वीके सिंह को फंसाने के लिए जो रपट उछाली गई, वह केंद्र के गले की फांस बनी

जनरल वी.के. सिंह को बदनाम करने के लिए सरकार ने जब एक गोपनीय रपट को अखबारों में उछलवाया था तो पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि यह सरकार का देशद्रोहपूर्ण कार्य है। उस समय सरकार के बारे में मेरी यह राय कुछ लोगों को काफी कठोर मालूम पड़ रही थी लेकिन अब जबकि सरकार की पोल अपने आप खुलती जा रही है तो वह और उसके नेता हाय-तौबा मचाने लगे हैं। वी.के. सिंह को फंसाने के लिए जो रपट उछाली गई थी, वही अब केंद्र सरकार के गले का हार बन गई है। सरकार को अब पता चल रहा है कि इस रपट को सार्वजनिक करने के दुष्परिणाम क्या होंगे।

इस रपट में सरकार ने यह कहलवाया कि जनरल सिंह ने अपने कार्यकाल में फौज की करोड़ों की गुप्त-राशि जम्मू-कश्मीर के मंत्रियों को चटा दी ताकि वे उमर अब्दुल्ला की सरकार को गिरवा सकें। अखबारों में कुछ मंत्रियों के नाम और उन्हें दी गई राशियां भी छपीं। यह स्वभाविक था कि जनरल सिंह इस आरोप का खंडन करते या सफाई देते। उन्हें सरकार ने सफाई देने के लिए मजबूर किया। उन्होंने मजबूरी में उस राशि के वितरण का सैद्धांतिक ब्यौरा भी प्रगट कर दिया। अगर वे चुप रहते तो उनकी बदनामी तो होती ही, सरकार की बदनामी ज्यादा होती। पाकिस्तान में कहा जाता कि भारत सरकार कश्मीर पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए स्थानीय नेताओं को करोड़ों की रिश्वत भी देती है। इसीलिए जनरल सिंह ने बताया कि वह राशि रिश्वत की नहीं, सदभाव की राशि होती है, जो मंत्रियों को दी जाती है। जनरल सिंह के इस बयान से सरकार की छवि थोड़ी सुधरती है, लेकिन आश्चर्य है कि कांग्रेस के नेता अपने हाथों ही अपने पांव पर कुलहाड़ी मार रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जनरल सिंह नाम उजागर करें।

अब इन नेताओं से पूछा जाए कि नाम उजागर होंगे तो किनके होंगे? उन्हीं के होंगे, जिनकी सरकारें श्रीनगर में आज तक बनती रही हैं। जनरल सिंह का कहना है कि ये राशियां शुरू से दी जा रही हैं, यदि यह सच है तो क्या इस जाल में कांग्रेसी नहीं फंसेंगे? फारुख अब्दुल्ला और कांग्रेसी नेता अपने आपको बड़ा दूध का धुला दिखा रहे हैं और उन्होंने ऐसा तेवर धारण कर लिया है, जैसे कि उन्हें आज तक इस तरह की हेराफेरी की भनक भी नहीं थी।

अच्छा होता कि जनरल सिंह चुप रह जाते लेकिन अब हमारी गुप्तचर एजंसियों के रहस्य खुलने शुरू हो जांएगे। सरकार में बैठे कुछ मुर्ख नेता अपने विरोधियों का मुंह काला करने के चक्कर में अपनी नाक कटवाने का आयोजन कर रहे हैं। उनकी कटे तो कट जाए लेकिन यह भारत की बदनामी भी है। सीमांत क्षेत्रों में सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ फौज की ही नहीं होती, गुप्तचर संस्थाओं की भी होती है। इस रपट का दुरुपयोग करके सरकार ने हमारी गुप्तचर एजेंसियों को भी खतरे में डाल दिया है। उन कश्मीरी नेताओं की स्थिति भी विषम कर दी है जिन्होंने भारत के साथ सहयोग किया है। इस दृष्टि से भारत सरकार के जिन नेताओं ने यह नादानी की है, उनका यह कार्य देशद्रोह से कम नहीं है। जनरल सिंह या बाबा रामदेव या अन्ना हजारे से लड़ने के लिए अपने देश की सुरक्षा को खतरे में डालना कहां तक उचित है?

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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