हमने लोगों तक पहुंचने का नया तरीका अपनाया था। इसके दो मकसद थे। पहला यह कि वोटरों से सीधा परिचय होगा और उन्हें उनके मतदान केंद्र तथा क्रम संख्या आसानी से मिल जाएगी। मेरा यह मानना था कि जिन लोगों तक हम यह सुविधा पहुंचाएंगे, वह मेरे प्रति एक सकारात्मक सोच बनाएंगे और हमारे पक्ष में मतदान भी करेंगे। चुनाव अभियान में मेरा एक सूत्री कार्यक्रम बन गया था घर-घर पर्ची पहुंचाना। यह अपने आप में नया अनुभव था।
कुल मिलाकर पांच गांव और करीब 43 सौ लोग। सबके घर पहुंचना संभव नहीं था, पर अपने उपलब्ध साधन और समय में अधिकतम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था। मुंह अंधेरे में घर से निकलते थे और शाम ढलने के बाद पंचायत से बाहर निकलते थे। कभी किसी के खलिहान में पहुंच जाता था तो कभी किसी के दलान में। कहीं-कहीं चाय भी मिल जाती थी, तो कहीं छुछे चर्चा होती थी। ए फोर साइज के पेपर में चार पर्चे बने हुए थे। पन्ने को चार भागों में फाड़ देता था। यानी एक पन्ना में चार पर्चा बन जाता था। उस परचे में नाम व चुनाव चिह्न लिखा हुआ था और लोगों से वोट देने की अपील की गई थी। इसमें मैंने अपने को निर्विवाद उम्मीदवार बताया था। इसके साथ ही पर्चे में हर तरह से सहयोग की उम्मीद भी जतायी थी।
कंधे में एक बैग। बैग में पर्चा और हाथ में वोटर लिस्ट। पैर में फटा बेआर और काम चलाऊ चप्पल। ठंड से बचने के लिए शरीर पर जैकेट और कंधे पर मफलर। यही पहचान थी उम्मीदवार वीरेंद्र यादव की। किसी भी परिचित-अपरिचित के दरवाजे पर पहुंच जाना। नमस्कार से बातचीत से शुरुआत। चुनाव जीतने का कोई दावा नहीं। लेकिन वोट लेने के कई तर्क। जाति, मुखरता, कार्यों के लिए अधिकारियों से निबट लेने का दावा और योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने का संकल्प। यही तर्क थे हमारे। तर्कों का आकार, प्रकार व स्वरूप वोटर की जाति, गांव और माहौल के हिसाब से बदल जाता था। पासवान के मुहल्ले में अहीर-दुसाध मौसरे भाई की लोकोक्ति का इस्तेमाल करता था तो भूमिहारों के मुहल्लों में यादव-भूमिहारों के वामपंथी आंदोलन में पूरक भूमिका की भी चर्चा करता था। ब्राह्मणों के दरवाजे पर यह भी कहा कि आपको चुनना किसी पिछड़े या दलित को ही है तो हमें ही चुनिए।
इस संबंध में मेरा अपना व्यक्तित्व एक सहायक की भूमिका में था और जाति को लेकर मुखरता एक ताकत थी। जिस आत्मीयता के साथ चमारों के साथ चटाई पर बैठ कर खाता था, उसी आत्मीयता के साथ ब्राह्मणों के साथ चौकी पर बैठ संभावना पर चर्चा किया करता था। बिंदा डोम के घर जब पानी मांगा तो कोई पानी देने को तैयार नहीं था। उन्हें यह भरोसा दिलाया कि पानी लाइए, प्यास लगी है। इसके बाद उनकी पत्नी एक ग्लास में पानी भर कर लाई।
जातिगत विविधता वाली इस पंचायत में जातीय समीकरण एक महत्वपूर्ण फैक्टर था। इस कारण उसकी महत्ता को नकार नहीं सकता था। जातियों के अंदर भी खेमेबंदी है। बनियों में कई खेमे थे। जैसे तेली बनिया, सिंदूरिया बनिया आदि। ब्राह्मणों में भी तिवारी टोला अलग है तो दूबे टोला अलग। हर टोले का अपना-अपना वोट विहैब (मतदान व्यवहार)। गांवों की बनावट भी काफी कुछ जातियों के आधार पर ही है। भूमिहार टोला में भूमिहारों की अधिकता है तो कुम्हार टोला में कुम्हारों की। यादव टोला में यादवों की बहुलता। हालांकि इस विभाजन की कोई सीमा रेखा नहीं थी।
मैं अपने पर्ची के साथ किसी के दरवाजे पर पहुंच जाता था। अपना परिचय देता था और उसके बाद चुनावी चर्चा शुरू। बातचीत के दौरान ही उनका वोटर लिस्ट में नाम देख लेता और फिर पर्ची बना देता। कभी-कभी किसी का नाम तलाशने
के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। यह सब मैं इस उम्मीद के साथ कर रहा था कि कम से कम हर घर में हमारा नाम व चुनाव चिह्न पहुंच जाएगा। इसमें वोट से संबंधित सूचना भी है। इस कारण लोग उसे संभाल कर भी रखेंगे। यह सिलसिला मतदान के एक दिन पहले यानी 19 दिसंबर तक चलता रहा। हमारी इस पहल की लोग सराहना भी कर रहे थे और इसे जागरूकता के लिए एक सार्थक अभियान भी मान रहे थे।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा





