विवेकाधिकार मतलब बंटाधार

कई बार हम सुनते हैं कि फलां मंत्री या प्राधिकारी ने फलां काम अपने विवेकाधिकार के तहत किया. हम यह पाते हैं कि विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए एक व्यक्ति के लिए एक प्रकार का सलूक और दुसरे व्यक्ति के लिए दुसरे प्रकार का सलूक हो जाता है. दिक्कत यह होती है कि सम्बंधित प्राधिकारी विवेकाधिकार (डिसक्रिशन) की बात कह कर बच निकले का प्रयास करते हैं और देखा यह जाता है कि अक्सर वे इस आधार पर अपने आप को बचाने में सफल भी हो जाते हैं.

पिछले कुछ सालों से मैं लगातार प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के क्षेत्र में कार्यरत हूँ और जितना अधिक मैं इस क्षेत्र में समर्पित हो रहा हूँ उतना अधिक यह पाता हूँ कि कई स्थानों पर, कई व्यक्तियों द्वारा इसका सीधा और घोर उल्लंघन किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में मेरा यह व्यक्तिगत मत है कि चूँकि प्रत्येक प्राधिकारी को हर काम में अपने व्यक्तिगत अभिमत, अपनी सोच, अपनी चाहत और अपनी मनमर्जी को अधिरोपित करने का इतना अधिक अख्तियार है कि कई बार तमाम नियमों और कानूनों के बाद भी अन्तोगत्वा वस्तुनिष्ठता के स्थान पर व्यक्तिपरकता आ ही जाती है और बहुधा अंतिम निर्णय सम्बंधित अधिकारी के विवेक पर आधारित हो जाने की पूरी संभावना रहती है. यदि हमें प्रशासनिक व्यवस्था में वास्तविक सुधार लाना है तो इसी मनमानेपण की गुंजाइश को यथासंभव समाप्त करने की कार्यवाही करनी होगी.

मैं एक लम्बे समय से ऐसे पदों पर नहीं था जहां मेरे सामने इस प्रकार की स्थितियां आयें जहां मुझे निर्णय लेने की जरूरत हो. रूल्स एवं मैनुअल्स विभाग में, जहां मैं पिछले लगभग दो सालों से काम कर रहा था, ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि जहां कोई स्पष्ट कार्य हो वहीँ तो उस कार्य के सम्बन्ध में निर्णय लेने का प्रश्न आता है. इसके विपरीत जब मुझे आजमगढ़ पीएसी में सेनानायक के पद पर तैनाती मिली तब मुझे ऐसे अवसर आने शुरू हुए जब मुझे और सिर्फ मुझे निर्णय लेने थे. ऐसे में मुझे स्वयं काफी-कुछ सीखने का अवसर मिल रहा है जो मैं लोगों से इस उद्देश्य से साझा करना चाहता हूँ कि मेरे स्वयं के अनुभव यह बताएँगे कि कैसे यदि हम चाहें तो प्राधिकारी की व्यक्तिपरकता को कम करते हुए उसके स्थान पर निष्पक्षता और वस्तुनिष्टता को प्रभावी बना सकते हैं.

मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि पीएसी के सेनानायक के पद पर ऐसे अनेकानेक अवसर नहीं आते और निश्चित रूप से कई ऐसे पद होंगे जहां प्राधिकारी के स्वयं के स्तर पर ही निर्णय लिए जाने के बारम्बार अवसर हुआ करते हों, पर मैं यह भी कहना चाहूँगा कि जो बात अपने स्वयं के दो अनुभवों से सामने रख रहा हूँ, वह अन्य तमाम स्थितियों पर भी कमोबेश सिद्धांततया लागू हो सकते हैं, यद्यपि निश्चित रूप से प्रत्येक स्थिति की अपनी स्वयं की विशिष्ठता तो होती ही है.

सबसे पहले जब मैं पीएसी में आया तो मेरे पास कई सालों बाद बरसों पहले छूटे कुछ इष्ट-मित्रों के फोन आने शुरू हुए. जाहिर है कि चूँकि मैं लम्बे समय तक “बेकार” और “बेजार” जगह पर तैनात था जहां किसी को कोई काम नहीं पड़ता था और इसीलिए ऐसे मित्रों के फोन भी नहीं आया करते थे. इन फोन से मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे बटालियन से कुछ आरक्षियों के नाम अर्मोरर पद के लिए भेजे जाने हैं, जिसके लिए तमाम आरक्षी इच्छुक हैं. इन्ही इच्छुक आरक्षियों के लिए मित्रों और कुछ राजनेताओं के फोन आने शुरू हुए.

मैंने कार्यालय से ज्ञात किया तो मालूम चला कि कुल पच्चीस आरक्षी ने इस पद पर नामांकन के लिए आवेदन किया है. यह भी ज्ञात हुआ कि किसका नाम मेरी तरफ से आगे बढ़ाया जाए इस सम्बन्ध में कोई स्थापित नियम नहीं है अर्थात यह पूरी तरह मेरे विवेक और मेरी इच्छा पर आधारित है. मतलब यह कि इस सम्बन्ध में मैं कोई भी नाम भेज सकता हूँ और पूरी तरह उत्तरदायित्व और पारदर्शिता के आवरण से विमुक्त हूँ.

