विज्ञान वाली टीचर की कहानी और वो लाख की चूड़ियां

कुछ लोग हमेशा याद आते हैं : इस वक्त जब मैं ब्लॉग के लिए नई पोस्ट तैयार कर रहा हूं तो मेरे मन में कई लोगों की यादें ताजा हो रही हैं। उनमें से कुछ बहुत कमाल के इंसान हैं और उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन लोगों को याद कर ईश्वर के प्रति मेरा विश्वास और पुख्ता हो जाता है, क्योंकि ऐसी विविधतापूर्ण सृष्टि की रचना आसान नहीं है। इस मामले में मैं बहुत नसीबवाला हूं। संभवत: मुझे इस दुनिया के सबसे रोचक लोगों का साथ मिला है और मैं उन्हें भूलने की गलती नहीं कर सकता। ऐसे लोग हमेशा याद आते हैं।
 
वह कहानी मैं भूला नहीं हूं : यह एक बेहद रोमांचक किस्सा है जिसकी आप कभी कल्पना नहीं कर सकते। यह एक खास कहानी है जो दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी स्कूल में सुनाई गई। मेरा अनुमान है कि अब शायद ही कोई इसे अपने विद्यार्थियों को सुनाने की हिम्मत करेगा। मैं हमारी विज्ञान की टीचर का इसके लिए आभार व्यक्त करना चाहूंगा। वह एक खास शाम थी जब टीचर हमारी क्लास में आर्इं। उस दिन हमने पढ़ाई में अरुचि दिखाई और पढ़ने की किसी भी संभावना से साफ इंकार कर दिया। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि अगले दो दिन लगातार छुट्टियां थीं, जिसकी कल्पना मात्र से हमारे मन में साहस का संचार हो रहा था। हमने टीचर से पढ़ाई के बजाय कोई कहानी सुनाने की मांग की। इस पर उन्होंने असमर्थता जताई, क्योंकि उन्हें कोई कहानी नहीं आती थी। उन्होंने ईदगाह और काबुली वाला जैसे कुछ नाम गिनाए लेकिन ये कहानियां हम कई बार पढ़ चुके थे। आखिर उन्हें एक कहानी याद आई और सुनानी शुरू की। उनके सुनाने के तरीके से साफ मालूम होता था कि उस कहानी पर उन्होंने काफी मेहनत की है। शायद वह कहानी उन्होंने खुद भी कई बार सुनी होगी। कहानी पूरी होने के बाद मालूम हुआ कि वह करवाचौथ की कथा थी और क्या गजब संयोग था कि अगले दिन करवा चौथ का व्रत भी था। मुझे पूरा यकीन है कि सृष्टि के निर्माण से लेकर आज तक केवल मेरी क्लास के बच्चों ने ही स्कूल में करवाचौथ की कथा सुनी है। मैं आज भी उस कहानी को भूला नहीं हूं। अगर परीक्षा में थ्रस्टी क्रो, ग्रीडी डॉग के बजाय यह कहानी पूछी जाय तो यकीनन मुझे सबसे ज्यादा नंबर मिलेंगे।
 
चूड़ियों को कमजोर मत समझो : यह किस्सा सुनाने से पहले मैं उम्मीद करता हूं कि जिन लोगों का यहां जिक्र किया जाएगा वे कभी मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ेंगे। साथ ही आपको मेरा विनम्र सुझाव है कि भविष्य में कभी इस मुहावरे का प्रयोग न करें कि "हमने हाथ में चूड़ियां नहीं पहन रखीं।" वास्तव में यह मुहावरा समय के साथ अपडेट नहीं हुआ। अगर ऐसा होता तो कोई यह बोलने की हिम्मत नहीं करता। यहां मैं किसी क्रांति या महिला अधिकारों का जिक्र नहीं कर रहा, लेकिन इस घटना के बारे में जानने के बाद आपका नजरिया पूरी तरह बदल जाएगा।
 
एक दिन मेरे गांव में नजदीकी कस्बे से एक व्यापारी चूड़ियां बेचने आया। उसके पास लाख की चमचमाती चूड़ियां थीं जो तुरंत बिक गर्इं। अगले दिन वह फिर आया और उसने मोहल्ले में आवाज लगाई। कुछ देर बाद मेरे स्कूल के मास्टरजी की पत्नी वहां आर्इं और उन्होंने चूड़ियां पसंद कीं। मोल-भाव करने के बाद 150 रुपए में बात तय हुई लेकिन उनके पास सिर्फ 50 रुपए थे। इस पर व्यापारी ने कहा, "कोई बात नहीं बहनजी, आप चूड़ियां ले लीजिए। पैसे कल ले जाऊंगा।" लेकिन यह बात उन्हें स्वाभिमान के विरुद्ध लगी और उन्होंने अगले दिन पूरी रकम के साथ ही चूड़ियां लेने की बात कही। शाम को मास्टरजी स्कूल से लौटे। किताबें अलमारी में रखने के बाद वे गर्मागर्म चाय पी रहे थे तभी उनकी पत्नी ने 100 रुपए की मांग की। मास्टरजी को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने इस मांग के पीछे वाजिब कारण जानना चाहा। जब उन्हें मालूम हुआ कि ये रुपए लाख की चूड़ियों के लिए मांगे जा रहे हैं तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। मास्टरनी जी ने संकल्प लिया कि अब तो लाख की चूड़ियां पहनने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करूंगी नहीं तो ऐसी जिंदगी से मरना कहीं ज्यादा सम्मानजनक है।
 
अगले दिन जब हम स्कूल गए तो एक महिला वहां झाड़ू लगा रही थी। उनके बारे में सबके अलग-अलग अनुमान थे। कोई कहता कि सरकार ने उन्हें यहां स्थायी नियुक्ति दी है तो कोई कहता बेचारी दुखिया है। पेट पालने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता! यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। थोड़ी देर बाद मास्टरजी बगल में पोथी दबाए स्कूल में हाजिर हुए। उन्हें सफाई कार्य में लगी महिला कुछ जानी-पहचानी लगी। वे उससे बातें करने लगे, कुछ देर बाद उनमें झगड़ा होने लगा। मास्टरजी उसके सामने हाथ जोड़कर अपनी इज्जत बचाने की गुहार कर रहे थे। घटना का भंडाफोड़ होने पर मालूम हुआ कि वह महिला मास्टरजी की पत्नी थीं। इधर स्कूल में भीड़ बढ़ती जा रही थी और गांव के लोग भी नजारा देखने आने लगे। मास्टरजी की फजीहत होने की पूरी संभावना थी। कोई और उपाय न देख उन्होंने अपनी जेब में हाथ दिया और 100 का नोट देकर लाज बचाई।
 
चलते-चलते : शेक्सपियर की एक मशहूर कविता पढ़ने के बाद मैं इस बात से सहमत हूं कि पूरी दुनिया एक रंगमंच है। कुछ लोग एक निश्चित किरदार निभाने के लिए मंच पर आते हैं। यह जरूरी नहीं कि उनकी भूमिका पर हर कोई तालियां बजाए लेकिन वे लोग एक खास भूमिका के लिए ही बने होते हैं। यह भी जरूरी नहीं कि उनकी जिंदगी की किताब सुनहरी स्याही से लिखी जाए। जिंदगी की किताब में महत्व इस बात का नहीं कि वह किस रंग की स्याही से लिखी गई है, बल्कि महत्व इस बात का है कि इसमें कैसे शब्द शामिल किए गए हैं।  
 
राजीव शर्मा
 
संचालक- गांव का गुरुकुल

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