लोकमत मीडिया की डायरेक्टर ज्योत्सना दर्डा का निधन

राज्यसभा सदस्य श्री विजय दर्डा की पत्नी, लोकमत मीडिया प्रा. लि. की संचालक और महाराष्ट्र में महिलाओं की प्रतिष्ठित संस्था सखी मंच की अध्यक्ष श्रीमती ज्योत्सना दर्डा का शनिवार की रात 10.16 बजे मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 61 वर्ष की थीं.

ज्योत्सना जी पिछले 24 वर्षो से कैंसर का मुकाबला कर रही थीं. 5 मार्च को उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था, लेकिन उनकी हालत गंभीर होती चली गई. कैंसर लीवर सहित शरीर के विभिन्न हिस्सों में फैल गया था. डॉक्टरों के लाख प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. रविवार 24 मार्च को उनका पार्थिव शरीर नागपुर स्थित उनके राहटे कॉलोनी स्थित निवास पर सुबह 9 से 11  बजे तक दर्शन के लिए रखा जाएगा. रविवार को ही शाम 5 बजे यवतमाल में उनका अंतिम संस्कार होगा.

लोकमत सखी मंच के माध्यम से महाराष्ट्र की दो लाख महिलाओं का नेतृत्व करने वाली और जीवन से असीम प्रेम करने वालीं ज्योत्सना दर्डा बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी थीं. सदा प्रसन्नचित्त रहने वाली ज्योत्सना दर्डा सन् 1989 में कैंसर से ग्रस्त हुईं. उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 24 वर्ष तक उसका मुकाबला किया. वह अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति से अत्यंत सहजता से पेश आती थीं. भाभी जी के स्नेह में सब बंध जाते थे. नागपुर के पास बूटीबोरी में उनकी पहल पर जैन सहेली मंडल के नवनिर्मित भव्य सांस्कृतिक सभागृह का उद्घाटन 25 फरवरी को मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने किया था. इस समारोह में उनका उद्बोधन महिला सबलीकरण के मामले में मील का पत्थर बन गया. यह उनका अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम साबित हुआ.

ज्योत्सना दर्डा का जन्म 18 जून 1952 को जलगांव के प्रसिद्ध जैन परिवार में हुआ. उनके पिता भीकमचंदजी जैन स्वाधीनता सेनानी थे. ज्योत्सनाजी ने जलगांव में ही बी.ए. तक की शिक्षा ग्रहण की. उन्हें तीन भाई और चार बहनों का साथ मिला था. उनके नेतृत्व में सन् 1991 में जैन सहेली मंडल की स्थापना हुई. समाज सेवा की उदात्त भावना के फलस्वरूप 18 अक्तूबर 2000 को उन्होंने लोकमत सखी मंच की स्थापना की. यह राज्य की लाखों महिलाओं के लिए शक्तिपीठ साबित हुआ. उनकी प्रेरणा से जवाहरलाल दर्डा संगीत कला अकादमी का जन्म हुआ. समृद्ध परिवार में जन्मी ज्योत्सना दर्डा सामान्य वर्ग की महिलाओं से सहज ही घुलमिल जाती थीं. उन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया कि परिवार में बेटी होने पर उसका स्वागत किया जाए. उन्होंने अनगिनत लोगों का जीवन संवारा और उन्हें सम्मान के साथ जीने की प्रेरणा दी. गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद उनके भीतर का विद्यार्थी हमेशा जागृत रहा. उन्होंने संगीत सीखा. वह मधुर कंठ की धनी थीं और सुमधुर स्वर में भजन गाती थीं. जिंदगी के अंतिम पल तक उनकी संगीत साधना अखंड रही.

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