लखनऊ जेल में कैदी पर जानलेवा हमला, जेल प्रशासन मौन

नौशाद पुत्र मो. शफी जिला करागार लखनऊ में उच्च सुरक्षा सी ब्लाक में कैद है। उसने अपने अधिवक्ता मु0 शुऐब को 14 फरवरी 2013 को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि दिनांक 8 फरवरी 2013 को उसने अपनी बीमारी की स्थिति में उच्च सुरक्षा के काल बुक में अपना नाम लिखवाकर जेल अस्पताल भिजवाया था। उस दिन लगभग 4 बजकर 45 मिनट पर उच्च सुरक्षा के स्टाफ रुम में डाक्टर राजेश ने नौशाद को देखने के बाद दवा दी जिसे लेकर कर वो वापस सी ब्लाक जा रहा था।

रास्ते में उच्च सुरक्षा के डी ब्लाक के कैदी अजीजुद्दीन ने पीछे से नौशद के सर पर जानलेवा हमला करके उसके सर पर चोट पहुंचाई जिससे उसका सर फट गया तथा उस कैदी ने अपने दातों से नौशाद का गला काटा जिससे जख्म बन गया तथा उसे मुहम्मद अख्तर और सज्जादुर्रहमान ने बचाया। कुछ फासले पर हेडवार्डर हरपाल भी मौजूद थे। लेकिन वो कुछ नहीं बोले। इससे पहले कई बार अजीजुद्दीन नौशद को जान से मारने की धमकी दे चुका था। जिसकी शिकायत नौशाद द्वारा अधीक्षक महोदय को करने के बावजूद उनके द्वारा कोई कार्यवाई नहीं की गई।

नौशाद की मरहम पट्टी आदि जेल अस्पताल में कराई गई, लेकिन अधीक्षक महोदय से बार-बार निवेदन करने के बावजूद अजीजद्दीन के खिलाफ न कोई एफआईआर दर्ज कराई गई और न ही उसके खिलाफ जेल प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाई की गई। बल्कि जेल अधिक्षक धति राम मौर्या, उच्च सुरक्षा डिप्टी इन्चार्ज गिरीश, हेडवार्डर हरपाल तथा सिपाही श्रीराम सजीवन द्वारा उल्टे नौशाद पर सख्ती की जाने लगी और उससे कहा गया कि वह जेल में चुपचाप पड़ा रहे अजीजुद्दीन के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की जाएगी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को छोड़ने का वादा किया था पर उस वादे पर अब तक कोई अमल नहीं हुआ उल्टे प्रदेश की राजधानी लखनऊ जेल के ये हालात हैं तो प्रदेश की अन्य जेलों का आकलन लगाया जा सकता है कि वहां क्या हालात होंगे। इससे पहले भी जेल अधीक्षक धतिराम मौर्या द्वारा तारिक कासमी और अन्य कैदियों के साथ जुलाई 2012 में रमजान के महीने में सांप्रदायिक आधार गाली-गलौज व गलत व्यवहार की शिकायतें आ चुकीं हैं। लखनऊ जेल में आतंकवाद के नाम पर तकरीबन 32 कैदी हैं जिन्हें हाई स्क्योरिटी के नाम पर 23 घंटे से ज्यादा बैरकों में रखा जाता है। जिससे उन पर शारीरिक व मानसिक तौर पर बीमारियां भी घर कर रहीं हैं। ऐसे में जरुरी हो जाता है कि इन कैदियों को जेल मैनुवल के हिसाब से जेल में सुविधाएं दी जाएं।

लखनऊ जेल में नौशाद के ऊपर हुआ यह हमला जेल प्रशासन की एक खतरनाक सोची समझी साजिश का नतीजा था। नहीं तो जेल प्रशासन द्वारा इस मामले को दबाया नहीं जाता और लखनऊ जेल प्रशासन अपराधी के खिलाफ मामला दर्ज करता। लेकिन लखनऊ जेल प्रशासन ने ऐसा कुछ नहीं किया उल्टे नौशाद पर ही पाबंदी लगाने लगा और उसे चुप रहने की धमकी दी। इसी तरह की एक घटना अगस्त 2012 में पुणे की यर्वदा जेल में हुई। जिसमें एक कैदी के द्वारा आतंकवाद के आरोप में बंद बाढ़समेला, दरभंगा, बिहार निवासी कतील सिद्दीकी की हत्या जेल प्रशासन ने करवाई। ऐसे में यह मामला गंभीर हो जाता है।

लखनऊ जेल में आतंकवाद के नाम पर कैद तकरीबन 32 कैदी हैं। बार-बार यहां के जेल प्रशासन पर सवाल उठता रहा है। ऐसे में हमें आंशका है कि जेल प्रशासन इन कैदियों की हत्या करवा सकता है। अगर ऐसी कोई भी घटना होती है तो इसके जिम्मेवार प्रदेश के मुख्यमंत्री व जेल मंत्री होंगे क्यों वे जेल प्रशासन के खिलाफ किसी भी कार्यवाई से बचते रहे हैं।

