रेपिस्ट अक्षय के घर की महिलाएं रो रही हैं…

Tahira Hasan : कल तक मीडिया इस तरह चिल्ला रहा था जैसे वह TV स्क्रीन से निकल कर सारे बलात्कारियो को फांसी पर लटका देगा और नेत्रिया भी धुआधार बहस के ज़रिये दोषारोपण कर रही थी ……लेकिन जैसा मैंने कल ही कहा था ,,आज एलेक्शन रिज़ल्ट के आगे उनको इस खबर तक दिखाने में कोइ दिलचस्पी नहीं है ..पता नहीं पीड़ित बच्ची ज़िंदा भी है की नहीं ,,,कल बिहार के सहरसा में 8 साल की दलित बच्ची की बलात्कार के बाद ह्त्या कर दी गयी लेकिन किसी को भी शायद यह दिखाने लायक बड़ी खबर नहीं लगी …न किसी को रोना आया, न कोइ हिल गया ,न किसी को डर लगा ,न किसी को ज़िंदा लाश याद आयी ….संवेदनशीलता हमारे मीडिया और नेताओं के लिए कितना सेलेक्टिव सब्जेक्ट है

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Mayank Saxena : एनडीटीवी, इंडिया टीवी और आईबीएन 7 देख कर राहत सी लगी आज…उस बहादुर लड़की का मेडिकल बुलेटिन, चुनावी बुलेटिन रोक कर दिखाया…

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Rajesh Sharma : NDTV india पर कल भी एक सार्थक कार्यक्रम देखने को मिला। दूसरे चैनल जहां इंडिया गेट की तस्वीरें दिखा कर सिर्फ सरकार और पुलिस को निशाने पर ले रहे थे वहीँ रवीश के साथ समाज के अलग अलग तबके के लोगों ने पूरे कार्यक्रम में एक सार्थक विमर्श मे भाग लिया. हमें ऐसी और चर्चाओं की और जरूरत है.

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Saroj Kumar :  दिल्ली रेप कांड में एक आरोपी अक्षय के घर पत्रकार पहुंचते हैं…अंदर घर की महिलाएं लगातार रो रही हैं…घर की तमाम दरवाजे खिड़कियां बंद रखे जा रहे हैं…पिता को उठा पुलिस थाने ले गई थी, वापस आ वे लगातार घर में बंद रह रहे हैं…ऐसे घिनौने काम करने वाले लोगों का परिवार (जिनमें महिलाएं भी हैं) किस मनोदशा में जीना पड़ता है साफ है…और मीडिया इनको किस तरह कुरेद-कुरेद एक्सक्लूसिव खबर बना रही है दीख ही रहा है. (कल कुछ लोगों का ये भी कमेंट देख रहा था कि आरोपियों के परिवार वालों ने सही से परवरिश न किया है, संस्कार न दिए हैं) मुझे किसी आरोपी से कोई हमदर्दी नहीं…. पर साथ ही हमें कुछ और चीजों पर गौर करना चाहिए…इस अक्षय का घर बिहार के औरंगाबाद जिले के सर्वाधिक पिछड़े…उग्रवाद प्रभावित टंडवा नामक छोटे जगह के गांव से है…जहां बिल्कुल ही बेरोजगारी-अशिक्षा है…अक्षय सही से पढ़ा लिखा नहीं है, किसी तरह मैट्रिक पास (ये कैसे होता है पता ही होगा) है…वह घर से बहुत पहले काम के लिए बाहर पलायन कर चुका था, पहले छत्तीसगढ़ में शराब के ठेके पर मुंशीगिरी करता था फिर दिल्ली आ गया काम करने… (अब मेरे पोस्ट का समान्यीकरण न कर दें और पितृसत्तात्मक चीजें, पुरुषवादी चीजें इनसे जुड़ी हैं..लेकिन ऐसी घटनाओं को महज रेप अपराध की तरह देखने से काम नहीं चलने वाला…केवल फांसी उपाय नहीं…)

फेसबुक से.

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