लाल बत्‍ती की धौंस और आम आदमी

आस्था के महापर्व कुंभ के अवसर पर वास्तव में इस तरह की चर्चाएं तो होनी ही नहीं चाहिए। विवशता के भाव से ये चर्चा करना मजबूरी बन चुकी है। क्या लालबत्ती गाड़ी लोकतंत्र में धौंस का पर्याय बन चुकी है? यदि नहीं तो कुंभ जैसे महापर्व में इसकी नुमाइश क्या दर्शाती है?

अभी कुछ दिनों पूर्व ही एक खबर पढ़ी बसंत पंचमी के स्नान पर्व के दौरान सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक एवं प्रदेश की राजधानी के डीआईजी बकायदा अपने वाहनों में सवार होकर कुंभ स्नान के लिए पहुंचे। यहां इन दोनों की ही बात क्यों की जाए इन जैसे न जाने कितने विशिष्ट जनों ने ऐसा ही किया है। यहां वरिष्ठ अधिकारियों का ये शौक क्या दर्शाता है? क्या ये संविधान द्वारा जनता के हितार्थ प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं है? अंततः ऐसे असंवेदनशील अधिकारियों से क्या जनसेवा की उम्मीद की जा सकती है? इन अधिकारियों का ये आचरण अचानक ही कई प्रश्न खड़े कर गया।

ध्यातव्य हो कि बसंत पंचमी से कुछ दिनों पूर्व ही घटे दुर्भाग्यपूर्ण हादसे कई लोगों की जानें जा चुकी थी। क्या उनके इस वीआईपी काफिले से दुबारा वैसी ही भगदड़ से इनकार किया जा सकता है? ज्ञात हो कि कुछ दिनों पूर्व ही हाईकोर्ट ने अपने आदेश से पुलिस एवं एंबुलेंस के अलावा अन्य वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई थी। बावजूद इसके वरिष्ठ अधिकारियों का ये कृत्य क्या हाईकोर्ट के आदेशों को धता बताना नहीं है? वर्दी की हनक में ये वरिष्ठजन कई बार ऐसी हरकतें कर जाते है जिससे निश्चित तौर पर संवैधानिक मान्यताएं आहत होती हैं। विचार करिये उनके इस कृत्य से आमजनों के बीच क्या संदेश गया होगा? स्पष्ट है कि इन लोगों को न तो हाईकोर्ट के निर्देशों की परवाह थी न ही आमजन की भावनाओं का। कुंभ जैसे महापर्व को अगर ध्यान से देखें तो पाएंगे कि ये पर्व गणमान्य जनों से कहीं ज्यादा आमजनों का महापर्व है। वो आमजन जो हजारों मीलों की दूरियां भेड़ बकरियों की तरह रेलों एवं बसों में भरकर कुंभ तक पहुंचते हैं। यहां एक बात और भी गौर करने योग्य है कि उनके इस धार्मिक अनुष्ठान के लिए सरकार का न्यूनतम सहयोग प्राप्त होता है। अब यदि सरकार इन श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त रेलों का संचालन नहीं करा सकती, उनकी सुविधा असुविधा का ध्यान नहीं रख सकती तो उसी सरकार के नुमाइंदों को इन आम जनों की भावनाओं को आहत करने का क्या अधिकार है?

हैरत की बात है एक ओर तो हाई-सुप्रीम कोर्ट विशिष्ट जनों की परंपरा पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है तो दूसरी ओर ये सम्मानित जन अपने शक्ति प्रदर्शन करने में लगे हैं। उपरोक्त सारी बातें को देखकर तो यही लगता है कि कुंभ मेला प्रशासन हाईकोर्ट के निर्देशों को कत्तई नहीं मानता। अब ध्यान देने वाली बात है कि इस नवनिर्मित वीआईपी संस्कृति से आम आदमी अपने को ठगा हुआ महसूस करने लगा है। ये आम आदमी वही है जिसके द्वारा दिये कर, रेल भाड़ा एवं धार्मिक अनुष्ठान के नाम से दिये गये रुपयों से ही इस प्रकृति के समस्त पर्वों का संचालन होता है। इन सबके बावजूद कभी आम आदमी के संघर्ष पर विचार करके देखिये कि कैसे धक्का-मुक्का सहते हुए वो कुंभ तक पहुंचा होगा। अंततः स्नान के लिए भी लंबी कतारों में लगकर उसने कितने अनुशासन का परिचय दिया होगा। ऐसे में अनुशासित आम आदमी का नेतृत्व इन असंवेदनशील अधिकारियों के हाथ में देना क्या संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ नहीं है? जहां तक प्रश्न है न्यायालयों के निर्देश का तो निश्चित तौर पर उनका फायदा जनता को तभी मिलेगा जब उनका कड़ाई से पालन हो। जहां तक वर्तमान परिप्रेक्ष्यों का प्रश्न है तो निश्चित तौर पर इस बात की संभावना दूर दूर तक दिखाई नहीं देती। ऐसे में विचारणीय प्रश्न है कि लालबत्ती की धौंस कब तक सहेगा आम आदमी?

लेखक सिद्धार्थ मिश्र ‘स्वतंत्र’ पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *