वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज मामले में हाई कोर्ट ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया

आगरा। डेढ़ साल की जाद्दोजहद के बाद दैनिक जागरण के पूर्व डिप्टी न्यूज एडिटर विनोद भारद्वाज को हाईकोर्ट की दखलंदाजी और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बाद न्याय पाने का रास्ता प्रशस्त हो गया है। दैनिक जागरण कार्यालय में दवा के नाम पर उन्हें खतरनाक नारकोटिक्स पिलाने की साजिश में अदालत ने हत्या के प्रयास, मेंटल डिस आर्डर में पहुंचाने और आपराधिक साजिश रचने का मुकदमा दर्ज करने के थाना छत्ता को ओदश जारी कर दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि 18 नवंबर 2010 को तत्कालीन पुलिस महानिदेशदक करमवीर सिंह ने इस साजिश के खुलासे की जिम्मेदारी आई.जी. एस.टी.एफ. को सौंपी थी। एस.टी.एफ. के सी.ओ. नित्यानंद राय ने छह माह के अंतराल में दो बार आगरा आकर जांच की, लेकिन जागरण प्रबंधन के दबाव के चलते कोई कार्रवाई नहीं की जा रही थी। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ने भी दो बार जांच कर कार्रवाई के ओदश दिये, लेकिन जागरण प्रबंधन का दबाव पुलिस पर इस कदर हावी था कि वे घटना की एफ.आई.आर. तक दर्ज करने को तैयार नहीं थे। आगरा के डी.आई.जी. एफ.आई.आर. दर्ज करने के आदेश देने के बाद जब बैकफुट पर चले गये और एफ.आई.आर. दर्ज कराने में असफल हो गये तो विनोद भारद्वाज ने अदालत की शरण ली। इस दौरान डी.आई.जी. ने एस.पी. (अपराध) को जांच सौंपकर एक बार फिर जांच की नौटंकी शुरू करा दी थी। इसी कारण विनोद भारद्वाज को अदालत की शरण में जाना पड़ा।

स्थानीय ए.सी.जे.एम कोर्ट ने भी एफ.आई.आर. दर्ज न कराके कम्पलेंट केस चलाने के निर्देश दिये तो विनोद भारद्वाज ने हाईकोर्ट में रीट दाखिल की। हाईकोर्ट ने स्थानीय अदालत के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया और एफ.आई.आर. के दिशा-निर्देश दिये। हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश पर अंततः ए.सी.जे.एम. कोर्ट ने थाना छत्ता को मुकदमा दर्जकर विवेचना के निर्देश जारी कर दिये जो कि थाना छत्ता को प्राप्त हो चुके हैं। ये देखना दिलचस्प होगा कि मीडिया जगत का ये शर्मनाक आपराधिक मामला अब आगे क्या रूप लेगा। विनोद भारद्वाज इस बात पर पूरी तरह दृढ़ हैं कि न्याय पाने के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक भी जाना पड़ा तो वे सुप्रीम कोर्ट भी जायेंगे। पत्रकारिता जगत में ये मामला नवंबर 2010 से चर्चा का विषय बना हुआ है। असल में दैनिक जागरण के उच्च प्रबंधन ने भी विनोद भारद्वाज पर पुलिस कार्रवाई न करने का दबाव बनाया था, जिस मामले से उन्होंने इन्कार कर दिया था और उन्हें सशर्त इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा था। नीचे सीएम और डीआईजी को भेजा गया पत्र। 



सेवामें,
मुख्यमंत्री  
उत्तर प्रदेश

सब्जेक्ट- मेरी हत्या के प्रयास और मुझे मेंटल डिसऑर्डर में पहुंचाने जैसे गंभीर अपराध की जांच को एसटीएफ द्वारा दबा दिए जाने तथा कोई कार्रवाई न किए जाने के संबंध में।

महोदया,

त्वरित आवश्‍यक कार्रवाई हेतु निवेदन है कि उपरोक्त सब्जेक्ट में डीजीपी करमवीर सिंह ने कठोर और गंभीर कदम उठाते हुए मेरे प्रार्थना-पत्र की जांच आईजी एसटीएफ सुबेश कुमार सिंह को अपने कार्यालय में बुलाकर एसटीएफ लखनउ से कराए जाने के निर्देश मेरी मौजूदगी में 18 नवम्बर, 2010 को दिए थे। आईजी ने अपने एसएसपी को निर्देश देकर इस मामले की जांच एसटीएफ के सीओ नित्यानंद राय को सौंपी थी।

तमाम दस्तावेजी साक्ष्य देने के बावजूद सीओ नित्यानंद राय मेरे प्रार्थना-पत्र, आदेशों और साक्ष्यों को पांच माह से दबाकर बैठे हैं। उन्होंने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। इस कारण 28 दिसम्बर को मैं पुनः डीजीपी से मिला और उन्‍हें बताया कि आईजी सुबेश कुमार सिंह आगरा में एसएसपी रह चुके हैं, उनके साजिशकर्तां से पारिवारिक संबंध हैं। सीओ नित्यांदन राय भी आगरा में सीओ हरी पर्वत रह चुके हैं। इसी कारण मेरी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

डीजीपी ने मेरी शिकायत की गंभीरता को समझते हुए सीओ नित्यानंद राय और सीओ अरविंद चतुर्वेदी को अगले दिन 29 दिसम्बर को सवेरे साढ़े दस बजे तलब कर लिया और अपने कार्यालय में ही मेरी सीओ राय से एक घंटे बात करवाई; उन्होनें स्वयं भी जांच की प्रगति और आगे की कार्रवाई के संबंध में मेरे सामने ही सीओ राय से बात की; इतना सब होने के बाद भी सीओ नित्यानंद राय ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की है। मैंने सीओ को अपने ईलाज के पेपर्स के साथ ही छह चश्‍मदीद गवाहों के शपथ-पत्रों की प्रमाणित छाया प्रतियां भी उनको दी थीं; इसके बावजूद सीओ नित्यानंद राय ने आज तक कुछ नहीं किया, क्योंकि इनके अपराधियों और साजिशकर्ताओं से सीधे संबंध हैं।

मैं दैनिक जागरण आगरा में डिप्टी न्‍यूज एडिटर के पद पर इस माह तक रहा हूं। मैंने लगभग 24 साल तक दैनिक जागरण आगरा में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। इस घटना का आपराधिक स्थल दैनिक जागरण कार्यालय है और साजिश के तार दैनिक जागरण प्रबंधन से जुड़े हैं। दवा के नाम पर मुझे नारकोटिक्स पिलवाकर मेंटल डिसऑर्डर में ले जाने की साजिश में महत्वपूर्ण और ताकतवर लोगों का हाथ है। इसलिए तमाम सबूतों के बावजूद आज तक डॉक्टर और दवा के नाम पर नारकोटिक पदार्थ मिलाकर देने वाली डॉक्टर की पत्नी के खिलाफ एफआरआई तक दर्ज नहीं की गई है। इनको अरेस्ट करते ही आपराधिक साजिश के पीछे मौजूद असली चेहरे बेनकाब हो जाएंगे।

इस संबंध में मेरे तार्किक प्रश्‍न ये हैं कि –
1- आज तक सीओ नित्यानंद राय घटना स्थल दैनिक जागरण कार्यालय आगरा क्यों नहीं गए?
2- मेरे द्वारा उन्हें दिए गए दैनिक जागरण के छह कर्मियों के शपथ पत्र मिलने पर भी उन्होंने आज तक गवाहों के बयान क्यों नहीं लिए?
3- नारकोटिक पदार्थ पीने से मेंटल डिसऑर्डर में मेरा ईलाज करने वाले नर्सिंग होम के डॉक्टरों के बयान आज तक क्यों दर्ज नहीं किए गए?
4- नामजद करने और सबूत देने पर भी डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर तो दूर उसके बयान तक एसटीएफ ने क्यों नहीं लिए?
5- आखिर वे कौन ताकतवर साजिशकर्ता हैं, जिनके प्रभाव और दबाव ने डीजीपी कर्मवीर सिंह के आदेश-निर्देश भी बौने कर दिए?

उपोक्त परिस्थितियों में प्रार्थी ने दैनिक जागरण प्रबंधन को सशर्त इस्तीफा दिया, जिसे प्रबंधन ने लिखित में गैरकानूनी ढंग से तत्काल स्वीकार कर लिया। इस इस्तीफे को स्वीकार कर प्रबंधन ने लिखित रूप यह मान लिया है कि उनके कार्यालय में आपराधिक साजिश हुई हैं। उनकी साजिश में लिप्त होने का यह सबसे बड़ा दस्तावेजी सबूत है। आरंभिक रूप से डॉक्टर के विरूद्ध साफतौर पर भादवि की धारा 276 का मामला बनता है, जो कि गैर जमानती संज्ञेय अपराध है। अभी डॉक्टर के खिलाफ ही कार्रवाई नहीं हो सकी है, तो एसटीएफ साजिशकर्ताओं के खिलाफ कया कर पाएगी?

मेरा आपसे अनुरोध है कि मेरी शिकायत पर आईजी और एसएसपी एसटीएफ से जवाब तलब करने की कृपा करें और सीओ नित्यानंद राय की मनमानी के इतने सबूत हैं कि उन्हें तत्काल बिना उनका जवाब सुने पहले निलंबित किया जाना चाहिए। ये सभी अधिकारी एसटीएफ जैसी महत्वपूर्ण जांच और एक्‍शन फोर्स के हैं। अतः इनके खिलाफ तो और त्वरित और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह भी अनुरोध है कि मेरे सशर्त इस्तीफे की स्वीकृति की जांच उच्च अधिकारियों की टीम बना कर कराई जाए और इसके लिए एक निगरानी समिति भी गठित की जाए। ये जांच खुद को देश नंबर वन मीडिया हाउस कहने वाले समाचार पत्र दैनिक जागरण प्रबंधन के गैरकानूनी आपराधिक कृत्य की है। अतः उनकी ताकत के महत्व को नजरअंदाज न किया जाए अन्यथा ये जांच भी प्रभावित हो जाएगी।

नोटः- विलम्ब से दिया गया न्याय, न्याय को नकारने अर्थात अन्याय के समान होता है। पहले से ही एसटीएफ पांच माह तक इस मामले को दबाए रखकर अपराधियों को सबूत मिटाने और खुद को बचाने के भरपूर मौके दे चुकी है। अतः अब इस मामले की त्वरित और तेजी से जांच करवाने के लिए सीनियर आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति करने की कृपा करें, यही न्याय संगत होगा।

दिनांक – 27 अप्रैल 2011

सादर 

विनोद भारद्वाज

पूर्व डीएनई

दैनिक जागरण, आगरा


सेवा में
डी आई जी आगरा

महोदय,

सूचनार्थ और आवश्‍यक कार्रवाई हेतु निवेदन है कि मेरे द्वारा डाक्टर राज परमार के विरुद्ध दी गई तहरीर पर लगभग तेरह माह बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं किया जा रहा है। जबकि मैं स्वयं 17 अगस्त, 19 अगस्त और 20 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से आपसे मिला था। मैंने तीनों ही बार घटना से संबन्धित सारे तथ्य और सबूत आपके सामने रखे थे। आपने मुझसे सहमत होने के बाद 20 नवंबर को मेरे ही सामने एस पी (अपराध) को मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज कराने की अनुशंसा करने का निर्देश दिया था।

