लालू यादव की गिरफ्तारी व उनका राजनीतिक अवसान लोकतंत्र के लिए कोई सुखद खबर नहीं है

Ambarish Rai : लालू यादव का भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना… लालू प्रसाद जेल गए. जेपी आन्दोलन से उभरे तथा सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाने वाले नेता का इस तरह भ्रष्टाचार के आरोप के साथ पटाक्षेप होना, कल्पना से परे और दुखद है. सत्तर व अस्सी के दशक में देश ने प्रभावशाली आन्दोलनों व कद्दावर नेतृत्व को उभरते हुए देखा है. ऐसे नेता पिछड़ों और दलित समुदाय से उभरे और उन्होंने सदियों से विषमता झेल रहे करोड़ों लोगों को न केवल जगाया, बल्कि उन्हें आंदोलित किया और अधिकारों को हासिल करने के लिए संगठित किया.

मंडल कमीशन ने भी इन आंदोलनों को उचाईयों पर पंहुचा दिया. सामाजिक न्याय के लिए उठे इन आन्दोलनों ने लोकतंत्र को न केवल मजबूत किया बल्कि उसका विस्तार भी किया. सत्ता और लोकतंत्र में पिछड़ों और दलितों की बराबर से भागीदारी सुनिश्चित की. जनता की इस ऐतिहासिक गोलबंदी ने साम्प्रदायिकता के रथ पर लगाम लगाने का काम भी किया. लालू यादव इन्ही आन्दोलनों से उपजे एक प्रमुख स्तम्भ रहे हैं. दशकों से गरीब जनता इन्हें अपने सर आँखों पर बिठा कर रखे हुए है. मगर वे भूल गए कि गरीबों ने उन्हें एक वैकल्पिक राजनीति एवं वैकल्पिक संस्कृति की जरूरत को पूरा करने के लिए समर्थन दिया था.

जनादेश बदलाव के लिए मिला था मगर लालू प्रसाद जी शासक वर्गों की परंपरागत राजनीति की न केवल नक़ल में उतर आये बल्कि उनके ही पिछलग्गू बन गए. सामाजिक न्याय इनके एजेंडे से गायब हो गया. हालाँकि तमाम कमजोरियों के बावजूद भी पिछड़ों और दलितों से आये यह सभी नेता अब भी पिछड़ों की ताकत बने हुए है. लालू यादव की गिरफ्तारी व उनका राजनीतिक अवसान लोकतंत्र के लिए कोई सुखद खबर नहीं है. अभी भ्रष्टाचार के दलदल में और भी बड़े मगरमच्छ है. जो कानून की मदद लेकर ही फल फूल रहे हैं. और उनका अंजाम अभी देखना बाकि है. यह एक जमीन से उभरे नेता के गलत कामों का दुखद परिणाम है.

जनांदोलनों से जुड़े रहे और सोशल एक्टिविस्ट अंबरीश राय के फेसबुक वॉल से.

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