रेत माफिया पर खबर लिखने के कारण संतोष वर्मा पर हमला भी हुआ था

: तुम बहुत जल्दी चले गये संतोष… : संतोष वर्मा को देहरादून में एक अनाम मौत मिली। अगर उनके कुछ शुभचिंतकों और सरोकारी पत्रकारों ने यह खबर फैलायी नहीं होती, तो संतोष की मौत शायद गुमनाम ही रह जाती। फेसबुक पर सुनीत भास्कर ने सूचना दी थी- ''देहरादून के मित्रों के लिए… बेहद दु:ख के साथ इत्तला है मित्रो …वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय संतोष वर्मा जी की अनायास ही ह्रदय गति रुकने से मौत हो गयी है… उन्हें दून अस्पताल की मौर्चरी मैं रखा गया है… दुर्भाग्य से उनके घर परिवार का कुछ पता नहीं चल पा रहा है, क्यूंकि परिवार उनके साथ नहीं रहता था… अगर आप किसी को, जो जानते हैं उन्हें कुछ मालूम चल पाए तो इत्तला जरूर दें…''

सुनीता ने संतोष का फोटो भी लगाया था। मगर मैं फोटो से उसे पहचान नहीं पा रहा था। उसके बाल आगे से पूरी तरह उड़ चुके थे, जबकि मैं बरसों पहले, आखिरी बार संतोष से मिला था, तब तक उसकी रेशमी घुंघराली जुल्फें हुआ करती थीं। मन में यह भाव भी आया कि शायद यह कोई और होगा। लेकिन संशय तो था, क्योंकि पिछले साल संतोष से फोन पर बात हुई थी, तो उसने बताया था कि वह मेरठ से वाया बरेली, देहरादून में आ चुका हैं और करियर से असंतुष्ट होने के बावजूद अपने काम से संतुष्ट है।

मन के संशय के कारण मैंने सुनीता से फेसबुक पर पूछा कि क्या ये मवाना वाले वही संतोष वर्मा हैं? उन्होंने मेरे साथ जागरण, मेरठ में काम किया था। मैं धड़कते दिल से उनके जवाब का इंतजार कर रहा था। जब उनका जवाब दिखा, 'भुवेन्द्र जी, ये वही संतोष वर्मा है', तो दिल धक्क से रह गया। कई पल के लिए मैं ब्लैंक रह गया। फिर मन अचानक बरसों पहले चला गया।

जागरण 1984 से मेरठ में शुरू हुआ था। मैं उसकी शुरुआती टीम में था। संतोष वर्मा 1985 में आया। वह पहले मवाना से स्ट्रिंगर बना। स्ट्रिंगर उन दिनों रोडवेज की बस के ड्राइवर को खबरें लिखकर दे देते थे। रोडवेज के बस अड्डे से जागरण का चपरासी ओमप्रकाश या मूलचंद अड्डे पर जाकर अलग-अलग जगह से आने वाली बसों का इंतजार करता रहता था। फिर वह खबरों के पैकेट इकट्ठे करके ले आता था। उन्हें खोलकर संबंधित डेस्क को वे खबरें दे दी जाती थीं। संतोष वर्मा की खबरें भी इसी तरह आती थीं। लेकिन संतोष हर तीसरे दिन खुद खबरें लेकर आ जाता था। बाकी स्ट्रिंगरों की शक्ल महीने में एक बार मुश्किल से दिखती थी।

जागरण के संपादक मंगल जायसवाल जी ने एक दिन संतोष से पूछा, 'मने आप खुद खबरें लेकर क्यों आते हैं? फील्ड में रहिये और ज्यदा खबरें भेजिये।'

संतोष ने जवाब दिया, 'मंगलजी, मैं सभी स्ट्रिंगरों से ज्यादा खबरें भेजता हूं। यहां तो मैं खबरों का संपादन सीखने आता हूं। इससे मुझे पता चलता है कि खबरें किस तरह लिखी जानी चाहिएं और डेस्क वाले किन खबरों को प्राथमिकता देते हैं।'

मंगल जी यह सुनकर खुश हो गये। उन्होंने प्रादेशिक डेस्क पर काम करने वाले रमेश गोयल को बुलाकर कहा, 'मने जब भी संतोष आये, आप इनकी खबरें इनके सामने ही संपादित कीजिये। इन्हें हैडिंग और क्रॉसर वगैरा भी लगाना सिखाइये।'

यह संतोष वर्मा की परत्रकारमिजाजी से हमारा पहला परिचय था। फिर तो संतोष जब भी मेरठ आता, हम शाम को उसे भी अपने साथ चाय पिलाने गोल मार्केट ले जाते। वह आम जनता की तकलीफों की खबरों पर नजर रखता था। उसकी खबरों में कभी नामों का जमावड़ा नहीं होता था। अक्सर उसकी खबरों पर नोटिस आता, तो मंगल जी उसे बुलाते। वह कहता, 'मंगल जी, परेशान होने की जरूरत नहीं है। मेरे पास सबूत हैं इस खबर के।' 

वह खुद मंगल जी के साथ बैठकर नोटिस का जवाब लिखवाता। उस जवाब के बाद नोटिस देने वाला खामोश हो जाता। उसने रेत माफिया पर खबर लिखी, तो उसे धमकी मिली। उस पर हमला भी हुआ। सूजे हुए गाल और हाथ-पांव में खरोंचों के साथ वह अगले दिन फिर खबर लेकर हाजिर हो गया। अभय गुप्ता जी ने उससे पूछा कि क्या वे उसकी सुरक्षा का इंतजाम करें। वह उन्हें धन्यवाद देकर बोला, 'मुझे सुरक्षा की जरूरत नहीं है। मेरी खबरें ही मेरी सुरक्षा हैं। मैं सच्ची खबरें लिखने से नहीं डरता। जान जानी है, तो चली जाये। परवाह नहीं।'

उस दिन संतोष सबका अजीज बन गया। अब हमें उसके आने का इंतजार रहता। वह केवल अपनी खबरों को लेकर ही सजग नहीं रहता था। दूसरी डेस्कों की खबरें भी बनते देखना उसका शगल था। मैं खेल डेस्क पर था। मेरे पास आकर बैठ जाता। खेल की खबरों पर, उनके हैडिंग पर चर्चा करता। इस सिलसिले में उसे कई बार राकेश जी और नरनारायण जी की डांट भी पड़ गयी। वे दोनों काम करते समय बहुत एकाग्रता और तल्लीनता पसंद करते थे। जरा सी सरसराहट से भी वे परेशान हो जाते थे। संतोष से उन्होंने कई बार कहा कि अपने काम से काम रखो। संतोष इसके बाद अभय गुप्त, नौनिहाल, रमेश गोयल और विश्वेश्वर के पास बैठकर खबरों में झांकता रहता। आखिर एक दिन मंगल जी ने उससे कहा, 'मने आप डेस्क पर ही आ जाइये। आपकी रुचि खबरों के संपादन में ज्यादा है।' 

संतोष इसके लिए तैयार हो गया। पर उसने एक शर्त रखी, 'मंगल जी, आपका आदेश सिर आंखों पर। लेकिन मेरा एक अनुरोध है। मैं रोज मवाना से आऊंगा, तो वहां की खबरें भी मैं ही लिखूंगा।'

मंगल जी को और क्या चाहिए था? एक वेतन में रिपोर्टिंग और डेस्क का काम करने वाला मिल रहा था। इस तरह संतोष अब रोज दफ्तर आने लगा।

संतोष लंबे कद का, गोरा-चिट्टा, माथे तक लहराते बालों वाला बेहद चुप्पा सा शख्स था। वह कभी किसी विवाद में नहीं पड़ता था। उसकी आवाज कभी ऊंची नहीं होती थी। एक बार किसी खबर की प्लेसिंग को लेकर विश्वेश्वर और कौशल से उसका झगड़ा हो गया। उन दोनों की आवाज पूरा विभाग सुनता रहा। संतोष अपनी बात पूरी दृढ़ता से कह रहा था, मगर उसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ रही थी। आखिर रमेश गौतम जी को बीच-बचाव कराना पड़ा। संतोष की फोटोग्राफरों से बहुत जमती थी। इसकी वजह वह ये बताता था कि हर घटना की जगह पर फोटोग्राफर जरूर पहुंचते हैं, इसलिए उनसे महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाती है।

एक बार जिला सूचना अधिकारी (डीआईओ) मेरठ से कुछ पत्रकारों को लेकर मवाना गये। किसी विकास कार्यक्रम की रिपोर्टिंग कराने के लिए। संतोष मवाना से ही उनके साथ शामिल हो गया। लौटते वक्त डीआईओ ने संतोष से भी सरकारी जीप में आने को कहा। वह बोला, 'आप जाइये। मैं बस से आऊंगा।' 

डीआईओ और बाकी पत्रकारों को लगा कि वह उनका मजाक उड़ा रहा है। डीआईओ ने मंगल जी से इसकी शिकायत कर दी। मंगल जी ने संतोष से पूछा कि क्या माजरा था। उसने जवाब दिया, 'अगर मैं उनकी जीप में आता, तो मुझे उनकी प्रेस विज्ञप्ति से खबर लिखनी पड़ती। मेरे पास असली खबर है। उनके दावों को झुठलाती हुई। मैं तो वही खबर लिखूंगा।'

संतोष की वह खबर पहले पेज पर लगी। उसमें प्रशासन की बखिया उधेड़ी गयी थी। बाकी पत्रकारों ने सरकारी दावों का गुणगान किया था। अगले दिन संतोष ने सारे अखबार लहराते हुए कहा, 'आज मवाना में लोग जागरण की वाहवाही कर रहे हैं और बाकी अखबारों को गाली दे रहे हैं।'

जागरण से मैं नवभारत टाइम्स में काम करने मुम्बई आ गया, तो साल में दो बार मेरठ जाने का सिलसिला बना रहा। संतोष से जागरण और फिर अमर उजाला में मुलाकात होती रही। कभी वह जिस जोश से खुद सीखता था, अब उससे भी ज्यादा जोश से नौजवानों को सिखाने लगा था। उससे कई साल से भेंट नहीं हो पायी थी। भड़ास पर नौनिहाल के बारे में मेरी सीरीज पढ़कर उसने मुझे मेल किया था। फिर कई बार फोन पर बात भी हुई। उसने आखिरी बार कहा था कि वह आजकल देहरादून में है, जिंदगी कट रही है। मुझे उसके स्वर में कुछ निराशा लगी, तो मैंने कहा, 'यार तुम तो ऐसी बात नहीं करते। तुम कहा करते थे कि जिंदगी कटती नहीं, जी जाती है।'

उसने कहा था, 'भुवेन्द्र भाई, बहुत कुछ बदल गया है जिंदगी में।' 

मैं इसका आशय नहीं समझ पाया था।

अब उसके न रहने पर उससे एक शिकवा करने का दिल जरूर कर रहा है-

तुम बहुत जल्दी चले गये संतोष… ये क्या उम्र थी जाने की!

18 अप्रैल, 1988 को मेरठ में भुवेन्द्र त्यागी के फेयरवेल कार्यक्रम के बाद बायें से पांचवें संतोष वर्मा


 

लेखक भुवेंद्र त्यागी वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों नवभारत टाइम्स, मुंबई में सेवारत हैं. उनसे संपर्क  bhuvtyagi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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