विपक्षियों के लिए मुश्किल है बसपा के सांगठनिक तिलिस्‍म को भेद पाना

उत्तर प्रदेश के चुनाव में सत्ताधारी पार्टी की खामोशी सबको आश्चर्यचकित कर रही है क्योंकि न कहीं प्रचार दिख रहा है और न ही कहीं राजनैतिक बयानबाज़ी। कुछ लोग भले ही इसे पार्टी का अतिआत्मविश्वास कहें या फिर चुनाव परिणाम आने से पहले हार मान लेना कहें। लेकिन हकीक़त कुछ और है, दरअसल बसपा ने पांच साल तक शासन करने के साथ-साथ अपने संगठन को भी मजबूत करने का काम किया है। मायावती ने एक ऐसा मायावी जाल अपने भरोसेमंद कोऑर्डिनेटर का बुना है जिसके तिलिस्म को भेदना विपक्षी दलों के साथ-साथ उनके ही पार्टी के नेताओं के लिए भी बेहद मुश्किल है।

सत्ता और संगठन को अलग-अलग रख कर बनाया गया यह तिलिस्म ही उनके आत्मविश्वासी होने का कारण है। क्योंकि मायावती उत्तर प्रदेश के एक-एक वोट पर अपने कोऑर्डिनेटर के माध्यम से नजर रखतीं हैं। या यूं कहें सत्ता के साथ-साथ पांच साल लगातार बसपा का प्रचार भी चलता रहा है। बसपा ने अपने कोऑर्डिनेटर को अवास, वाहन और तमाम तरह की सुविधा दे रखी है। पार्टी में कोऑर्डिनेटर चुने गए प्रतिनिधि से ज्यादा पावरफुल होते हैं। वे इनके कामों कि नियमित समीक्षा करते हैं लेकिन प्रशासन में दखलंदाज़ी करने की इजाज़त कोऑर्डिनेटरों नहीं है। कोऑर्डिनेटर केवल पार्टी का काम देखते हैं और प्रशासनिक मामले की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों पर है। बसपा में टिकट का फैसला इन कोऑर्डिनेटर के रिपोर्ट पर ही आधारित होता है। और शायद यह इसी तिलिस्म का कमाल है कि बसपा ने सभी 403 सीटों के लिए उम्मीवारों के नाम एक साथ घोषित कर दिया।

संगठन का ढांचा

• पूरे प्रदेश को 13 जोन में बांटा गया है।

• हर जोन पर भरोसेमंद जोनल कोऑर्डिनेटर नियुक्त। सभी दलित।

• उनके नीचे जिला कोऑर्डिनेटर। सवर्ण भी।

• जिला कोऑर्डिनेटर के अंतर्गत तहसील, ब्लाक और ग्रामीण स्तर पर मौजूद कोऑर्डिनेटरों के माध्यम से काम कराना।

• जिला कोऑर्डिनेटर के पास उनके अंतर्गत काम करने वाले का नाम नंबर और कामकाज का लेखा जोखा एक रजिस्टर में दर्ज रहता है। बूथ स्तर पर पड़ताल करना? पोलिंग बूथ में कितने घर हैं? किस पार्टी के कितने समर्थक हैं? बूथ कोऑर्डिनेटर ने कितने घर से संपर्क किया? दूसरी पार्टी के कितने समर्थक को बसपा से जोड़ने में सफलता पाई? इन सब पर जिला कोऑर्डिनेटर की नजर रहती है।

• मायावती के पास भी एक रजिस्टर रहता है जिसमें कोऑर्डिनेटरों का नाम नंबर मौजूद रहता है और जरुरत समझने पर मायावती खुद कोऑर्डिनेटर के काम की जानकारी लेती रहती हैं।

• कोऑर्डिनेटर पार्टी के जड़ को मजबूत करने के लिए रणनीति बनाते हैं।

लेखक अब्‍दुल रशीद पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *