लखनऊ के दस नंबरी पत्रकार (तीन) : मंत्री-संतरी के घर मत्‍था टेकने पहुंचते हैं घोषित दलाल पत्रकार

लखनऊ : वैसे, पत्रकारों को पिटने का ही शौक नहीं है, कई पत्रकार तो हत्‍या जैसी करतूतों में लिप्‍त रहे हैं। एक साप्‍ताहिक चौपतिया लाल अखबार के संपादक तो स्‍वतंत्र भारत नामक अखबार के उप मुख्‍य संपादक की हत्‍या में नामजद रहे हैं जब विधानसभा मार्ग पर स्थित इस अखबार के दफ्तर में इस पत्रकार की चाकू घोंप हत्‍या कर दी गयी थी। माजरा था, औरतों के लफड़ा का। दो पत्रकार एक गरीब युवक की पिटाई और उसकी हत्‍या के बाद उसकी लाश लखनऊ के बाहरी इलाके में एक कुएं में फेंकने में मुल्जिम रहे हैं। लेकिन हत्‍या ही नहीं, एक पत्रकार की हत्‍या जमीन की दलाली के चलते हुई थी। कहते हैं कि इस पत्रकार के करीबी रिश्‍तेदार ने ही मिलकर यह हत्‍या करायी थी।

दारू में टुन्‍न एक बकैत पत्रकार ने एक दारोगा को पीटा, गालियां देते हुए सीओ का बिल्‍ला नोंचकर वर्दी फाड़ी और उसे सस्‍पेंड करा दिया। मुद्दा यह बनाया गया कि पत्रकार जैसे इस शरीफ को इस सीओ ने जान से मारने की साजिश की थी। बात का खुलासा होने लगा तो यह पत्रकार दूसरों पत्रकारों के दरवाजे-दरवाजे पर गिड़गिड़ाते दिखने लगा। अब यह पत्रकारों के हितों के लिए कमर कसे है। लेकिन मृत पत्रकारों के परिजनों को आर्थिक मदद वाली अर्जी तक को फाड़-फेंक दिया था इस नेतानुमा दलाल पत्रकार ने। पत्रकारों ने जब उस अर्जी की कैफियत पूछी तो जवाब दिया कि अर्जी तो मुख्‍यमंत्री के पास भेज दी गयी है। लेकिन बाद में जब कड़ी पूछतांछ की गयी तो इस पत्रकार ने कुबूला कि अर्जी खो गयी है। हैरत की बात नहीं कि ऐसे ही पत्रकार बीस हजार रोजाना से भी ज्‍यादा का खर्च करने की हैसियत में हैं, जबकि उनकी जायज आमदनी धेला तक नहीं। घर पर वे पत्रकारों से मिलने की गुरेज रखते हैं, लेकिन दलाल अफसरों की टोली उनके घर में जमावड़ा लगाती है। कोई अगर कहीं-कभी भूले अपना काम बताते मिला, तो जवाब कि कम से कम पिछले दस साल से माता जी की हालत मरणसन्‍न है।

चुनाव के वक्‍त ही मेंढक की टर्राने वाले पत्रकारों के सारे दावे सिर्फ कागजी। उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति चुनाव के लिए रची जाती हैं घिनौनी राजिशें, पत्रकार हितों के नाम पर। खुद पत्रकार नहीं हैं, लेकिन मुख्‍यमंत्री और अफसरों की डेहरी पर रोज माथा टिकाने पहुंच जाते हैं। घोषित दलाल हैं वे। श्रमजीवी पत्रकार संघ ने उन्‍हें सचिव का ओहदा नवाजा है। इसके लिए कीमत भी अदा की गयी है। निर्भीक और घाकड़ पत्रकारों को बांदा-हमीरपुर वाले बादशाह सिंह और गोरखपुर वाले योगी आदित्‍यनाथ का अन्‍न भी गले उतार दिया गया। लेकिन पत्रकारिता और पत्रकारों की बेहाली के खिलाफ कभी भी न तो कभी इस पत्रकार ने कुछ किया और न ही इस पत्रकार के गॉडफादर ने। जबकि गोरखपुर के ही एक पत्रकार को वहीं के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक ने दिनदहाड़े लाठियों से सड़क पर बिछा दिया था, लेकिन इन पत्रकार-नेताओं ने एक भी शब्‍द भी अपने होंठों से नहीं निकाला। कहने की जरूरत नहीं कि यह पत्रकार की रोजी-रोटी पुलिसिया अफसरों के रिश्‍तों पर ही चलती है।

…जारी…

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व न्यूज चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

संबंधित अन्य खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- दस नंबरी पत्रकार

कुमार सौवीर से संबंधित अन्य खबरें- भड़ास पर कुमार सौवीर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *