वादे पर खरा नहीं उतरा बीजिंग, सीमा पर ड्रैगन की बढ़ती जा रही हैं खतरनाक शरारतें

पक्के वायदों के बावजूद पड़ोसी देश चीन के हुक्मरान सीमा विवाद के मामलों में भारत सरकार का भरोसा बार-बार तोड़ रहे हैं। पिछले कई महीनों से लद्दाख की सीमा पर चीनी सेना ने कई बार घुसपैठ की है। इसी क्रम में 11 जुलाई को लद्दाख के चुमार सेक्टर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के दो हेलीकॉप्टर भारतीय सीमा में घुस आए थे। पुख्ता प्रमाणों के साथ सेना के अधिकारियों ने अपना विरोध दर्ज करा दिया है।

हालांकि, शुरुआती दौर में सेना ने इस घटना को बहुत गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन, मीडिया में इस खबर के प्रसारित होने के बाद बीजिंग को कड़ा संदेश भेज दिया गया है। विदेश मंत्रालय भी इस मामले में रक्षा मंत्रालय से रिपोर्ट आने की प्रतीक्षा कर रहा है। 5 अगस्त से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने चीनी सेना के घुसपैठ के मुद्दे को संसद में जोरशोर से उठाने की तैयारी की है। इसको देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने चीन के हुक्मरानों तक अपनी नाराजगी जोरदार ढंग से दर्ज कराने की कवायद शुरू कर दी है।

उल्लेखनीय है कि रक्षा मंत्री ए के एंटनी हाल ही में बीजिंग का दौरा करके लौटे हैं। चीन से लौटने के बाद उन्होंने यहां मीडिया में यह जानकारी दी थी कि बीजिंग, सीमा पर उठने वाले विवादों को लेकर काफी सजग है। शीर्ष स्तर से वायदा किया गया है कि सीमा पर ऐसा कुछ नहीं होने दिया जाएगा, जिससे कि दोनों देशों के रिश्ते खराब होते हों। यह भी भरोसा दिया गया कि सीमा विवाद को सुलझाने के लिए संयुक्त कार्य समूह की बैठकों का दौर और कारगर बनाने की कोशिश होगी।

सेना के अधिकारी इस बात को लेकर हैरान हैं कि रक्षा मंत्री को दिया गया भरोसा पूरे एक सप्ताह भी खरा नहीं उतरा। क्योंकि, 11 जुलाई को ही चुमार सेक्टर में पीएलए के दो हैलीकॉप्टर भारतीय सीमा में करीब 20 मिनट तक चक्कर लगाते रहे। इन्होंने काफी नीचे आकर भी मौके का जायजा लिया। इससे आशंका की गई कि चीनी हैलीकॉप्टर महज शरारत करने नहीं, बल्कि सैन्य जासूसी करने के मकसद से भेजे गए थे। ऐसे में, सेना ने इस कदम को काफी गंभीर माना है।

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर कहते हैं कि घरेलू मोर्चे पर ही नहीं, बाहरी मोर्चों पर भी यूपीए सरकार लगातार नाकाम साबित हो रही है। पिछले कई महीनों से सीमा पर चीन की तरफ से घुसपैठ की जा रही है। लेकिन, भारत सरकार कारगर ढंग से बीजिंग पर दबाव नहीं बना सका। रक्षा मंत्री चीन के दौरे पर भी गए थे। इसके बाद भी चीन के आक्रामक रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। यह काफी चिंता का विषय है।

सूत्रों के अनुसार, संसद के मानसून सत्र में भाजपा के नेता इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा के अलावा और कई दलों के बड़े नेता भी इस मामले को लेकर सरकार की भूमिका से संतुष्ट नहीं हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने तो यहां तक कह डाला है कि चीन के मुद्दे पर भारत की कूटनीति कुछ लुंज-पुंज लगती है। चूंकि, लद्दाख की सीमा में कई बार चीनी सैनिक घुसपैठ की वारदातें कर चुके हैं, ऐसे में जरूरी है कि भारत की तरफ से भी कड़े तेवर अपनाए जाएं। क्योंकि, सीमा के मामले में लचर रणनीति काफी खतरनाक हो सकती है।

सैन्य मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ भी लगातार अगाह कर रहे हैं कि चीन की सैन्य गतिविधियों पर भारत को और कड़ी नजर रखने की जरूरत है। क्योंकि, जिस तरह से लद्दाख सहित कई सीमाओं पर घुसपैठ की घटनाएं बढ़ रही हैं, उसके पीछे कोई सोची समझी सैन्य रणनीति भी हो सकती है। वैसे भी अरुणाचल को लेकर बीजिंग लगातार यही कह रहा है कि यह इलाका उसका है। इसमें गलत तरीके से भारत का कब्जा है। जाहिर है, इस तरह की बातें चीन के हुक्मरान अपनी शरारतों पर पर्दा डालने के लिए ही करते हैं।

सच्चाई यह है कि 1962 के युद्ध के बाद भी चीन का रुख भारतीय क्षेत्र को झपटने का ही रहा है। इसी के चलते कश्मीर क्षेत्र में   38,000 वर्ग किमी क्षेत्र को चीन ने हथिया लिया है। 1963 में पाकिस्तान ने अपने कब्जे वाले कश्मीर की 5,180 वर्ग किमी जमीन चीन को कथित तौर पर ‘विकास’ करने के लिए सौंप दी थी। इस तरह से चीन के कब्जे में भारत की 43,180 किमी जमीन है। पिछले दिनों सरकार ने सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी आधिकारिक रूप से जारी भी की है।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि चीन ने भारत के जिस क्षेत्र को हथिया लिया है, यह काफी पहले की बात है। हाल के वर्षों में चीन ने इस तरह की कोई हरकत नहीं की है। सच्चाई तो यह है कि दोनों देशों के बीच सीमा पर छिट-पुट विवादों के अलावा कोई बड़ा टंटा नहीं खड़ा हुआ है।

इधर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार का भी आकार काफी बढ़ गया है। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन यात्रा पर गए थे। इस यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच आपसी राजनीतिक और राजनयिक रिश्ते मजबूत ही हुए हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार की कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति के चलते देश की सीमाएं भी सुरक्षित नहीं बची हैं। पाकिस्तान की तरफ से आए दिन शरारतें होती रहती हैं। तमाम प्रतिरोध के बावजूद पाकिस्तान, जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों से घुसपैठ कराता रहता है। वहां से आने वाले घुसपैठिए भारत के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। सालों से यह स्थिति है।

लेकिन, भारत सरकार ऐसा कारगर कदम नहीं उठा पाई है जिससे कि पाकिस्तान घुसपैठ कराने का दुस्साहस न कर सके। अब कमजोर रणनीति के चलते चीन की तरफ से भी लगातार शरारतें हो रही हैं। लेकिन, भारत सरकार अपनी ज्यादा ऊर्जा इन वारदातों को लुकाने-छिपाने में ही लगा रही है। ताकि, उसकी कमजोरियां देश की जनता के सामने उजागर न हो पाएं।

दरअसल, 1988 में भारत और चीन ने तय किया था कि दोनों देश सीमा विवाद से जुड़े सभी मामले आपसी संवाद के जरिए निपटा लेंगे। इसके लिए एक संयुक्त कार्य समूह (जेडब्ल्यूजी) गठित किया गया था। इसकी अब तक 16 बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन, यह समूह विवादों के स्थाई समाधान का कोई फॉर्मूला नहीं निकाल पाया है। बैठकें चलती रहती हैं, लेकिन चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की वारदातें करने से बाज नहीं आते।

अप्रैल में लद्दाख क्षेत्र के दौलत-बेग-ओल्डी सेक्टर में कुछ चीनी सैनिकों ने घुसपैठ से बड़े गंभीर हालात पैदा कर दिए थे। पीएलए के करीब 50 हथियारबंद सैनिकों ने भारतीय सीमा में 19 किमी अंदर घुसकर पांच कैंप लगा दिए थे। भारतीय सेना के तमाम विरोध के बावजूद ये लोग 21 दिनों तक इन कैंपों में डटे रहे थे। इन्होंने मजबूर कर दिया था कि इस क्षेत्र में निगरानी करने वाले सुरक्षा गार्ड वहां से हट जाएं।

घुसपैठ की इस वारदात को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ा था। इसी गतिरोध के बीच विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने बीजिंग की यात्रा की थी। उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद दौलत-बेग-ओल्डी सेक्टर का गतिरोध टूटा था। 5 मई को चीनी घुसपैठिए वापस लौटे थे। लेकिन, दबाव में भारतीय सेना को भी चुमार सेक्टर में बने अपने दो निगरानी टॉवर हटाने पड़े थे। दरअसल, चुमार में सेना ने चार नए निगरानी टॉवर बनाए हैं। रणनीतिक रूप से इन टॉवरों के जरिए भारतीय सेना दूर तक चीन की सीमा की निगरानी कर सकती है। क्योंकि, चुमार का क्षेत्र काफी ऊंचाई पर है। इस सीमावर्ती इलाके में पहुंचने के लिए चीन की तरफ से सड़क मार्ग भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में, चुमार को लेकर चीन की निगाहें लंबे समय से लगी हैं। बीच-बीच में चीन की सेना चुमार को लेकर तरह-तरह के दावे भी करती रहती है।

17 जून को चुमार के ही इलाके में चीन के सैनिकों ने यहां पर एक बड़ी शरारत की थी। निगरानी टॉवरों के पास सेना के कैमरे लगे थे। चीनी घुसपैठियों ने कैमरों के तार काट दिए थे। दो कैमरे भी वे अपने साथ ले गए। इस घटना पर सेना के स्थानीय कमांडरों ने चीन के कमांडरों से काफी नाराजगी जाहिर की थी। ऐसे में, कई दिन बाद चीनी सैनिकों ने कैमरे वापस किए थे। इस घटना को लेकर भी दिल्ली और बीजिंग के बीच संवाद हुआ था। बाद में, रक्षा मंत्री बीजिंग यात्रा पर गए, तो यही माना गया कि कम से कम साल-छह महीने तो सीमा पर चीन की तरफ से शायद घुसपैठ की शरारतें न हों, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है कि 28 और 29 जून को संयुक्त कार्य समूह की 16वीं बैठक हुई थी। इसमें दौलत-बेग-ओल्डी और चुमार सेक्टर में हुई ताजा वारदातों के मामले उठाए गए थे। कार्य समूह में हिस्सा लेने वाले चीन के आलाधिकारियों ने भरोसा दिया था कि दोबारा उनकी तरफ से इस तरह की वारदातें नहीं होंगी। लेकिन, लगातार हो रही घुसपैठ की वारदातों से संयुक्त कार्य समूह की बैठकें भी महज औपचारिकता भर साबित हो रही हैं। यह अलग बात है कि रक्षा मंत्री एंटनी मानते हैं कि दोनों देशों की सीमाओं पर कोई गंभीर विवाद नहीं है। जो वारदातें हुई हैं, वे स्थानीय स्तर की हैं। ऐसे में, मीडिया और विपक्ष को ज्यादा हाय-तौबा नहीं मचानी चाहिए। लेकिन, भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व रक्षा मंत्री जसवंत सिंह इन घटनाओं को देश की सुरक्षा का गंभीर मामला मानते हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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