वहां मैनेजर सिर्फ एक्‍सप्रेस निकालना चाहते थे, यहां अतुलजी हर सहकर्मी को जानते थे

अमर उजाला ज्वाइन करने के करीब एक सप्ताह बाद ही मुझे अतुल जी ने नोएडा बुलाया। पूरा दिन वे कानपुर और वहां के अखबारों के बारे में बात करते रहे। बीच-बीच में वे अमर उजाला के विभिन्न पहलुओं पर बतियाते रहे। अतुल जी सिर्फ एक अखबार के मालिक ही नहीं खूब समझदार पत्रकार भी लगे। खबर की सामाजिक और व्यावसायिक समझ में वे माहिर लगे। उनसे बतिया कर अच्छा लगा।

जनसत्ता में तो सिवाय प्रभाष जी के और किसी की शायद ही मालिक से बात हुई हो। फिर मैं तो एक रिमोट यूनिट का एडिटोरियल हेड भर था। वहां लगता था कि मालिक को अखबार निकालने से कोई दिलचस्पी नहीं है। और उनके मैनेजर सिर्फ एक्सप्रेस को निकालना चाहते थे। अखबार डूब रहा था पर प्रबंधन इससे बेखबर था। लेकिन यहां एकदम उलट।

मालिक सारी यूनिटों के संपादक तो दूर लगभग हर सहकर्मी को जानते थे। अतुल जी बताते कि महोबा अपना स्ट्रिंगर फलां है। अद्भुत थी उनकी याददाश्त और अखबार तथा उसमें काम करने वाले सहयोगियों के प्रति उनका लगाव। बातचीत के दौरान एक बात उन्होंने बहुत मार्के की कही कि शुक्लाजी आदमी की कीमत तभी तक है जब तक वो काम का है। मुझे उनके विचारों से प्रेरणा मिली और कानपुर लौटते ही मैं पूरी गर्मजोशी से जुट गया।

मेरा मानना है कि अखबार रिपोर्टर का होता है डेस्क की भूमिका सिर्फ उसे सजाने की होती है। यानी अखबार रूपी गाड़ी का इंजिन तो उसकी रिपोर्टिंग ही है। इसलिए पहले तो मैं खुद रिपोर्टिंग के साथ जुड़ा। हर कॉपी को खुद देखने लगा उसे एडिट करने से लेकर शीर्षक लगाने व प्लेसिंग तक मैंने खुद की। डेस्क के लोग भौंचक्के थे। एक ऐसा एडिटर जो सारा काम खुद ही जानता था। नतीजा यह हुआ कि अगस्त 2002 की 19 तारीख को मैंने कानपुर अमर उजाला ज्वाइन किया और दिसंबर 2002 की 25 तारीख को हमारे अखबार के सिटी संस्करण का प्रिंट आउट 99000 कापी तक पहुंच गया। अतुलजी का बधाई का फोन आया। मन गद्गद् हो गया।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

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