शायद पहले का अमिताभ ठाकुर रहा होता तो किसी निकट इष्ट-मित्र के कहे पर कोई तीन नाम की संस्तुति कर देता. लेकिन पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के प्रति मेरे उत्साह और समर्पण ने मुझे बाध्य कर दिया कि यदि कोई नियम नहीं है तो मैं अपने स्तर पर इसके लिए कोई नियम बना लूँ और उस निर्धारित रीति के अनुरूप जो सबसे ऊपर रहे उसका नाम स्वतः ही संस्तुत हो जाएगा. मैंने इस सम्बन्ध मे जानकार अधिकारियों को बुलाया और उनसे चर्चा कर इस पद के लिए जो अर्हता दिखी, उसे ध्यान में रहते हुए इन अधिकारियों की सहमति से एक नियम बना दिया.

अगले दिन मेरे पास उस नियम के अनुसार सभी आरक्षियों के अंक प्राप्त हो गए और तीन लोग जो सबसे ऊपर थे, मई स्वयं ही उनके नाम भेजने को बाध्य हो गया. तात्पर्य यह कि मैंने अपनी इच्छा को एक नियम में परिवर्तित कर दिया जिससे मेरी किसी का पक्ष लेने यदि कोई इच्छा रही भी तो तो भी वह स्वतः ही समाप्त हो गयी.

अगले उदाहरण के रूप में मैं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती का उदाहरण देना चाहूँगा. मुझे एक चयन समिति, जिसका मैं अध्यक्ष था, के साथ सात चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की कुक (रसोईया) पद पर भर्ती करनी थी. पद सात और आवेदन लगभग 550. यहाँ भी जब मैंने देखा तो पाया कि अर्हता और चयन प्रक्रिया के रूप में मात्र इतना व्यवसायिक दक्षता अंकित था. व्यवसायिक दक्षता का यहाँ क्या अर्थ हुआ और इसे कैसे मापा जाए, यह बात स्पष्ट नहीं थी. मुझे मौखिक रूप से लोगों ने बताया कि यह भर्ती कुल मिला कर मेरी मर्जी से होगी क्योंकि चूँकि विशेष निर्धारित प्रक्रिया है नहीं और व्यवसायिक दक्षता का कोई पैमाना नहीं होने के कारण जिसे मैं व्यावसायिक दक्ष मान लूँगा वही चयनित हो जाएगा.

इधर भर्ती शुरू हुई नहीं कि कई फोन आने शुरू हो गए- कुछ मंत्रियों के, कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के, कुछ अन्य परिचितों के. सभी यही कहते कि आप जिसे चाहेंगे उसका चयन हो जाएगा, कृपया इसका चयन कर दीजिये. कुछ तो इधर-उधर का इशारा भी कर देते.

मैंने इस विषय पर विचार मंथन किया और सोचा कि इस प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता लाने के लिए क्या किया जाए. इस विमर्श से यह बात उभरी कि चूँकि भर्ती कुक पद के लिए है अतः खाना बनवाने का काम दिया जाए. फिर यह विचार हुआ कि ऐसा क्या बनवाया जाए जो कम समय में हो सके, जिसमे बहुत खर्च भी नहीं आये, जो आसानी से कराया भी जा सके और जिससे दक्षता भी टेस्ट हो जाये. विचार विमर्श से यह तय हुआ कि रोटी सेंकना और खीरे को छील कर सलाद बनवाना ठीक रहेगा. इसके लिए समय निर्धारित किया गया बीस मिनट.

चयन समिति के बाकी सदस्य भी इस व्यवस्था से काफी प्रसन्न दिखे. जब पहले दौर में यह कार्यक्रम हमने प्रारम्भ किया तो मेरे मन में शंका थी- पता नहीं यह प्रयोग सफल होगा अथवा नहीं. लेकिन एक बार में ही मालूम हो गया कि हमने बिलकुल सही विधा खोज ली है. हमने यह भी निश्चय किया कि मौके पर चारों सदस्य अपने अंक इंक पेन से देंगे और उसे अभ्यर्थी को भी बता देंगे, जिससे हमारे स्तर पर गड़बड़ी की कोई संभावना ही ना रह सके.

इस प्रक्रिया में मुझे वास्तव में बहुत संतोष मिला और सब कुछ आँखों के सामने होता दिखा. लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि चूँकि मैंने ऐसा चाहां इसीलिए यह समस्त प्रयोजन किये, यदि नहीं चाहता तो दोनों मामलों में मनमर्जी से कुछ कर देता, जिससे मेरी मर्जी भी सफल हो जाती और मेरा कहीं उत्तरदायित्व भी नहीं बनता.

इन बातों से यह साफ़ हो जाता है कि व्यवस्थाजन्य परिवर्तन और वास्तविक पारदर्शिता लाने के लिए हर कदम पर नियमों और प्रक्रिया में इतनी स्पष्टता और वस्तुनिष्ठता होनी पड़ेगी कि किसी के पास मनमर्जी और मनमानापन की गुंजाइश ही ना बचे और ना ही विवेकाधिकार के नाम कर कोई व्यवस्था का बंटाधार कर सके बल्कि नियमों और प्रक्रियाओं में कैद हो कर वह वस्तुनिष्ठता अख्तियार करने को पूरी तरह बाध्य रहे, ताकि हर अमिताभ ठाकुर हर सरकारी पद पर चाह कर भी अपनी गलत-सही मर्जी चलाने की स्थिति से पूरो तरह वंचित हो जाये.

लेखक अमिताभ ठाकुर यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों आजमगढ़ में पदस्थ हैं. जनहित के मसलों और सिस्टम में पारदर्शिता के लिए सक्रिय रहते हैं. अपने बेबाक बयानी व लेखन के लिए जाने जाते हैं. अमिताभ से संपर्क amitabhthakurlko@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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