वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (सोलह) : खेत-खलिहान, आरी-पगारी बांटता रहा पर्ची

एक-एक वोटर तक पहुंच जाने की थी लालसा। इसके लिए खेत-खलिहान, आरी-पगारी जा-जाकर लोगों तक पर्चा पहुंचाता रहा। कोई खेत का मालिक था तो कोई बनिहार। मेरे लिए हर वोट का मान बराबर था। इसलिए हर सीमा से परे वोटर तक पहुंचने की कोशिश करता रहा। दो गोतिया के बीच का मनमुटाव को भी पाटना पड़ रहा था तो दो जातियों के भेदभाव को नकारना पड़ रहा था। समाजवाद का जातिविहीन समाज और भाजपा का समरस समाज की अवधारणा गांवों की गलियों में नकारा साबित हो रही थी। जातियां थीं तो जातियों का आग्रह भी था। इन आग्रह-पूर्वाग्रह के बीच हर हाथ में पर्चा बांटता फिर रहा था।

खरांटी से रामलगन बिगहा की दूरी करीब दो किलोमीटर होगी। छउर से जाने का रास्ता था। कुछ दूर खरौंजा किया हुआ था। बाकी मिट्टी की खाइनुमा सड़क थी। रास्ते से माथे पर धान का बोझा लिए आते-जाते महिला-पुरुष। धान की बाली की खनखनाहट। कहीं खेतों में खड़ी धान की फसल तो कहीं धान कटने के बाद खाली पड़े खेत। अभी गेहूं की बुआई का काम शुरू नहीं हुआ था। खरांटी से रामलगन बिगहा जाने के दौरान एक नाली के पुल पर बैठे मिले पांडेय जी। खेत में कटनी लगी थी। वे निगरानी के लिए बैठे हुए थे। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। नाम, पिता का नाम, वार्ड, परिवार के सदस्य के संबंध में जानकारी लेने के बाद वोटर लिस्ट में उनका नाम खोजा और परिवार के सभी सदस्यों के नाम का पर्चा काट दिया। मैंने उनके वोट के लिए अपना तर्क दिया। भूमिहारों का अपना कोई उम्मीदवार है नहीं। वोट देना ही है तो हमें अपना बहुमूल्य वोट दीजिए। उनसे विदा लेकर आगे बढ़ा।

सड़क के किनारे बने गड्ढे में पानी जमा था। कुराईपुर के बच्चे उसमें मछली मार रहे थे। उसमें से एक बच्चे को बुलाया। गांव-घर, परिवार, शिक्षा के बारे में जानकारी ली। उससे बताया कि मैं यहां मुखिया का उम्मीदवार हूं। यह लो हमारा पर्चा, अपने पिताजी को दे देना। कल हम तुम्हारे घर पर आएंगे। आगे बढ़ने पर एक युवक मिला। साइकिल पर खाद का बोरा लेकर आ रहा था। उससे बातचीत की। उसे भी पर्चा दिया तो उसने कहा कि वह इस पंचायत का रहने वाला नहीं है। उसका गांव गिरा है और रतनपुर पंचायत में पड़ता है। गांव की राजनीतिक सीमा से वहां के सामान्य जनजीवन का कोई संबंध नहीं था। पंचायत गठन के लिए किसी चार या पांच गांवों का चयन भले कर लिया गया हो, लेकिन वहां की अर्थव्यवस्था, कारोबार, खेती-बारी, शिक्षा, मजदूरों और मालिकों के संबंधों को पंचायत की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। रतनपुर, बभनडीहा, ओबरा आदि पंचायतों की अर्थव्यवस्था, कारोबार, शिक्षा की रीढ़ ओबरा से जुड़ा था। मालिक इस पंचायत का तो मजदूर उस पंचायत का हो सकता है।

खरांटी से रामलगन बिगहा पहुंचने तक कई लोगों से मुलाकात हुई। बातचीत का केंद्र बिंदु चुनाव ही रहा। अब तक सूरज सिर पर चढ़ चुका था। परछाई भी बौनी होने लगी थी। लेकिन भूख बढ़ती जा रही थी। यहां होटल भी नहीं था। गांव की महिलाएं धान काटकर दोपहर में खाना खाने के लिए जुटी थीं। मैंने बैठते ही कहा कि आप लोग ही खाइएगा कि हमको भी खिलाइएगा। इस बीच मैंने सबका नाम लिखकर पर पर्ची काट रहा था। उनसे बातचीत भी हो रही थी। वहां छोटे-छोटे बच्चे भी जमा हो गए। सभी अपने माता-पिता की तस्वीर पहचान कर उनका पर्ची कटवा रहे थे। इस बीच एक महिला एक लोटा में पानी लेकर आयीं और खाने के लिए अपने साथ आंगन में ले गई। खाने में सब्जी और भात था। इस दौरान उनसे स्थानीय बोली मगही में ही बातचीत होती रही। गांव-घर के रिश्तेदारों पर भी चर्चा हुई।

वहां से लौटा और कुराईपुर के रास्ते में चल पड़ा। बीच में एक बिगहा था। इसी बिगहा के रहने वाले हैं दुखन राम। इस बिगहा में कई घर चमारों का है। दुखन राम उन्हीं में से एक थे। वह माले के कैडर और उम्मीदवार भी थे। उनके घर के पास ही एक ओटा पर बैठा। पानी की मांग की। वहां भी लोगों से नाम पूछ कर पर्चा बनाने लगा। वहां एक महिला मिलीं। वह दुखन राम के परिवार की सदस्य थीं। उन्होंने कहा कि हम भी पर्चा ही बांट रहे हैं। उनसे ही पानी मांगा। उन्हें ओबरा जाना था। दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता बदल गया। वह पगडंडी से ओबरा की ओर चलीं और मैं छउर से कुराईपुर की ओर। इस दौरान रास्ते में कई लोग मिले और उनसे बातचीत की। उनका भी पर्चा काटा और वोट देने का आग्रह कर आगे बढ़ता रहा।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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