रीयल लाइफ में एक फिल्मी डायलाग बोलने में इरफान की फटी

बुधवार को मैं ऑफिस में नहीं था..बाहर की दुनिया देख रहा था..चार प्रसंग शेयर कर रहा हूं। जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में अभिनेता इर्रफान (IRRFAN को हिंदी में ऐसे ही लिखेंने ना…) खान छात्रों से बात कर रहे थे। इर्रफान दो घंटे तक छात्रों के हर सवाल का जवाब देते रहे, सिनेमा और जीवन के हर पहलू पर बात की। छात्रों ने पान सिंह तोमर का डॉयलाग 'बीहड़ में बागी रहते हैं…डकैत पलते हैं पार्लियामेंट में' बोलने का उनसे कई बार आग्रह किया लेकिन इर्रफान पर्दे के बाहर इस डॉयलाग को बोलने की हिम्मत नहीं दिखा सके।

जेएनयू से लौट रहा था। आनंद विहार बस अड्डे पर विपिन नाम के एक बच्चे से बात। 14 साल का विपिन शाहजहांपुर से यहां आया है और बस अड्डे से निकलते ही फ्लाइओवर के नीचे प्राइम स्पेस पर वो साइकिल पर कचौड़ी बेचता है। विपिन ने बताया वो रोजाना करीब पांच सौ रुपए कमाता है और महीने में करीब दस हजार घर भेज देता है। चौंकिए मत…ये तो वो अपने लिए कमाता हैं जरा सोचिए वो मालिक जो ऐसे ही करीब 200 बच्चों से ठेके पर कचौड़ी बिकवाता है कितना कमाता होगा? खैर…भारत में कमाने का सभी को हक है…भले ही वो बच्चों से माल बिकवाकर कमाए…असल बात यह है कि वो यहां साइकिल खड़ी करने के रोजाना 50 रुपए चौकी पर तैनात सिपाही को देता है। रोजाना के 50 यानि महीने के 1500 और साल भर के गिनों तो 18000। यानि वो 18 हजार सालाना 'टैक्स' चुकाता है अपना कचौड़ियां बेचने के लिए। ये अलग बात है कि यह टैक्स ब्लैक मनी के रूप में पुलिस और नेताओं के पास पहुंचता है जिसका कोई हिसाब नहीं है…..। (वैसे आप कितना टैक्स चुकाते हैं? )

विपिन से बात करके थोड़ा और आगे बढ़ा…आनंद विहार से इंदिरापुरम आने के लिए। एक ऑटो में बैठ गया रात के करीब दस बज चुके थे। ऑटो में बैठे हुए दस मिनट हो चुके थे, लेकिन ऑटो चलने का नाम नहीं ले रहा था। 6 सवारियां उसमें पहले से बैठी थी मैं सातवां था। ऑटो ड्राइवर का कहना था कि वो दस सवारियां बिठाने से पहले नहीं चलेगा। हम इंतेजार करते रहे। पांच मिनट और बीते कि एक मजदूर अपनी पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ वहां पहुंचा। ड्राइवर ने कहा बैठ जाओ। वो नहीं बैठा…एक खाली ऑटो आया वो उसमा बैठा ही था कि हमारे ऑटो का ड्राइवर और बाकी दो तिन ऑटो के ड्राइवर और उसे ऑटो से बाहर खींचने लगे। बोले…इसमें ही बैठोगे…भले ही आधा शरीर ऑटो से बाहर निकालकर लटकना पड़े।

बेचारा मजदूर कहता रहा कि उसके साथ बच्चे हैं और वो खाली ऑटो में ही जाएगा भले ही कितनी भी देर बाद में जाए। अब ड्राइवर का गुस्सा बढ़ा और वो उसे ऑटे से बाहर खींचने लगा। यह सब मेरी बर्दाश्त से भी बाहर था…नीचे उतरा…गुस्से में (इतना गुस्सा मुझे कभी-कभी ही आता है) अपने ऑटो के ड्राइवर को खींचकर दूर किया और चिल्लाते हुए कहा कि यदि अब तुमने इसे जाने नहीं दिया तो मेरे हाथ से पिट जाओगे। दूसरा ऑटो मजदूर और उसके परिवार को लेकर आगे चला गया…। लेकिन हमारे वाले ऑटो ने सभी सवारियों को नीचे उतार दिया बोला न मैं जाउंगा और न किसी और को ही यहां से जाने दूंगा…। खैर मुझे और गुस्सा आता इससे पहले ही एक अन्य आटो आया और उसने हमें इंदिरापुरम छोड़ दिया। इसे भी बाकी ड्राइवरों ने चलने से रोकने की कोशिश की…मेरे पुलिस को बुलाने की बात कहने पर ही हमें आगे जाने दिया…। रास्ते में ड्राइवर ने बताया कि आंनद विहार से चलने वाले प्रत्येक ऑटो को हर चक्कर पर बीस रुपए यहां के माफिया को देने होते हैं। पुलिस ने ही यहां कुछ गुर्गे तैनात कर रखे हैं जो प्रत्येक ऑटो वाले से पैसा वसूलते हैं और शाम को अपना हिस्सा लेकर बाकी रकम पहुंचा देते हैं…। वसूली का आंकड़ा भी आपको चौंका देगा। प्रत्येक ऑटो से हर चक्कर पर 20 रुपए लिए जाते हैं। यानी 6 एक्स्ट्रा सवारियां बैठती हैं उनमें से दो का किराया सीधे माफिया की जेब में जाता है। जिस ऑटो में कायदे से अधिक से अधिक 6 सवारियां बैठनी चाहिए वो 12 भरकर क्यों चलता है यह मेरी समझ में आ रहा था।

खैर…जैसे तैसे घर पहुंचा। मोबाइल चैक किया तो भोपाल से एक संदेश मिला। भ्रष्टाचार पर सवाल करने से बौखलाए एक अफसर ने हमारे साथी पत्रकार जाहिद मीर का कैमरा तोड़ दिया। यही नहीं उन्हें तीन घंटे थाने में भी बिठाया गया और उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला भी दर्ज किया गया। हालांकि पत्रकारों के दवाब में अफसर के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। यह अफसर आदिम जाति कल्याण विभाग में तैनात है।

इन चारों प्रसंगों के बाद मेरा मन देश के नेताओं और संसद को दिल खोलकर गाली देने का कर रहा था। लेकिन मैंने नहीं दी। मैंने किसी नेता को मोटी चमड़ी का सूअर नहीं कहा। न ही मैंने यह कहा कि देश की संसद में सबसे बड़े लूटेरे बैठे हैं। मैंने यह भी नहीं कहा कि नेता अब संगठित गिरोह के सरगना के तौर पर काम करते हैं जिनका मूल काम वसूली रह गया है। मेरी हिम्मत ही नहीं हुई की मैं यह कह सकूं कि रोजाना मेरी जेब से करीब दस प्रतिशत पैसा इन लुटेरे नेताओं की जेब में पहुंच जाता है। अरे भई मैं ये कैसे कह सकता था। जब इर्रफान खान जैसा हीरो फिल्म का डॉयलाग नहीं बोल सकता, जाहिद मीर जैसे बेबाक और बेकौफ पत्रकार का कैमरा तोड़ा जा सकता है तो फिर मैं तो….।

लेखक दिलनवाज पाशा युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. उन्होंने अपनी यह बात अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित की है. लिंक है- http://www.facebook.com/dilnawazpasha/posts/3580560311172

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