लांचिंग के कुछ दिन बाद ही पुष्‍प सवेरा का प्रसार सिमटा

आगरा से जोर शोर से प्रारंभ किया गया पुष्पांजलि समूह का अखबार भी चंद कापियों में सिमट कर रह गया हैं. हालत यह हो गयी हैं कि जुम्मा-जुम्मा अभी चार दिन भी नहीं बीते थे कि उससे पहले ही अख़बार टॉय-टॉय फिस्स नज़र आने लगी हैं. कम संख्‍या के चलते अब अखबार मार्केट के बुक स्‍टाल से भी गायब हो गया है. जिन लोगों की खबर पुष्प सवेरा में छप रही है, वे अपनी खबरों के लिए स्‍टाल पर अखबार ढूंढ रहे हैं लेकिन वो मिल नहीं पा रही है. इसको लेकर ही कई तरह की बातें और चर्चाएं शुरू हो गई हैं.

शुरुआत में इस संस्थान में कई पुराने पत्रकारों को जुड़े देखकर अंदाजा लगाया जा रहा था कि अखबार सफलता हासिल करेगा. पाठकों के समक्ष बेहतर कंटेंट के साथ आएगा, पर सारी बातें अब हवा-हवाई साबित हो रही हैं. जुम्मा-जुम्‍मा अभी चार दिन भी नहीं बीते हैं कि इसका प्रसार गिर गया है. कॉपियां ढूंढे नहीं मिल रही हैं. पिछले के दशक से यह देखा जा रहा है कि मीडिया के क्षेत्र में कई लाला, बिल्डर या गोरख धंधा करने वाले लोग प्रवेश कर गए हैं, जिन्हें असल में न्यूज़ की फुल फार्म नार्थ-ईस्‍ट-वेस्‍ट-साउथ भी नहीं आती हैं लेकिन वह मीडिया समूह को चला रहे हैं. इसे लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ की हत्या कहा जाये या फिर कुछ और.

भारत में तमाम अखबार खुलते हैं और काल के गाल में समाते रहते हैं. यह एक आम बात हो गई हैं. पुराने लोग इस बात को कुछ इस तरह बयां करते हैं कि तेरे जैसे कितने आये और कितने चले गए. लेकिन इसमें शायद वह यह नहीं भूलते कि वह अखबार बंद नहीं होता व चंद कापियां निकालकर इस प्रकार से चलता रहता है. जैसे खरगोश व कछुए की कहानी में कछुआ. हां यह बात दीगर हैं की बह अंत में कछुए की भांति सफलता नहीं प्राप्त कर लेता. आगरा में भी अखबारों की यही दास्ताँ है पहले कल्पतरु एक्सप्रेस, फिर सी एक्सप्रेस व अब पुष्प सवेरा इस स्थिति में जाते दिख रहे हैं.

लेकिन इन अखबारों ने एक ऐसी फ़ौज तैयार करके आगरा के मार्केट में छोड़ दी जिसका वर्तमान में कोई महत्व नहीं हैं. आज चंद कापियां मार्केट में फेंककर किसी भी अधिकारी को बेबकूफ नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह भली भाँति जानता है कि किस अखबार की कितनी औकात हैं. समय-समय पर देखा जाता है कि जब मीडिया के क्षेत्र में कोई कारोबारी कदम रखता हैं तो वह अपने यहाँ किसी दूसरे संस्थानों से अच्छा वेतन देकर अपने यहाँ पर पत्रकारों को रखता है, लेकिन चंद दिनों में ही उसकी हकीकत सबके सामने आ जाती है. और कई ऐसे पत्रकार बेरोजगार हो जाते हैं तथा इनको दो जून की रोटी चलाने में भी दिक्कत होने लगती है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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