वीएन राय साब, ये है अंतिम संवाद, अब मिलेंगे कोर्ट में गवाही के दौरान

Sanjeev Chandan : (एक खत उसके नाम, जिससे सावधान रहने की जरूरत है, हिंदी समाज और हिंदी की चेतना को …. उसके नाम जिसकी नजर हिंदी के नाम पर करोड़ों के बाजार पर है, अनुदान राशियों और मालदार संस्थाओं पर है.)

विभूति राय महोदय,

यह शायद आपसे अंतिम सम्वाद हो, जो सार्वजनिक तौर पर कर रहा हूं. वैसे तो आप खुद ही घोषित कर चुके हैं कि आप मोटी चमड़ी के हैं. लेकिन आप साहित्यिक और दूसरे सामाजिक सरोकारों की दावेदारी भी करते रहे हैं, इसलिए थोड़ी शर्म-हया तो होगी ही. वैसे उसकी अपेक्षा तो हमें नहीं है, हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए आपके कारनामो के मद्देनजर.

इस पत्र का इसलिए भी सार्वजनिक महत्व है कि आप अपने कुनबे के साथ हिंदी की चेतना पर आज भी काबिज होने के प्रयास में है. इसके लिए आप अपने आईपीएस के रुतबे और सम्पर्कों के बल पर प्राप्त सत्ता के अहसास के साथ स्वयं को शक्तिशाली जता कर अपने आस-पास एक भीड़ खड़ी कर चुके हैं. वैसे हमने आपको एक कमजोर शातिर और तिकड़मबाज के रूप में देखा है. ऐसा नहीं होता तो आप अपने लिए दूसरा टर्म हासिल कर लिया होता या आपने कार्यकाल का इतना विस्तार जरूर ले लिया होता कि अगले कुलपति के आने तक आप वहां बने रहते. ऐसा नहीं होता तो हर सत्तवान के आगे उसकी हैसियत के अनुरूप आपकी रीढ में सुरसुराहट नहीं होती और ऐसा नहीं होता तो अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए आप तिकड़में नहीं कर रहे होते.

क्या आप पूरी इमानदारी से, अपने बचे-खुचे जमीर के साथ कह सकते हैं कि मुझे और राजीव सुमन को ठिकाने लगाने के लिए आपने फर्जी मायग्रेशन नहीं बनावाया था! यदि आपमें सामान्य आदमियत भी बची हो तो क्या आप बता सकते हैं कि जाते-जाते अपने विरोधियों को दंड देने के लिए आपने कितने तिकड़म किये, कितने झूठ बोले..!

आप बातयेंगे कि अपने स्वजातीय छोटे भाई, पांवलग्गी करने वाले एसपी के साथ मिलकर विरोधियों को ठिकाने लगाने के कौन -कौन से उपाय किये..!!

मै यहां आपके द्वारा हिंदी विवि में की गई लूट, अवैध नियुक्तियों की बात नहीं करूंगा. यहां पांच सालों तक आपके टुच्चेपन और गिरी हरकतों की ही याद दिला रहा हूं, जो आपके आदमी होने पर भी संदेह पैदा करते हैं, सम्वेदनशील साहित्यकार होना (जिसकी आप दावेदारी करते है) तो दूर की बात है.

आपको याद ही होगा कि आपने कैसी-कैसी धमकियां किन-किन माध्यमों से भिजवाई थी हमें, उनमें एक पुलिस आफिसर भी था, जिसके फार्म हाउस पर दारू -दावत में जाते थे आप. आपका वह पुलिस वाला जानना चाहता था (आपके इशारे पर) कि हमारी आय का क्या स्रोत है. आय की चिंता आपको दो कारणों से थी, एक तो मुकदमों के लिए हमें पैसे कहां से आते हैं, हम निरंतर सक्रिय कैसे रहते हैं, यह जानना आपके लिए जरूरी था, ताकि आप हमारे आर्थिक आधार को तोड़ सकें.

दूसरा इसलिए कि हमारा रहन -सहन आपकी आंखों में चुभता था कि कोई वर्धा में आपकी कृपा के बगैर कैसे रह सकता है, आपसे लड़ते हुए. आप बहुविध उपायों से सफल नहीं हो पाये तो अपनी जाति के छूटभैय्ये ऐयारों, कुछ तिवारियों, शर्माओं के द्वारा फैलाये गये अफवाहों को हवा देनी शुरू की, कि कभी विश्वविद्यालय के एक अधिकारी का रुपया मेरे अकाउंट से रूट होता था, क्या पुलिसिया दिमाग पाया था आपने. कितना धांसू हवाला खोज लिया था आपने. है न. जनाब, हमारे आर्थिक स्रोतों की जानकारी के लिए आपकी बेचैनी का आलम यह था कि आपने राजीव सुमन की शादी के बाद निहायत ही घटिया बयान दिया कि एक कमाने वाली लड़की (डाक्टर) की शादी एक बेरोजगार से ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी. जब पद्मा जी आप जैसे ऐयाश पति को वर्षों झेलती रहीं तो हम जैसे लड़ाकों के साथ के लिए लड़कियों का होना आश्चर्यजनक नहीं होता है दारोगा बाबू…!

वैसे आपकी बेचैनी को शांत कर दें और बता दें कि हमारी लड़ाई का बीस से तीस प्रतिशत खर्च चंदों से और शेष कर्जों से आया है. भवानी और मनीषा ने भी कुर्बानियां दी हैं.

आप जाते-जाते लोगों को एसएमएस कर गये कि आप 5 सालों का कार्यकाल पूरा करके जा रहे हैं. जनाब मुझे आपकी मजबूरी पता है. कुछ जख्म ऐसी जगहों पर होते हैं, जो दिखाये नहीं जा सकते हैं. आपको भी खूब पता है कि एडिया रगडने के बाद भी आप किन कारणों से दुबारा टर्म नहीं ले पाये. एक्स्टेंशन मिला भी तो मुश्किल से तीन महीने का. आपको पता है कि आप चाह कर भी बी एड -एम एड की ळूट नहीं मचा पाये , अपने चहेतों को वहां भी नियुक्त नहीं कर पाये. आप घोषणायें कर कर के थक गये लेकिन 12वां प्लान नहीं ला सके. और घबराइये नहीं जल्द ही आपके दूसरे ळूट और अवैध गतिविधियों के कारण कुछ पंजे आपकी गर्दन की ओर भी बढेंगे.

जनाब राय साहब आप अपने बचाव में क्या -क्या कुतर्क लेकर आते रहे हैं . जिस आदमी ने दारू और ऐययाशियों को विश्वविद्यालय का मूल्य बना दिया, वैसे मूल्य , जो कुलपति की नजदिकियां प्राप्त करने के लिए जरूरी थे, जिस आदमी ने अपने ऐय्याश मित्र को एक लडकी पर बलात्कार की कोशिशों के बावजूद अभय दिया और प्रोफेसर बनाये रखा, उत्तरपूर्व से छेडछाड के लिए तमाचा खाकर आये एक ऐय्याश को अपने यहां शरण दिया, वह जाते -जाते अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए महिला उत्पीडन के फर्जी मामले बनवाकर गया , उन्हें नौकरी से निकाल कर गया , मानो वह वि वि नहीं षडयंत्र का कोतवाली चलाता रहा हो. मजेदार है कि अपने बचाव में मुझ पर हमला करते हुए 'महिला उत्पीडन' का ही ढाल लेता रहा . कोतवाल साहब आपको खूब पता है कि मैं आज भी अपने फर्जी मेल की जांच के लिए प्रयासरत हूं. आपने हर प्रतिबद्धता पर तमाचे लगाये. जिन लोगों ने 'महिला समितियों' के गठन के लिए संघर्ष किया, उसके नियम बनाये उन्हें ही फर्जी आरोपों की जाल में फंसाया . विश्वविद्यालय को दुर्भिसंधियों का अड्डा बना दिया .

राय साहब , आपको भी खूब पता है कि आपने अपने पूरे कार्यकाल में एक टाउनप्लानर की हैसियत से जितने भवन बनाये , लूट किये , उतनी ही जिंदगियां तबाह की, मामूली कारणों से , सिर्फ इसलिए भी कि वह विश्वविद्यालय में रहते हुए, पढते या काम करते हुए, आपके यहां सजदे करने नहीं गया. सुना है कि अब आप 'हाशिमपूरा' की फसल फिर से काटने वाले हैं. जरा यह भी बताइयेगा कि आपने निरपराध मुसलमानों की हत्या करने वाले हत्यारों के खिलाफ कैसी एफ आइ आर लिखवाई कि एक को भी सजा नहीं मिली. इस मामले में कितने की लेन -देन की है आपने विभूति नारायण राय महोदय ! इस अंतिम सम्वाद के बाद फिर मिलेंगे ……. कुछ मुकदमों में आपके खिलाफ गवाही के लिए.

संजीव चंदन के फेसबुक वॉल से.

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