जिला जेल लखनऊ के अधीक्षक धतिराम मौर्या, उच्च सुरक्षा डिप्टी इन्चार्ज गिरीश, हेडवार्डर हरपाल तथा सिपाही श्रीराम सजीवन को निलंबित करते हुए विभागीय जांच कराई जाय तथा इन सबके और अजीजुद्दीन पुत्र जहीरुद्दीन बंदी उच्च सुरक्षा वार्ड जिला लखनऊ के खिलाफ उपर्युक्त घटना के सम्बंध में आपराधिक मामला दर्ज कराया जाए। प्रदेश के मुख्यमंत्री व जेल मंत्री आतंकवाद के नाम पर कैद कैदियों से जेल में जाकर मिले और सांप्रदायिक जेल कर्मियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्यवाई कर प्रदेश की जेलों में जेल मैनुवल के अनुसार कैदियों को रखे जाने की गारंटी करें।

एसआर दारापुरी, संदीप पांडे, मु. शुएब, मो. सुलेमान, मसीहुद्दीन संजरी, मो. सलीम, शाहनवाज आलम, राजीव यादव की तरफ से यूपी के जेल मंत्री को भेजा गया पत्र.


नौशाद द्वारा अपने अधिवक्ता मु. शुएब को दिया गया पत्र इस प्रकार है…

मैं नौशाद पुत्र मु. शफी उच्च सुरक्षा सी ब्लाक जिला कारागर लखनऊ में निरुद्ध हूं कि 8/2/13 को मैं बीमार था मैंने उच्च सुरक्षा के काल बुक में अपना नाम लिखवाकर जेल अस्पताल भिजवाया. शाम को लगभग 4ः45 बजे पर डा. राजेश साहब आए उच्च सुरक्षा के स्टाफ रुम में बैठे डाक्टर साहब ने मुझे दवाई दी. मैं दवाई लेकर अपने सी ब्लाक में वापस आ रहा था. तभी अचानक डी ब्लाक से आया अजीजुददीन नाम का कैदी पीछे से मेरे सर पर जानलेवा हमला कर दिया. इससे मेरा सर फट गया फिर उसने दातों से मेरे गले के नीचे काटा जिससे जख्म बन गया. वहां पर मौजूद बन्दी मु. अख्तर व सज्जादुररहमान ने मुझे बचाया. कुछ फासले पर हेड वाडर हरपाल भी मौजूद थे. वह भी आये मेरा सर खून से लहुलहान देखकर अजीजुददीन वहां से फरार हो गया.

जब कोई बन्दी उच्च सुरक्षा का बीमार होता है तो डाक्टर साहब को दिखाने के लिए उच्च सुरक्षा के काल बुक में नाम लिखवाकर जेल अस्पताल भेजा जाता है, तब डाक्टर साहब आते हैं, जबकि अजीजुददीन कैदी को डाक्टर साहब को दिखाने की किसी तरह की कोई रिपोर्ट नहीं थी. अजीजुददीन साजिशन कसदन मुझ पर हमला करने के लिए आया था. वह इससे पहले भी कई बार मुझे जान से मारने की धमकी दे चुका था. इसकी शिकायत मैंने अधीक्षक से भी की थी पर अधीक्षक साहब ने मेरी शिकायत पर कोई तवज्जह नहीं दी.

अजीजुददीन पैसे के बल पर उच्च सुरक्षा के किसी भी ब्लाक में आता जाता रहता है. तभी तो पैसे के बल पर ही डाक्टर के बिना किसी रिपोर्ट के मुझ जानलेवा हमला करने के लिए आया और जानलेवा हमला करके चला गया. उसके बाद मुझे जेल अस्पताल ले जाया गया, जहां मैंने पहले अपनी चोटों का मेडिकल कराया. उसके बाद जख्मों पर पट्टी करवाई मेरा कुर्ता और रुमाल खून से भरा हुवा है. मैंने अधिक्षक साहब को अजीजुददीन के खिलाफ एफआईआर करने के लिए एप्लीकेशन दी पर अभी तक न ही एफआईआर हुई और न ही अजीजुददीन के खिलाफ किसी तरह की भी कारवाई की.

इतनी बड़ी घटना होने के बाद अधीक्षक का कोई एक्शन न लेना इससे साफ जाहिर होता है कि अधीक्षक भी पैसे खाकर खामोश हो गया है. उल्टे मुझे ही अधीक्षक कहते हैं चुपचाप खामोश होकर जेल में पड़े रहो, हम अजीजददीन के खिलाफ कोई कारवाई नहीं करेंगे, जो तुम्हें करना हो कर लो. यह जानलेवा हमला जेल वालों ने साजिशन करवाया है ताकि हाईकोर्ट में जो हमारे खुलने की रिट दाखिल है उसपर असर पड़ जाये, जबकि यह हमला दूसरे ब्लाक से आकर कैदी ने किया है.

जिनके खिलाफ एफआईआर करवानी है, उनके नाम इस प्रकार हैं- 1- जानलेवा हमला करने वाला अजीजुददीन पुत्र जहीरुददीन 2- पैसे लेकर हमला कराने वाले जेल अधिक्षक 3- उच्च सुरक्षा डिप्टी इनचार्ज गिरीश 4- उच्च सुरक्ष हेडवाडर हरपाल 5- सिपाही सुरक्षा रामसजीवन।

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