रेलवे महिला कोच का वो दर्द भरा सफर : उस औरत ने मुझे जमीन पर भी नहीं बैठने दिया

Suchitra Singh : मैं अपना एक जरूरी काम निबटाकर कुछ दिन पहले मुरादाबाद से बरेली आ रही थी। करीब पांच बजे स्टेशन से बरेली जाने वाली ट्रेन का टिकट लिया। सोचा जो ट्रेन आ जाएगी उससे ही बरेली चली जाउंगी। टिकट लेने के बाद प्लेटफार्म की तरफ मुड़ी ही थी। तभी एनाउसमेंट हुआ कि लखनऊ से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन वाया बरेली जाएगी। एनाउसमेंट सुनते ही घर जाने की जल्दी में ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ लगा दी। सीढ़ियों के पास ही महिला कोच लगा हुआ था। बस उसी कोच में चढ़ गर्इ। कोच तो महिलाओं का था मगर कोच के दोनों दरवाजों पर व कोच के अंदर पुरुषों का आधिपत्य था। चढ़ने की भी जगह नहीं थी।

गेट पर लटके लड़कों ने मुझे कहा कि मैडम अंदर डिब्बे में जगह नहीं है आप अगले डिब्बे में चढ़ जाएं। मैं उनकी बात अनसुनी करते हुए किसी तरह डिब्बे के अंदर दाखिल हुर्इ। तो देखा गेट पर लटकने वाले लड़कों की पत्नियां अपने बच्चों के साथ सीट पर कब्जा जमाए हुए थीं। लड़कों की हिदायत का मतलब समझ आ गया था। ट्रेन चलने में थोड़ा सा टाइम था। एक तो गर्मी ऊपर से डिब्बे में भीड़ भाड़ देखकर सोचा उतर जाऊ दूसरी ट्रेन पकड़ लूं। अगर ट्रेन छोड़ देती तो घर पहुंचने में काफी लेट हो जाती। किसी तरह मन को मजबूत किया और डिब्बे में वहीं खड़ी हो गर्इ।

गर्मी की वजह से पसीने से नहा रही थी। अटैची और बैग जमीन पर रखे होने के कारण ठीक से खड़ा हो पाना भी मुश्किल हो रहा था। सामने की बर्थ पर बैठी महिलाओं से आग्रह किया कि मुझे बरेली तक ही जाना है कृप्या थोड़ी सी जगह दे दें। मेरी बात को उन्होंने अनसुना कर दिया। दुबारा आग्रह पर कहा कि आगे जाकर जगह तलाश लो। यहां जगह नहीं है। उसी बर्थ पर एक महिला अपने पांच बच्चों के साथ बैठी थी। बाकी दो अन्य महिलाएं छोटे बच्चे की दुहार्इ देकर बर्थ पर फैलकर बैठी थी। अपने नन्हे बच्चों को खिलाने में मशगूल थीं।

मैंने पांच बच्चों की महिला से आग्रह किया कि कुछ देर के लिए अपने किसी एक बच्चे को उपर की बर्थ पर बिठा दें। बरेली के बाद उसे नीचे बिठा लीजिएगा। मगर उन महिलाएं पर कोर्इ असर नहीं हुआ। ट्रेन चल पड़ी थी। सभी महिलाएं शायद गोरखपुर जा रहीं थीं। कुछ पति अपनी पत्नियों के साथ ही सीट पर कब्जा जमाए बैठे थे। पास ही में एक अटैची पड़ी थी। जिसे हटाने के लिए कहा तो महिला का पति बरस पड़ा कि अटैची नहीं हटा सकता, तुम कहीं और जाकर खड़ी हो जाओ। मैं खड़ी ही रही।

इस बीच सामने बर्थ की एक महिला अपने बच्चे को टायलेट कराने चली गर्इ। दो मिनट के लिए मैं उसकी जगह पर बैठ गर्इ। मेरे पीछे ही एक और महिला भी उसी बर्थ पर बैठ गर्इ। हम दोनों ही काफी आराम से बैठे थे। इसी बीच ही महिला वापस आर्इ। सीट पर हम दोनों को बैठा देखकर आग बबूला होकर बोली हम कहि रहे हैं यहां से हटि जाओ हम र्इहां पर बैठे थे। तुम कहीं और जाकर बैठि जाओ। उस की बात सुनकर मेरे पीछे बैठी महिला खड़ी हो गर्इ। मैंने उससे कहा कि कुछ देर के लिए प्लीज ऐसे ही बैठ जाओ, मैं थोड़ी सी जगह में बैठी हूं। मगर उसने मेरी एक न सुनी और हाथापार्इ पर उतर आर्इ।