21 नवंबर को इंस्पेक्टर न्यू आगरा तहरीर पर मुझसे हस्ताक्षर कराकर ले गए थे और मुझसे कहा था कि कल आप थाने से अपनी एफआईआर की कॉपी ले लेना। 24 नवंबर को इंस्पेक्टर न्यू आगरा ने मुझे बताया कि आपकी तहरीर के अनुसार घटना स्थल थाना छत्ता क्षेत्र के अंतर्गत आता है। डीआईजी साहब ने निर्देश दिया है कि आप न्यू आगरा थाने में मुकदमा दर्ज न करें और तहरीर थाना छत्ता भेज दें, अब यह मुकदमा थाना छत्ता में ही लिखा जाएगा। जब मैं थाना छत्ता में जाकर एसओ छत्ता आर के शर्मा से मिला तो उन्होंने मुझे यह कहते हुए टाल दिया कि आप मुझे एक-दो दिन का समय दीजिए, मैं एक-दो दिन में जांच करके यह मुकदमा दर्ज कर लूंगा।

24 नवंबर के बाद से अब तक मेरी कई बार एसओ छत्ता से बात हुई है, लेकिन वे हर बार कोई न कोई बहानेबाजी करके मुझे टालते चले आ रहे हैं। इस दौरान मैंने आपसे भी मोबाइल फोन पर एसओ छत्ता द्वारा रिपोर्ट दर्ज न करने और बार-बार टालने की शिकायत भी की थी। आपने मुझे आश्‍वस्‍त किया था कि मैं एसओ छत्ता से बात कर रहा हूं, आपका मुकदमा हर हाल में लिखा जाएगा। आज 6 दिसम्बर तक भी एसओ छत्ता ने मेरी रिपोर्ट दर्ज नहीं की है।

इस संबंध में मुझे आपसे अनुरोध करना है कि प्रदेश के डीजीपी से लेकर थाने तक के अधिकारियों को अपराध की पूरी जानकारी होने के बावजूद इतने दिन बाद भी मेरी तहरीर को तरह-तरह के बहाने बनाकर जांच के नाम पर लम्बित रखा जा रहा है, लेकिन उस पर रिपोर्ट दर्ज करने से बचा जा रहा है। मैं विनम्रतापूर्वक आपसे पूछना चाहता हूं कि पुलिस मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने से क्यों कतरा रही है। मुकदमा दर्ज कराना मेरा अधिकार है और उस पर एफआर लगाना, चार्जशीट लगाना या एक्सपंज करना पुलिस का अधिकार है, फिर आखिरकार मेरी रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की जा रही है। क्या मैं यह मान लूं कि समूचा पुलिस तंत्र मेरे मुकदमे के आरोपियों और साजिशकर्ताओं के आगे बौना हो गया है या फिर उनसे मिला हुआ है। पुलिस आखिर मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने से इनकार कैसे कर सकती है। रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की जा रही है। इस से बचा जा रहा है, घोर आश्‍चर्य है कि सीनियर आईपीएस अफसर भी मेरे मामले में मुझे न्याय देना तो दूर, आज तक मुकदमा भी दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। क्या अब मैं यह मान लूं कि मुझे मुकदमा दर्ज कराने और उसकी जांच किसी दूसरी एजेंसी से कराने के लिए भी हाईकोर्ट की शरण में जाना पडे़गा। अगर मेरे जैसे सीनियर जर्नलिस्ट को मुकदमा दर्ज कराने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं तो फिर एक आम आदमी का तो इस प्रदेश में बस भगवान ही मालिक हो सकता है।

मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी शिकायत की गम्भीरता को आप समझेंगे और मुझे जांच में न्याय मिले या न मिले लेकिन आप कम से कम मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज कराने की जहमत जरूर उठायेंगे।

दिनांक  06-12-201

भवदीय

विनोद भारद्वाज

पुत्र स्व श्री राजेन्द्र प्रसाद

निवासी 11-शारदा विहार,

दयाल बाग आगरा



इस मामले के बारे में और ज्‍यादा जानने के लिए नीचे दिए गए लिंकों पर क्लिक करिए –

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