रोहित शेखर की ईमानदारी, लड़ाई और जीत को सलाम

Mayank Saxena  : एनडी तिवारी से पत्रकार पूछ रहे थे, "तो क्या आप रोहित शेखर को अपना बेटा मानते हैं…अपना वारिस मानते हैं…"

एनडी तिवारी बार बार जवाब टाल रहे थे…फिर अचानक अपनी उपलब्धियां गिनाने लगे…पत्रकारों ने फिर पूछा तो बोले, "आप मुझ से क्या सुनना चाह रहे हैं…"

इस बार जवाब पत्रकारों ने नहीं रोहित शेखर ने ख़ुद दिया, "ये वही सुनना चाह रहे हैं, जो मैं सुनना चाहता हूं…आप जो बंद कमरे में मुझ से कहेंगे, यहीं कह दीजिए…कोर्ट भी सबकुछ कह चुका है…भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 मेरे साथ है…आप मेरे संविधान किस के साथ हैं…"

जीवन का आखिरी राजनैतिक दांव खेलने आए, एन डी तिवारी समझ नहीं पा रहे थे…हारे, खिसियाए और किंकर्तव्यविमूढ़ तिवारी ने शेखर की हां में हां मिलाई…

शेखर कह रहे थे, "क्या आप संविधान को मानते हैं…क्या आप मुझे मानते हैं…क्या आप मेरी मां को सम्मान देंगे…क्या मुझे पहचान देंगे…"

रोहित शेखर के चेहरे की नसें तनी हुई थी…हारे तिवारी जी, हां में हां मिलाते जा रहे थे…रोहित शेखर कहते जा रहे थे, "मैं कैसे किसी का भरोसा करूं, जो कुछ मेरे और मेरी मां के साथ हुआ है…"
तभी तिवारी जी के सचिवों ने कहा कि गले लगा लीजिए…तिवारी जी रोहित शेखर को गले लगाने लगे…लेकिन रोहित शेखर बोलते रहे…"गले लगा लिया है…लेकिन ये बताइए कि क्या ये अंत है…क्या अब तक जो छल कपट मेरे साथ हुआ, वो करेंगे…बताइए…करेंगे…करेंगे…"

तिवारी जी के पास कोई विकल्प नहीं था…बोले, "नहीं-नहीं…अब कोई छल-कपट नहीं होगा…"

रोहित शेखर के चेहरे पर कोई खास दया या अपनत्व का भाव नहीं था…वो जानते थे कि उनकी ये जीत बड़ी है लेकिन तभी जब एन डी तिवारी अपने जाने से पहले दुनिया को जता कर जाएं कि उनकी गलती थी…और इसके लिए तिवारी जी के पास वक़्त बहुत कम है, और काम बहुत ज़्यादा…

रोहित शेखर आज भी भावनाओं में नहीं बहे…रोहित शेखर की लड़ाई और जीत को…उनकी आज तक की…और आज की ईमानदारी को सलाम…

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

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