारी बागडोर संभालना खासी बड़ी चुनौती है। क्योंकि, भारत एक बहुभाषीय और बहुसंस्कृति वाला देश है। ऐसे में, सभी क्षेत्रों के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की चुनौती रहती है। मोदी अच्छी तरह से समझ रहे होंगे कि बड़ी कुर्सी तक पहुंचना है, तो किसी एक संप्रदाय को ठेंगा दिखाकर जीत हासिल करना मुश्किल है। ऐसे में, वे मुस्लिम समाज को भी विश्वास में लेने की कवायद करते आए हैं। गुजरात में भी उन्होंने सद्भावना यात्राएं की थीं। उनके कई कार्यक्रमों में बुर्काधारी महिलाएं और इस्लामी टोपी लगाए चेहरे भी दिखाई पड़ते रहे हैं। उनका दावा भी रहा है कि एक दशक में उनके गुजरात में मुस्लिम समाज ने भी जमकर तरक्की की है।

पिछले दिनों एक   प्रमुख मुस्लिम संगठन जमात-ए-उलेमा हिंद के प्रमुख नेता सैयद मोहम्मद मदनी ने कांग्रेस को झिड़कते हुए कहा था कि इस पार्टी के नेता बार-बार मुस्लिम समाज को मोदी का डर दिखाकर अपने वोट बैंक की राजनीति न करें। मदनी की यह टिप्पणी एक तरह से कांग्रेस के लिए राजनीतिक हिदायत भी थी, तो मोदी के लिए एक संदेश भी था। यही कि यदि प्रधानमंत्री पद की होड़ में आना है, तो मुस्लिम समाज को भी उन्हें विश्वास में लेना होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक का ताजा बयान आया है कि यदि मोदी अपनी राजनीतिक शैली में बदलाव करने को तैयार हों, तो वे खुद अपना वोट मोदी को देने के लिए तैयार हैं। इस टिप्पणी के भी खास राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं।
इधर दिल्ली, भोपाल, जयपुर से लेकर कानपुर तक मोदी की बड़ी रैलियां हुई हैं। इन सभी में मुस्लिम पहचान वाले चेहरे सभाओं में लाने और दिखाने की खास कोशिशें की गईं। इस चक्कर में आरोप भी लगे कि आयोजकों ने गोल टोपी और बुर्के मुफ्त में बंटवाए थे। ताकि, मुस्लिम भागीदारी का संदेश जाए। इन आरोपों में कितना दम है, ये बात ज्यादा मायने नहीं रखती। लेकिन, अहम बात यह है कि मोदी और भाजपा के रणनीतिकार यह समझ गए हैं कि एक संप्रदाय को एकदम अलग-थलग करके सबसे ऊंची कुर्सी तक पहुंचने की डगर नहीं बन सकती। मुश्किल यह है कि मोदी ने अल्पसंख्यकों का दिल जीतने की कोई ईमानदार पहल की, तो संघ परिवार का बड़ा कुनबा तुनक सकता है। क्योंकि, इनकी जमात तो मोदी को खांटी हिंदुत्व चेहरे के रूप में देखना चाहती है।

दूसरी तरफ, राहुल गांधी मोदी का ‘विजयरथ’ थामने के लिए निकल पड़े हैं। अपनी बातों को वजनदार बनाने के लिए वे अक्सर रैलियों में तमतमाते हुए भाषण करते हैं। दलितों और गरीबों के मुद्दे उठाते हैं। लेकिन, सवाल है कि पांच दशक से ज्यादा तो केंद्र की सत्ता में कांग्रेस ही रही है। फिर वे गरीबों की बदतर स्थिति के लिए किस पर उंगली उठा रहे हैं? चुरु (राजस्थान) की एक चुनावी सभा में उन्होंने अपनी दादी और पिताश्री की हत्या के मामले का इतना लंबा जिक्र किया कि समझना मुश्किल हो रहा है आखिर वे मोदी का मुकाबला करने के लिए कब तक महज ‘इमोशनल कार्ड’ की राजनीति करते रहेंगे?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *