लौट के फुटेला घर को आए (एक)

: जगमोहन फुटेला की जुबानी, आने वाले एक चैनल की बीती हुई कहानी :  मुझे पता है कि आज के ज़माने में मीडिया और उस में भी चैनल कौन ला, चला सकता है. ये भी कि मीडिया का कैसे कैसे इस्तेमाल होता है. मुझे ये भी पता था कि गुड़गांव की लैंडमार्क कंपनी हरियाणा के स्पीकर रहे डा. रघुबीर सिंह कदियान के दूर पार के रिश्तेदार संदीप की है. सो, ये डर भी था ही कि चैनल का उन के लिए इस्तेमाल हो सकता है. मेरा भी.

इसलिए मुझे जब बुलाया गया तो मैंने उन्हें 'अकाली पत्रिका', 'जनसंदेश' और नेहरु जी के ज़माने से चले आ रहे 'नेशनल हेराल्ड' से ले कर राजीव गांधी के शुरू किए 'कांग्रेस वीकली' और 'कांग्रेस साप्ताहिक' तक की मिसालें दे कर बताया था कि वे किसी एक चुनाव, किसी एक पार्टी या किसी एक विधानसभा क्षेत्र के लिए चैनल लाने की गलती न करें. मैंने उन से ये भी कहा था कि ऐसा करने और कल को सरकार किसी और की आ जाने पर उन के दूसरे धंधों पे मुसीबतें आ सकने का डर हमेशा रहेगा.

संदीप जी ने कहा था कि उन्हें उन खतरों का इल्हाम है. उन्होंने कहा कि उनका इरादा अगर खासकर कांग्रेस का भोंपू होने का होता तो फिर टोटल टीवी वाले विनोद मेहता उन के चैनल के सीओओ-संपादक न होते. और उन के जाने के बाद मुझ जैसा सोचने लिखने वाले को भी नहीं बुलाया गया होता. मुझ से कहा गया कि कंसेप्ट और कंटेंट के मामले में मुझे पूरी आज़ादी होगी. अपनी टीम चुनने के मामले में भी. मुझे कहा गया कि कंपनी दो चैनलों और एक अख़बार के साथ एक प्रोफेशनल मीडिया हॉउस बनना चाहती है. सुनने में बात दमदार लगी.

कंसेप्ट ये था कि हम महिलाओं और वकीलों को अपने साथ जोड़ेंगे. इस से हम चैनल के साथ पंजाब केसरी के शहीद परिवार फंड जैसा एक सोशल प्लैंक ले के चलने वाले थे. कभी जैन टीवी में मेरे साथ रहे मेरे मित्र संजय द्विवेदी को टेक्नीकल पहलू और मुझे कंटेंट की जिम्मेवारी देने की बात थी. हम दोनों ने एक साथ ज्वाइन किया. भर्तियां हम ने कीं. या मैं कह सकता हूं कि बहुत से लोग हमारी शक्ल देख के चैनल में आए. हम से पहले तो देश के दो बड़े अख़बारों में एड दे के भी कंपनी कुल जमा 14 सीवी मंगा सकी थी. इन भर्तियों के समय वेतन वगैरह के नज़रिए से किरन नाम की एक महिला हमारे साथ होती थी. बताया गया कि वो संदीप जी की कज़िन है. वो हम दोनों को 'सर' कह के संबोधित करती.

जब हम लोगों को चुन चुके तो पता चला कि कंपनी ने कुछ लोगों को पहले ही चुन रखा था और किरन उन को ज्वाइन कराने पे भी बज़िद थीं. जिन के बारे में मैं ये भी नहीं जानता था कि वे फिट कहां होंगे, वे ज्वाइन कर गए. इन में से एक को तो मुझ से ये कह के मिलवाया गया कि इस बंदे को बस नौकरी चाहिए थी सो दे दी. काम क्या देना है, ये मैं तय करूं. बंदे उन की योग्यता, भूमिका तय किए बिना रखे जा रहे थे और मैं उन्हें आते हुए देखता जा रहा था.

मुझसे बड़प्पन की उम्मीद की गई. कहा गया कि जिनको काम नहीं आता, उन को मैं सिखाऊं. काम सिखाने के लिए अगर शूट चाहिए होती है तो कोई गाड़ी, टैक्सी नहीं थी. कहा गया कि रिपोर्टर और कैमरामैन अपनी बाइक पे चले जाएं. संजय की सलाह पे मैंने उन्हें अपनी निजी गाड़ी दी. उस के बाद कुछ दिन कोई शूट नहीं हुई. तीन चार दिन बाद गाड़ी मिली वो जो कंपनी की डेयरी का दूध ढोती थी. उस की तेल वाली सुई कुछ बताती नहीं थी. चाबी अपने आप नीचे गिर जाती थी. उस में तेल भराने के लिए पांच सौ रुपए किसी एकाउंटेंट ने नहीं, किरन ने अपनी जेब से दिए.

दस बारह किलोमीटर तक जा आने के बाद जब यही गाड़ी अगले दिन शूट पे निकली तो कुछ दूर जा के रुक गई. रिपोर्टर, कैमरामैन और उन के साथ शौक शौक में बैठ गया एक एंकर उसे धक्का मार के पेट्रोल पंप तक ले के गए. चैनल के पास कोई माइक आईडी तब तक नहीं थी. ढंग की कोई गाड़ी नहीं. ड्राईवर नहीं. शूट आ जाए तो उस को इन्जस्ट करने, देखने के लिए कोई वीटीआर मशीन नहीं. टेप जमा कर के रखने के लिए कोई लायब्रेरी नहीं. लेकिन रोज़ का डंडा कि शूट तो होगी. और वो इस लिए कि बंदे खाली बैठे हैं.

नीचे स्टूडियो बनना भी शुरू नहीं हुआ कि तीन एंकर भी कंपनी ने ज्वाइन करा लिए. चैनल का ड्राई रन भी शुरू होने से कोई दो महीने पहले. कंपनी का पैसा वसूल करने के लिए इन में से एक को रन डाउन कॉपी टाइप करने और एक को असाइनमेंट पे लगाया गया. जिन्हें टीवी की जानकारी न हो, उन्हें बता दें कि असाइनमेंट मूल रूप से रिपोर्टरों और स्ट्रिंगरों को स्टोरी आइडिया दे कर उन से शूट मंगाने का काम होता है. ऐसे लोगों को खबर में से खबर निकालनी आनी चाहिए.

यहां जिन दो को असाइनमेंट पे लगाया गया उन में से किसी को भी एक दिन का भी अनुभव नहीं था और खुद कंपनी ने भी उन में से एक को एंकरिंग और दूसरे को रिपोर्टिंग के लिए भर्ती किया था. वीटी एडिटर भी आ गया वीटीआर और एडिटिंग मशीन आने से पहले. नियुक्ति पत्र किसी के पास नहीं. बहाना ये कि कंपनी दूसरे चैनलों की एच आर पालिसी मंगा के अपनी अभी बना रही है.

इस पालिसी में भी तुम जाओगे तो तीन महीने की सेलरी दे के जाओगे और हम निकालेंगे तो एक महीने का नोटिस देंगे वाली शर्त शामिल थी. उस पे वेतन मिलेगा भी आप को महीने की बीस तारीख तक. मेरी सलाह थी कि इस शर्त पर अच्छे लोग अच्छी कंपनियां छोड़ के कभी नहीं आएंगे. खासकर तब कि जब एक महीने के नोटिस पे किसी को भी निकाल सकने वाली कंपनी वेतन दे भी अगले महीने की बीस तारीख तक रही थी. ये सब चल ही रहा था कि टीम के कुछ लोगों को कंपनी के लौंच होने वाले घी के डिब्बों पे स्टिकर चिपकाने के काम पे लगा दिया गया.

… जारी …

लेखक जगमोहन फुटेल वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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