हटि जाओ यहां से हटि जाओ कहती हुर्इ उसने मुझे सीट से धक्का दे दिया। उसकी हरकत को देखते हुए मैं जमीन पर ही बैठ गर्इ। एक औरत की दूसरी औरत के प्रति इस तरह की संवदेना देखकर मुझे हैरानी हुर्इ। मैं सीट से नीचे जमीन पर ही बैठ गर्इ। सोचा कुछ देर बैठने के बाद खडे़ होकर ही बरेली तक चली जाउगी। मगर उस औरत की संवदेनहीनता की हद देखिए उसने मुझे जमीन पर भी नहीं बैठने दिया क्योंकि उसका बैग सीट के नीचे था जिसकी वजह से उसने मुझे वहां से भी हटने की हिदायत दे दी।

उसकी इस हरकतों का साथ बाकी महिलाएं भी दे रहीं थीं। मेरे नहीं हटने पर उसने अपने बच्चे को रूलाना शुरू कर दिया। कहा कि देख ल्यो मैडम बचवा परेशान हो रहन यहां से हटर्इ जाओ। महिलाओं के पति भी उनके खैरख्वाहा बनकर मुझसे उलझ गए। खैर काफी देर बहसबाजी चलने के बाद मुझे खड़ा होना पड़ा। खिड़कियों व दरवाजों पर महिलाओं के पति और बच्चों ने कब्जा जमा रखा था जिससे हवा अंदर नहीं आ रही थी। सफोकेशन हो रहा था। बेइंतहा गर्मी होने की वजह से मेरी तबियत बिगड़नी शुरू हो गर्इ। सिर दर्द तेज होने लगा। बैग में हमेशा कुछ इमरजेंसी दवाएं लेकर चलती हूं। बैग टटोला तो दवा नहीं थी। शायद घर पर ही भूल गर्इ थी। दर्द बढ़ता ही जा रहा था।

मेरी आंख से आंसू निकलना शुरू हो गए। दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था। सब मेरी तरफ देखने लगे। मगर उस डिब्बे में एक भी महिला की आत्मा मेरे लिए नहीं पसीजी। मुझे दर्द में देखकर भी किसी ने मुझे बैठने को नहीं कहा। तब लगा कि भगवान ने अपनों को शायद इसलिए बनाया है। तभी मेरा सूट को पकड़कर किसी के खींचने का आभास हुआ। देखा तो एक मासूम सी बच्ची अपने बैग की तरफ इशारा करके बोली दीदी आप यहां बैठ जाओ आपको दर्द हो रहा है। उसकी हमदर्दी से दर्द को एक पल के लिए भूल गर्इ। सोचा गाड़ी रामपुर रुक जाएगी तो मैं स्टेशन उतरकर दवा ले लूंगी और बस से चली जाउंगी। मगर ट्रेन रामपुर नहीं रुकी।

सिर दर्द बढ़ता ही जा रहा था। इसी बीच गाड़ी एक अनजान जगह रुकी। मैंने डिब्बे से उतरकर गार्ड के डिब्बे का रुख किया। सोचा उसे मदद मागूंगी। गार्ड अपने डिब्बे में नहीं था। मगर उसने मुझे अपने डिब्बे में चढ़ता हुआ देख लिया था। वह गुस्से से मेरी तरफ बढ़ा और मेरे कुछ भी कहने से पहले उसने मुझे अपने डिब्बे से नीचे उतरने की हिदायत दे डाली। जिसे सुनकर मैं नीचे आ गर्इ। मैंने उससे पूरी बात बताना चाहा मगर उसके पास मेरी बात सुनने का समय नहीं था।

उसने कहा मैडम मैं कुछ सुन नहीं पाउंगा आप महिला कोच में ही बैठ जाएं। फिर भी बस किसी तरह मेरे मुंह से तबियत शब्द निकला जिसे वह सुन सका। उसने मुझे महिला कोच में बैठने का फरमान दे दिया। मैं महिला कोच में वापस चढ़ गर्इ। गार्ड भी मेरे पीछे महिला कोच में चढ़ा। वहां उसने कहना शूरू कर दिया कि एक एक को डिब्बे से नीचे उतार दूंगा मैडम को बैठने की जगह दो। मैडम की तबियत खराब है। फिर एक आदमी को उसने सीट से उठा दिया। वहां मुझे बैठने को कहा।

उस सीट पर बैठकर मैं बरेली तक पहुंची। एक मन किया कि जाकर रेलवे शिकायत पुसितका में महिला कोच का हाल बयां करूं। मगर मेरी तबियत खराब होने की वजह से मुझे सिर्फ घर नजर आ रहा था। एक एक पल भारी था। हैरानी दो बातों की थी कि एक तो महिलाओं की असंवेदनशीलता, दूसरा जहां महिलाओं की हिफाजत के कानून बनाते बनाते सरकार हांफ रही है। वहां आम जिंदगी में सुनने वाला कोर्इ नहीं है। मुझ जैसी न जाने कितनी महिलाओं को हर रोज ऐसे ही वाकये से गुजरना पड़ता होगा। अगर महिला कोच में सरकारी नियमों पालन हो रहा होता तो शायद मेरा सफर दर्द भरा न होता।

सुचित्रा सिंह के फेसबुक वॉल से.

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