लखनऊ में तीन दिन : जुआ, बारात, नाच, दारू और कविता

कई तरह के विवादों में घिरे रहने वाले लखनऊ प्रेस क्लब में मैं भी विवादित काम कर आया. दो दिन लगातार चार-पांच घंटे जुआ खेला, मदिरा भरी गिलास सुड़कते, फिश और चिकन पर हाथ फेरते. ज्यादा नहीं, दो-चार हजार के करीब हार कर दिल्ली लौटा हूं.

कई नए पुराने साथियों से लखनऊ में मिलना अच्छा लगा. चाहें वह अमर उजाला वाले मनोज श्रीवास्तव हों या दैनिक जागरण वाले राज बहादुर सिंह. इन दोनों से रात में प्रेस क्लब में पियक्कड़ी के दौरान मुलाकात हुर्ई, गिलासें चार हुईं, गायन-वादन का दौर चला. इन दोनों साथियों का सदा प्रेम व सहयोग भड़ास को मिलता रहा है.

बाद में ये दोनों साथी मुझे और भड़ास से जुड़े साथी विवेक सिंह को मीरा बाई मार्ग पर स्थित स्टेट गेस्ट हाउस तक छोड़ने भी आए.

स्नेह हो तो ऐसा 🙂

गायन के मामले में विवेक सिंह नए कीर्तिमान स्थापित करते नजर आ रहे हैं. इन्हें गाता देखकर लगता है कि जल्द ही भड़ास बैंड मूर्त शक्ल लेने वाला है. सदाबहार सिद्धार्थ कलहंस से लेकर स्वामी कुमार सौवीर तक और युवा हरिशंकर शाही से लेकर डीएनए वाले आदित्य शुक्ला तक, दर्जनों नए-पुराने साथियों से मेल-मुलाकात के दौरान दो कवियों से मिलना और उन्हें सुनना सबसे खास रहा.

अपने नए उपन्यास 'बखेड़ापुर' के कुछ अंश सुनाते साहित्यकार और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय


डायचेवेले जर्मनी में लंबे समय से कार्यरत उज्जवल भट्टाचार्या और जनसंदेश टाइम्स में फीचर एडिटर हरे प्रकाश उपाध्याय को दो अलग-अलग दिनों अलग-अलग मौकों पर सुना. दोनों अदभुत आदमी हैं. बेहद सरल, सहज और मिलनसार. यारों के यार. बनारस निवासी और अब जर्मनी वासी उज्जवल दादा से पहली बार मिलकर लगा ही नहीं उनसे पुराना परिचय नहीं है. दादा के कविता पाठ का एक कार्यक्रम प्रेस क्लब में रखा गया जिसमें मैं भी शरीक हुआ. इस आयोजन के बारे में सिद्धार्थ कलहंस ने अपने एफबी वॉल पर दादा की एक कविता के साथ यूं प्रकाशित किया है…

Siddharth Kalhans : आज शाम यूपी प्रेस क्लब में जाने माने कवि, अनुवादक, रेडियो पत्रकार (डायचे वैले के साथ 30 सालों से जुड़े रहे) और बनारसी उज्ज्वल भट्टाचार्य जी को सुनना एक सुखद अनुभव रहा। आज दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के चलते यातायात की बाधा ने कईयों के आने में बाधा डाली पर मशहूर आलोचक वीरेंद्र यादव, लविवि से अध्यापक रुद्र प्रताप, भाई पवन उपाध्याय एडवोकेट, भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह, वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर, साथी रामकुमार, मीडिया दरबार के सुरेंद्र ग्रोवर, मसउद अख्तर, भाई व्योमकेश, डीएनए के आदित्य शुक्ला और पायनियर के डीएनई रहे केसी खन्ना ने शाम को यादगार बनाया। आज की पहली कविता सुबोध सरकार की बांग्ला कविता 'मणिपुर की मां' का अनुवाद रही और अंत में बनारस का एक सैटायर। तो लीजिए 'मणिपुर की मां' को यहां पढ़िए…

मणिपुर की माँ

नग्न उठ खड़ी हुई मेरी मणिपूर की माँ
इसी माँ की दो आँखों से मिली हैं आँखें
सिर से नख तक भाषा मिली है, मिला सा-रे-गा-मा
नग्न उठ खड़ी हो गई मेरी मणिपूर की माँ

मनमानी है पुलिस, आर्मी, सरकार की
रस्तों में कर्फ़्यु, धूँए की लहर चारमीनार की
किसी को कुछ भी कहना नहीं है, कहना भी क्या
नग्न उठ खड़ी हो गई मेरी मणिपूर की माँ

दौड़ती आर्मी की जीप देखे बच्चा-बच्चा
जीप का हार्न बजाता सारे जहाँ से अच्छा
आर्मी जीप में बेवस लड़की कुलबुलाती
आर्मी जीप में चोली उसकी फ़ाड़ी जाती

घर वापस गर लौटती है वह लड़की
आसमान के नीचे मरती वह लड़की
मिटा चुकी है पुलिस तो उसका नाम
घर कहाँ है? इम्फ़ाल से दूर कोई ग्राम!

ऐसा होता है हर रोज़ हर घड़ी
पड़ी रहती है रास्ते पर कोई कन्या
ग़ायब हो चुकी शायद उसकी बहना
किसी शाख से लटकती उसकी चुनरी

लेकिन आज इस जुलाई में टूट गई हर सीमा.

उठ खड़ी हो जाओ मणिपूर की माँ
उठ खड़ी हो दूध पिलाने वाली सीने से
देखो माँ के सीने पर हैं कितनी नसें
कैसा लगता है नग्न होती है जब माँ

आसाम राइफ़ल्स के सिपाही बंद करते हैं गेट
देखो जहाँ से आए तुम उस माँ का पेट
उफ़न उठती है वहाँ से एक गरम सी गंगा
मणिपूर की माँ देती माँ को नई संज्ञा

जलूस में आज निकल पड़ी है नंगी माई
स्थलनायक, जलनायक, तुम कहाँ थे भाई?
सोचते हो क्या अब भी है देवी तुम्हारी वह माँ?
जल चुकी है, जल चुकी है…
हर माँ के अंदर बसी हमारी वह माँ.


मयंक-इला की शादी में शादी के दिन शाम सात बजे पहुंचना था और इधर स्टेट गेस्ट हाउस में जहां मैं-विवेक रुके था, वहां दारू का दौर चल रहा था. दयानंद पांडेय और कुमार सौवीर के साथ वहां से उठते निकलते रात के आठ साढ़े आठ फिर नौ बज गए. शादी में पहुंचे तो बारात का उत्सवी माहौल चरम पर था. गाजे-बाजे का दौर, दूल्हे राजा की धीमी गति से बढ़ रही फूलों लदी कार, महिलाएं और पुरुषों के अलग-अलग डांस ग्रुप नाचने गाने में मगन. बस, कुछ मिनट आब्जर्व किया, खुद को मानसिक रूप से तैयार किया और कूद पड़े डांस फ्लोर पर. फिर तो देर तक चला कूद-फांद, डांस का दौर, पैसा लुटाने, खाने-पाने  का दौर. दयानंद पांडेय, कुमार सौवीर, उज्जवल भट्टाचार्या, विवेक सिंह… सबके नाचने का अंदाज अपना अपना. जैसे शंकर के बाराती हों, अपने अपने तरीके से कूदते फांदते…

बीच में उज्जवल भट्टाचार्या, बिलकुल बाएं दयानंद पांडेय.


स्वामी कुमार सौवीर, जो इस धरती पर हैं भी और नहीं भी हैं, उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करते भड़ास से जुड़े युवा पत्रकार विवेक सिंह.


दिल्ली पहुंच कर फेसबुक को नीचे से उपर तक निहारा तो ज्यादातर जगह राजेंद्र यादव यौन उत्पीड़न कांड पर साहित्यिक गाली-गलौज का माहौल पाया.. तर्क-वितर्क, पक्ष-विपक्ष में पोस्टों, टिप्पणियों का भरमार पाया.. सो फौरन मैंने भी अपनी जबरन उपस्थिति दर्ज कराने के लिए दो पोस्ट डाले, जो यूं है…

Yashwant Singh : नेताओं की चीप हरकत सत्ताधारियों की तथास्तु से मिट जाती है…
अफसरों की चीप हरकत जांचों की फाइलों में दम तोड़ जाती है…
संत की चीप हरकत भगवा-भगवानी चोले के कारण ढंक जाती है…
साहित्यकार की चीप हरकत उसके ज्ञान-तर्क भंडार में छुप जाती है…
पर हमारी-तुम्हारी सामान्य हरकत भी चीप उर्फ 'बीप बीप' कही जाती है…
चीप दौर में चीप कामकाज ही टीआरपी भंडार है, मोक्ष-महानता का आधार है…
सो समझो मानुष चीप एंड बीप ज्ञान, छोड़ो लोकलाज, छेड़ो जमकर हर किरदार…
—-
(दिल्ली पहुंच कर ढेर सारे फेसबुकी प्रवचनों, ज्ञानों, पोस्टों, कमेंट, उलाहनों, धिक्कारों को पढ़ने के उपरांत मन-मस्तिष्क में जली आइडिया की घंटी और फूटी ये महान कविता… स्वीकारें प्रभु लोग, एक छोटे चीप बीप की तरफ से ये पेशकेश)


Yashwant Singh : बड़ी-बड़ी बहसों, चिंतनों, ऐलानों, दावों-प्रतिदावों, धिक्कारों, फटकारों, चीत्कारों, बलात्कारों, छलात्कारों, उपदेशों, समझाइश, चक्रमण, दहाड़ में उलझे मेरे फेसबुकी छोटे-बड़े मित्रों-साथियों को मैं अपना एक छोटा-सा दुख बताना चाहता हूं.. (बस, प्लीज इसे आप लोग बहुत घटिया, छोटी, नीच, इंटरटेन न करने लायक बात न मानें और मान भी लें तो बदले में मुझे गरियाते हुए दौड़ाएं न, उपदेश देकर सताएं न) … कि… …मैं लखनऊ गया था और प्रेस क्लब में दो दिन जुआ खेलते हुए करीब तीन-चार हजार रुपये हार गया हूं…

Mohammad Anas Haaahaaaa

Ravi S Srivastava badhiya hai pap kata,
 
Sanjaya Kumar Singh पैसे का बड़ा सीधा सा नियम है – जैसा आता है वैसे जाता है। ऐसे ही आया होगा। चिन्ता की बात नहीं है।
 
Ajit Tripathi हाहाहाहाहा गजब सर, गरदा…..बधाई के पात्र हैं आप, कहिए तो दिल्ली के प्रेस क्लब में आपको सम्मानित करने का एक आयोजन कर लिया जाए…
 
Siddharth Kalhans और बचा खुचा शादी की खुशी में नाचते हुए उड़ा दिया। यहां तक कि जेब में पड़े विजिटंग कार्ड तक
 
Amol Saroj do din me bs char hajaar
 
Yashwant Singh अरे सिद्धार्थ भाई, सारे भेदवा खोल देंगे का… मैं तो एक ही भेद लीक करना चाहता था, पर आपने एक और जड़ दिया… कोई नहीं, संजय भाई ने उपर सही लिखा है, जैसे आता है, वैसे जाता है… जनता ने दिया था, जनता के पास चला गया….
 
Yashwant Singh अमोल सरोज जी. हम लोग बेसिकली देहाती जुआड़ी है, सौ-दो सौ रुपये की हार जीत से अगले कई रोज की नींद प्रभावित होती है…
 
Abhishek Parashar Hahaha.
 
Siddharth Kalhans लेकिन वहां तो सब लेने वाले ही थे, देने वाले कहां थे
 
Yashwant Singh सिद्धार्थ जी, कई लोग गेस्ट हाउस आकर रंगदारी लिफाफे में दे गए थे.. सच में… अब आपसे वसूल नहीं पाता तो ये क्यों मान लेते हैं कि दूसरों से भी नहीं लेता
 
Siddharth Kalhans आप जुआ बड़े आदमियों की तरह दिल खोल कर खेल रहे थे सो हार गए। गांठ दबा कर खेलना था। मैनें पहले समझा भी दिया था। पर वहां भी ठकुरैती दिखा दी
 
Yashwant Singh चार-पांच ठाकुरों से घिरा हुआ शख्स खुद ब खुद ठकुरैती की राह पर बढ़ जाता है.. वाइब्रेशन भाई वाइब्रेशन..
 
Zakir Hussein Yashwant Singh…..स्प्राईट पियो …..हार के बाद जीत है जय हो
 
Harishankar Shahi काहें बका रहे हो भैवा, खुदे जुआ खेले के खातिर परेशान रहे और हार गए तो बात बना रहे हो. वैसे पूरे रंग ओ जोश मे तर थे.
 
Mansi Manish Chalo achha huaa khud ko daanv pe Nahi lagaya
 
Mayank Chetan बारात होती ही इसीलिए है । यकीन मानिए ये आर्ट आफ मैरेज अटेण्डिंग हैँ ।:-D
 
Siddharth Kalhans यशवंत भाई ने लखनऊ पहुंचते ही दारु, मुरगा, मछली आदि किसी चीज की मांग नहीं की। बस केवल जुए का जुनून सर पे लिए आए थे। वश चलता तो दिन में ही फड़ बैठा देते।
 
Sheetal P Singh 3-4 हजार में दो दिन !

Siddharth Kalhans शीतल भाई 10 रुपये बोट, 10 की बंद और 100 रुपये चाल की उपरी सीमा में इतना कम है क्या। गरीबों का जुआ था

Yashwant Singh इसीलिए यह कानूनन जुर्म की श्रेणी में नहीं आता वरना मेरे से पहले कई वरिष्ठ पत्रकार जेल जा चुके होते.. शायद यही सही बात है न सिद्धार्थ भाई.

Sheetal P Singh जै हो, प्रेस क्लब तो है जहाँ ग़रीबों की भी ऐश है

Siddharth Kalhans यशवंत भाई ये रंगदारी वाले लिफाफे तब नही मिलते थे जब हम, आप, अनिल, राघवेंद्र दुबे, ओझा जैसे शाम से दांत चियार कर लोगों को हसरत भरी निगाहों से ताकते रहते थे कि क्या पता कुछ तरस खाकर इंतजाम ही कर दे। वंचितों को समय पर कुछ नहीं मिलता..

Manoj Kumar Mishra कोई बात नहीं …जिंदगी बहुत मौके देगी गिरते हैं सहसवार ही मैदाने जंग में,वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनो के बल चले.
 
Jitendra Choubey Kisi baba ka ashirwad lekar baihna tha yashwant jee
 
Harishankar Shahi वैसे प्रेस क्लब के छज्जे पर जौन प्रेम से फड लगी थी. व साथ में मछली और —- लाजवाब.
 
Mukta Pathak haaaaaaaa
 
Ram Dayal Rajpurohit आप पैसों से जुआ खेलते, हम रोटी से खेलते ह
 
Shuja Uddin Shams जीता कौन? ख़ैर जो भी महानुभाव हों, अगले पूरे सप्ताह की शाम उनके नाम!
 
Binay Prakash ye jan ke tazub hua ki aap JUAA khelte hai..but aapki sadgi bhari sachayi ne ..aapke tarh hi mujhe v hasne ke liye majbur kar diya..

राकेश कुमार सिंह Dukh ko Dukh se katiye shayad mit jaye. Apney pay bharosha ho to ik dav laga ley…ik dav….
 
Shubhabrata Sengupta Sad news, I would advise to consult Pt. G.D. Vashist, he would suggest some "UPAY" to win…
 
Manglesh Ara keep it on ..
 
Smita Mishra ab isiki bharpaai karne ke liye 40,000 kamane ka rassta socho..

Bhanu Pratap Singh हम क्या चंदा शुरू कर दें

Ashok Chaudhary प्रेस क्‍लब में जुआ होता है, जानकारी के लिए धन्‍यवाद

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया से जुड़े हुए हैं.

 

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