वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (सताईस) : मतदान की पूर्व संध्या और लिट्टी-चोखा का आनंद

चुनाव के लिए मतदान की पूर्व संध्या महत्वपूर्ण होती है। इसके लिए उम्मीदवार पूरी तैयारी कर लेते हैं। धनबल से लेकर बाहुबल तक। कोई किसी से कम नहीं। वोटरों को जोड़ने-फोड़ने-तोड़ने से लेकर खरीदने तक सभी कर्म-कुकर्म इसी रात को होते हैं। क्योंकि अगली सुबह का एक-एक पल महत्वपूर्ण होता है। एक-एक वोट का समीकरण से लेकर कीमत तक निर्धारित होती है। जीत का सपना पाल रहे उम्मीदवारों के लिए इसी रात का इंतजार होता है। वोटर की चुप्पी तो मतगणना के दिन ही टूटती है। लेकिन चुप्पी को बेसकीमती समझने वाला वोटर वसूली का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता है।

खानों में बंटे वोटर वसूली की मर्यादा तय कर लेते हैं। यादव, मुसलमान व पासवान को छोड़ दें तो अन्य उम्मीदवारों की जाति कोई मायने नहीं रखती थी। हर उम्मीदवार अपनी सीमाओं में अधिकतम कीमत चुकाने को तैयार था। कोई गांव के रूप में कीमत चुका रहा था तो कोई जाति के रूप में। यही वजह थी कि हर उम्मीदवार को अपने ही गांव व टोले में वोट मिले। अपना न टोला था, न गांव। जाति का भी भरोसा नहीं था। इस कारण निश्चिंत थे।

19 दिसंबर, 12 को दिनभर इस गांव से उस गांव जनसंपर्क करता रहा। जनता के आश्वासन का पुलिंदा कंधे पर रख कर थका-हारा शाम को घर की ओर चला। चुनाव क्षेत्र से करीब 6 किमी दूर। बस में सवार हुआ। बस अपनी गति से चली जा रही थी। बस वाले ने न किराया मांगा और न मैंने दिया। चुनाव के समीकरण को लेकर मंथन चल रहा था। इस बीच में मैंने पत्नी संजू को फोन लगाया और कहा कि आज लिट्टी-चोखा बनाना। बस चली जा रही थी। स्टॉप आया जिनोरिया। बस वाले ने आवाज लगाई। मेरा ध्यान टूटा। बस से उतरा। बस आगे बढ़ गयी। आसमान में अंधेरा छा चुका था। ठंड अपने वेग में थी। उससे बचने की कोशिश कर रहा था। पैदल ही चलते-चलते घर पहुंचा। बच्चे सो चुके थे। पत्नी इंतजार कर रही थी। लिट्टी अभी आग में पक ही रही थी। चोखा बन गया था।

हाथ-पैर धोकर रजाई में घुसा। थोड़ी देर बाद पत्नी थाली में लिट्टी-चोखा लेकर आयी। कटोरी में घी भी था। गरम घी की सुगंध में थकान धूमिल हो गई थी। घी की सुगंध ने बचपन को सामने लाकर खड़ा कर दिया। घर में कुछ भैंस रहती थी। दूध बैठता था। गोइठा की धीमी आंच में घंटों दूध उबलता था। सफेद रंग का दूध लाल हो जाता था। उस दूध का बना दही एकदम लाल। खाने का स्वाद ही निराला। दही को मथ कर निकाला गया मक्खन और उससे बना घी। दादी सप्ताह में एक या दो बार मक्खन को आंच पर चढ़ाती थी। जिस दिन मक्खन को करकराया जाता था, उस दिन पूरे घर का माहौल सौंधा हो जाता था। कड़ाही से घी को बर्तन में डालने के बाद खाली कड़ाही भी चाटने का मौका मिल जाता था। उस दिन घी की वही सुगंध याद आ गयी थी।

चुनाव की पूर्व संध्या पर जनसंपर्क की हड़बड़ी नहीं थी। अगली सुबह जनता को जहां वोट देना है, देगी। बस, जमकर खाओ और रजाई ओढ़कर आराम करो। यही एक काम बच गया था। लिट्टियों को तोड़कर उन्हें घी में डुबोया। लिट्टी भी गरम थी और घी भी। पत्नी की उपस्थिति माहौल को और रोमांटिक बना रही थी। एक-एक कर कई लिट्टियों का भोग लगा चुका था। करीब 20 दिनों तक लगातार जनसंपर्क, उलाहना, अपेक्षा, विश्वास के साथ जीत जाने की कोशिश पर अब विराम लग चुका था। हमारा हर प्रयास आज पूर्णता पर था। एक-एक वोट के लिए पल-पल की पहल की परिणति अगली सुबह होने वाली थी। प्रयास हमारे वश में था, परिणाम तो जनता को तय करना था।

जनता की अदालत में 20 दिनों तक घूम-घूम कर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी, वोट मांगा था। इससे ज्यादा मैं कुछ करने की स्थिति में नहीं था। अगली सुबह जल्दी उठकर मतदान केंद्रों का जायजा लेना था। इसकी हड़बड़ी थी। लिट्टी भी अपना असर दिखाने लगी थी। पत्नी बर्तन लेकर कमरे से बाहर निकली और मैं रजाई में समा गया।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

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