वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (बाइस) : उम्मीदवार चाहिए जीतने वाला

चुनाव लड़ने वाले जाति, धर्म, गांव, समाज और परिवार के भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद पाले रहते हैं। लेकिन वोटर को इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं है। उन्हें चाहिए जीतने वाला उम्मीदवार। जाति या गांव के भरोसे उम्मीदवार जीत का दावा भले ठोकते हों, पर जीतना सिर्फ इन्हीं पर निर्भर नहीं करता है। इसके लिए जाति के बाहर, गांव के बाहर और धर्म के बाहर भी वोट की संभावना तलाशनी पड़ती है।

किसी भी फैक्टर पर पूर्णत: न तो विश्वास कर सकते हैं और पूर्णत: अविश्वास कर सकते हैं। विश्वास और अविश्वास की रेखा को समझना, उसके चरित्र को समझना और दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ा ही दुरुह कार्य है। कोई भी वोटर किसी उम्मीदवार को यह नहीं कहता है कि हम आपको ही वोट देंगे या नहीं देंगे। किसी के दरवाजे पर गए तो नाश्‍ता-पानी, बैठने के लिए कुर्सी, खाना के लिए भोजन सब कुछ मिल सकता है। लेकिन जिस वोट के लिए हम गली-गली घुमते-फिरते हैं, उसका पक्का भरोसा कहीं से नहीं मिलता है। संभवत: इसी को दृष्टिभ्रम कहते होंगे। दिखता सब कुछ है, लेकिन होता कुछ भी नहीं है। वोट की उम्मीद नजर आती है, लेकिन वोट होता नहीं है।

एक कहानी पढ़ी थी। शीर्षक था हार। कहानी के अनुसार, एक महिला राजनीतिक पार्टी की कार्यकर्ता थी। उसका पति दूसरी पार्टी का उम्मीदवार था। महिला ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के लिए दिन-रात एक कर दिया। यहां तक कि गहने भी चंदा में दे दिए। बेचारा उसका पति सब कुछ देखता रहा। आखिर दोनों दो पार्टियों से जुड़े थे। लेकिन वोट की शायद यही नियति है कि जब बैलेट पेपर हाथ में आता है तो अपना हित सर्वोपरि नजर आता है। उस महिला के साथ भी यही हुआ। अपने पति के खिलाफ पूरा चुनाव अभियान चलाती रही, लेकिन वोट अपने पति को ही देकर चली आई। यही हाल सभी वोटरों का है। अंतिम समय में वह अपना हित सर्वोपरि देखता है और उसे ही वोट डाल आता है। वह हित का गांव का भी हो सकता है, जाति का भी हो सकता है, धर्म का भी हो सकता है और प्रलोभन का भी हो सकता है।

चुनाव अभियान के दौरान हमारी उम्मीदवारी से वोटरों का कोई हित नहीं सध रहा था। न मैं गांव का था, न उनको कोई प्रलोभन दे सकता था। जहां तक जाति की बात है तो संभवत: मैं वोटरों की नजर में जीतने वाले उम्मीदवारों में शामिल नहीं था। जनसंपर्क के दौरान यह बात उभर कर सामने आने लगी थी कि वोटरों को जीतने वाला उम्मीदवार चाहिए। लेकिन कौन जीतेगा, इसका परिदृश्य साफ नहीं हो रहा था। जातीय गोलबंदी से लेकर दारू की गिरोह बंदी तक हो रही थी। सूरज ढलने के बाद मैं अपने आशियाने की ओर लौटने लगता था तो कई उम्मीदवार की सक्रियता भी उसी समय तेज हो जाती थी। रात के अंधेरे और लालटेन या दीया की रौशनी में उनका प्रचार होता था। कोई पैसा पहुंचाता था तो कोई दारू का पाउच। पूर्णाडीह में एक उम्मीदवार ने कुछ पैसे भेजवा दिये। पैसे के बंटवारे को लेकर लोग दो गुट में हो गए। हालत यह हो गयी कि न तो पैसे वापस मिलने वाले थे और न उसके बदले वोट मिलने का पूरा भरोसा रह गया था।

खरांटी में एक हैं ललन तिवारी। स्थानीय राजनीति में उनकी दखल मानी जाती थी। लगभग सभी उम्मीदवार उनके दरवाजे पर वोट की गुहार लगा आए थे। मैं उनके पास दूसरी बार गया था। प्रचार का अंतिम चरण था। उन्होंने कहा कि सभी उम्मीदवार हमारे पास आए हैं। सबका अपना-अपना दावा है। सभी वोट भी मांग रहे हैं। लेकिन टक्कर दोनों मुसलमानों सादिक खान और जफर अंजूम के बीच ही है। तीसरे स्थान पर अजित सिन्हा ही रहेगा। इससे आगे उनकी संभावना को जानने की मेरी रुचि नहीं बची थी। वहीं मिल गए कृष्णा दुबे। अखबार बांटने का काम करते हैं। एक दिन पहले उनके घर पर उनकी पत्नी से मिलकर वोट मांग आया था। उस समय वह भी पहुंच गए थे। हमने अपने दावे को उनके समक्ष पेश किया।

लोगों से बातचीत करते-करते उनके मनोभावनाओं को समझने में आसानी होने लगी थी। इसके बाद भी उसके पास बैठना, उनकी रुचि को जानना और जीत का अपना दावा पेश करने का सिलसिला अंतिम समय तक जारी रहा। हम जीतने वाले उम्मीदवार नहीं थे, यह लोगों के चेहरे पर आया भाव बता देता था, लेकिन मुलाकात के दौरान लोगों को यह जरूर भरोसा दिला देते थे कि चुनाव में हार-जीत से बड़ी एक चीज है। वह है आपका आत्मविश्वास, जो अंतिम समय तक जीतने की उम्मीद आपके अंदर जीवित रखता है और जोखिम को आनंद में बदल देता है।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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