वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (उन्नीस) : पुनपुन की धारा से मिलती थी ऊर्जा

ओबरा और कुराईपुर को बांटने वाली पुनपुन नदी करीब तीन किलो मीटर तक बभनडीहा पंचायत पड़ती है। ओबरा गर्ल्स हाई स्कूल के पास से नदी को पार कर कुराईपुर जाया जा सकता है और ओबरा हाई स्कूल के पास नदी पार कर खरांटी जाया जा सकता है। हालांकि एनएच 98 पर पुनपुन पर बना पुल भी ओबरा और खरांटी को जोड़ता है। ओबरा थाने के सामने बने घाट से कुराईपुर जाया जा सकता है। लेकिन वहां नदी अधिक गहरी होने के कारण पैदल पार करने में परेशानी होती है। इस कारण गर्ल्स हाई स्कूल और ओबरा हाईस्कूल के पास ही नदी लंघान है और अधिकतर आवागमन इन्हीं दो घाटों से होता था।

मैं भी अक्सर ओबरा से कुराईपुर जाने के लिए गर्ल्स हाईस्कूल घाट का इस्तेमाल करता था। एनएच 98 से नदी के घाट तक खरौंजा बिछा हुआ था। सड़क के दोनों ओर दुकानें लगी हुई हैं। यहीं पर एक और गर्ल्स स्कूल है। इस सड़क पर सुबह से देर रात के आवागमन बना रहता है। नदी की धारा तेज है। ठेहुना भर पानी सामान्य दिनों में रहता है। कहीं-कहीं ठेहुना से पानी ऊपर भी चला जाता है। घाटों पर गंदगी गंभीर समस्या है। लेकिन नदी की धारा को स्पर्श करते ही समस्याएं एक किनारे हो जाती हैं। नदी पर कभी चचरी पुल बनाया गया था, पर अधिक दिनों तक नहीं चला। इसके बाद दुबारा चचरी का पुल नहीं बना। चुनाव के समय एक उम्मीदवार ने अस्थायी पुल बनवाने की घोषणा की, लेकिन वह घोषणा से आगे नहीं बढ़ पाया।

पुनपुन की धारा मेरी थकान को अपने साथ बहा ले जाती थी। नदी के इस किनारे से उस किनारे तक पहुंचते-पहुंचते धारा में करीब तीस-पैंतीस डेंग पड़ते होंगे। धारा मेरे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार करती थी। हताश-निराशा के दौर नदी की धारा के साथ बह जाते थे। उम्मीद की एक नयी किरण दिखाई देने लगती थी। धारा यह भी बताती थी कि प्रवाह, निरंतरता यही जीवन की गति है। आशा-निराशा, हार-जीत धारा के साथ चलने वाली प्रकृति के अवदान है, जिन्हें चाहे-अनचाहे हमें ढोना पड़ता है, भोगना पड़ा है।

चुनाव के दौरान इस बात की खूब चर्चा होती थी कि नदी में कई लोग शराब के नशे में पड़े रहते हैं। बताया जाता है कि एक उम्मीदवार ने अपने समर्थकों के लिए पॉलीथीन (देसी शराब का पाउच) फ्री कर दी थी। जितना पीना है पीजिए, वोट जरूर दीजिए। पीने वालों की भी कमी नहीं थी। कुछ लोग पीकर शांतिपूर्ण घर पहुंच जाते थे, जबकि कुछ लोग इतना चढ़ा लेते थे कि स्वयं पटरी से उतर जाते थे और उम्मीदवार की जीत के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिखता था। प्रचार के दौरान ही एक ग्रामीण ने इस उम्मीदवार की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने पॉलीथीन फ्री कर दी है। पूरा गांव उनके पक्ष में है।

मैंने बीच में बात काटते हुए कहा कि आप अब तक कितना पी चुके हैं। उन्हें इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम नहीं पीते हैं। कई लोग पीकर शाम को घर लौटते हैं और कुछ लोग तो नदी में ही लोटने लगते हैं। फिर मैंने उन्हें कहा कि तो आप लोग उन्हीं को वोट दीजिएगा। वोट के लिए हम न तो पैसा देंगे और न दारू। मेरा तेवर देखने के बाद वह वहां से खीसक लिए। मैं अगले दरवाजे पर बढ़ लिया।

एक विकलांग हैं कृष्णा पासवान जी। उनकी भी अपनी समस्या थी। मैंने कहा कि आज आपके यहां ही पानी पीएंगे। वह अपने दरवाजे पर ले गए। घर सड़क किनारे ही है। दरवाजे के बगल में ओटा बना हुआ है। उसी पर उन्होंने बोरा बिछाने की कोशिश की। मैंने उनके हाथ से बोरा लेकर ओटा पर बिछाया। इसके बाद उनको भी बैठाया और खुद बैठ गया। इस बीच उन्होंने बच्चों से कह कर दुकान से दालमोट मंगवाया। हम ने थोड़ा सा दालमोट लेकर पानी पीया। उनके भतीजे छोटे-छोटे थे। उन बच्चों से मैंने बातचीत की। नाम पूछा। पढ़ाई के बारे में जानकारी ली। कृष्णा पासवान से बातचीत करने के बाद यह विश्वास हो गया कि निश्चित ही पुनपुना की धारा में एक शक्ति है, जो जीवन के प्रति, जीवन को लेकर लोगों में ऊर्जा का संचार करती हैं और जीवन संघर्ष की प्रेरणा भी लेती हैं।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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