वीरेन डंगवाल का नया पता- इंदिरापुरम, गाजियाबाद (दो नई कविताएं और डायरी के कुछ अधूरे पन्ने)

मशहूर कवि, पत्रकार और शिक्षक डा. वीरेन डंगवाल का नया पता गाजियाबाद स्थित इंदिरापुरम है. यहां के अहिंसा खंड में स्थित जयपुरिया सनराइज ग्रीन अपार्टमेंट स्थित अपने छोटे बेटे प्रफुल्ल के घर पर रह रहे हैं. इसके पहले वे दिल्ली के दूसरे छोर पर स्थित तीमारपुर में अपने बड़े बेटे प्रशांत के यहां रहा करते थे. जीवन का ज्यादातर समय बरेली में गुजारने वाले वीरेन डंगवाल डेढ़ साल से कैंसर की चपेट में होने के कारण लगातार दिल्ली रहने को मजबूर हैं. कैंसर के इलाज के लिए उन्हें गुड़गांव जाना पड़ता है.

रेडियोथिरेपी, कीमियोथिरेपी, आपरेशन्स आदि के कई-कई दौर गुजरने के बाद भी अभी इन इलाजों से मुक्ति नहीं मिली है. इसका नतीजा यह हुआ है कि वीरेन डंगवाल का पूरा शरीर बेहद कमजोर, जर्जर और बदहाल हो गया है. वजन 45 किलो रह गया है. कोई लंबे समय बाद उन्हें देखे तो पहचान न सके.

पिछले दिनों जब एक सेमिनार में शिरकत करने के वास्ते चंदौली में था वीरेन दा का एक मैसेज आया, नए पते को लेकर. दिल्ली लौटने के अगले रोज इंदिरापुरम चल पड़ा, मित्र राजीव का साथ लेकर. आठवें माले पर स्थित आवास में पहुंचा तो प्रफुल्ल ने वीरेन दा के बारे में बताया कि वे आज कीमियोथिरेपी से लौटे हैं, सो रहे हैं. मैंने प्रफुल्ल से कहा कि दादा को न जगाएं. भाभी जी कोने में बैठी हुईं धीरे धीरे आवाज में मोबाइल पर किसी से बात कर रहीं थीं, मैंने जाकर चरण स्पर्श किया.

थोड़ी ही देर में वीरेन दा की नींद उचट गई, जैसे उन्हें आहट हो गई हो कि कोई उनसे मिलने आया है. प्रफुल्ल ने उन्हें बताया- यशवंत आए हैं. वीरेन दा ने वहीं से पुरानी चिरपरिचित शैली में हांक लगाए- आ जाओ बेटे… जस्सू…!.  अंदर उनके कमरे में गए तो वीरेन दा को देखकर हतप्रभ रह गया. इतना दुबला और इतना कमजोर उन्हें मैंने कभी नहीं देखा था. मन ही मन सोचने लगा, कब होगा इस इलाज का अंत जो लगातार इन्हें कमजोर बनाता जा रहा है.

वीरेन दा इस बेहद बुरी स्थिति में भी अपनी वही पुरानी स्टाइल और वही पुराना प्रेम भरा व्यक्तित्व सामने रखे हुए थे लेकिन मेरा मन दुखी हो चुका था. वीरेन दा ने कई बातें, चर्चाएं शुरू कीं. अपनी दो नई कविताओं के बारे में बताया जिसे संजय जोशी ले गए हैं. कुछ अन्य कविताएं भी संजय ले गए हैं. अपल के बारे में बाते जिन्होंने कभी उनकी एक तस्वीर ली थी और उसे मढाकर भिजवाया. मैं उठकर उस मढ़ी हुई तस्वीर को देखा. तस्वीर में जो वीरेन दा दिख रहे हैं और अभी जो वर्तमान में वीरेन दा हो गए हैं, दोनों में बहुत फर्क या यूं कहें कि जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है. जीते जी खुद की ही तस्वीर यादों सरीखी लगने लगे, इसे अच्छी बात मानूं या बुरी बात कहूं, मैं तय नहीं कर पा रहा था.

वीरेन दा ने डायरी दिखाई. वो आजकल डायरी लिखने लगे हैं. मैंने डायरी के कुछ पन्नों की तस्वीरें लीं. उन्होंने खुद की तस्वीर न लेने का अनुरोध किया. मैंने तुरत कहा, दादा अब इस हालत में आपकी तस्वीर बिलकुल न लूंगा. असल में मेरी एक खराब आदत है कि जब भी किसी से मिलने जाता हूं, जिससे प्रेम है, तो उसकी तस्वीर लेने लगता हूं. जब अस्पताल में वीरेन दा भर्ती थे तो उस वक्त भी उनकी तस्वीर ली थी.

डायरी के पन्नों को वीरेन दा पढ़ने को कहने लगे. मैं पढ़ता गया. सोचता रहा और कहा भी कि आप डायरी खूब लिखिए, डबल फायदे हैं, खुद को एक्सप्रेस कर सकेंगे, इस मनःस्थिति की अभिव्यक्त कर पाएंगे, हम जैसों के लिए एक अदभुत पठनीय किताब बना देंगे. जब वीरेन दा सामने हों तो उनके लिखे को क्या पढ़ना, उनको जब सशरीर सामने देख रहा हूं तो उस वक्त को पढ़ने में क्या लगाना. उन्होंने हम लोगों को पत्रकारिता के साथ साथ लिखना, जीना, सोचना सिखाया है. विकट से विकट स्थितियों में भी मनुष्य बने रहना सिखाया है. उन्होंने मेरी ढेर सारी कापियां, गल्तियां दुरुस्त की हैं. मेरे कई गुरुओं में से वो एक हैं. उनका प्रेम खांचे में नहीं रहता. आपको अगर वो प्रेम करते हैं तो आपको हर हाल में वो प्रेम करेंगे. आपको प्रेम में ही बदल देंगे, जीना सिखा देंगे, ज़िंदगी के मायने बता देंगे और इस तरह आप खुद ब खुद बिना कहे, बिना निर्देशित हुए अपने आपको गलत से सही की तरफ शिफ्ट कर लेंगे.

वीरेन दा ने पढ़ना नहीं छोड़ा है. वे आजकल प्रेम राणा की नई आई और पहली किताब 'माफ करना हे पिता' पढ़ रहे हैं. मैंने जब कहा कि मुझे दे दीजिए पढ़ने के लिए तो वो बोले- अभी तीन चार रोज लगेंगे खत्म करने में, तब ले जाना. मैं एक किताब लेकर गया था वीरेन दा को देने के लिए. उन्हें बताया और दे दिया. तय हुआ कि अगली बार जब आउंगा तो किताब ले जाउंगा. प्रेम राणा के बारे में वीरेन दा बताने लगे. कैसे इस अदभुत और आत्मस्वामिभानी नौजवान को अमर उजाला में कालम लिखने के लिए राजी कर पाया था. प्रेम राणा के लेखन की भूरि भूरि तारीफ की उन्होंने. मेरे मन में किताब को लेकर उत्सुकता बढ़ गई. उन्होंने बताया कि अभी कुछ ही रोज पहले किताब की पहली प्रति आई है. मैं सोचता रहा कि इस हाल में भी कोई  नई किताबों और नए लेखकों के बारे में इतनी शिद्दत से कैसे सोच सकता है और बातें कर सकता है. जरूर उनके भीतर कुछ अनोखा है, जिसकी परीक्षा ली जा रही है, देखें कब कौन टूटता है, कब कौन हारता है. अभी तक की परीक्षा में वीरेन दा ने हर विकट मुश्किल को परास्त किया है. पर यह परीक्षा कब तक चलेगी, और क्यों इंतनी लंबी चली है ये परीक्षा… सोचता रहा बैठकर. चाय सुड़कते हुए. बीच बीच में वीरेन दा के चेहरे को गौर से देखते हुए. 

पिछले पांच अगस्त को वीरेन दा के जन्मदिन पर एक आयोजन हम लोगों ने किया था. तब वे बीमारी के चक्रव्यूह के मुहाने पर थे. इस साल पांच अगस्त तक के लिए हम लोग मान चले थे कि वे इस चक्रव्यूह को तोड़कर सोल्लास बाहर आएंगे और हम सब मिलकर विजय के ठहाके लगाते, जिजीविषा की जीत के जश्न पर जोरदार हंसी उछालते हुए फिर से पुराने क्रांतिकारी, साहित्यिक, पत्रकारीय दिनों की तरफ लौट चलेंगे. वीरेन दा अब भी तैयार हैं, उम्मीद से लबरेज हैं. कहते हैं कि अभी पांच अगस्त में तो बहुत वक्त है. देखना खा खा कर इत्ता मोटा हो जाउंगा और इत्ता फिट हो जाउंगा कि पहले जैसा हो जाउंगा..

वीरेन दा अपने हलके से टेढ़े हुए मुंह को बार-बार संभालने की कोशिश करते हैं. कीमियोथिरेपी के कारण कफ, खांसी के वार को संभालने की कोशिश में लगे रहते हैं. हम लोगों से बातचीत में कोई संवादहीनता नहीं आने देते हैं. चाय पिलाने के लिए उतावले हो जाते हैं. भाभी जी और बच्चों की तारीफ करते रहते हैं कि इन लोगों ने कितना उनके लिए किया है. मैं भी कुछ न कुछ कहते बोलते हुए उन्हें थोड़ा ढांढस, थोड़ी उम्मीद देने की कोशिश करता रहा लेकिन अपने गुरु को क्या समझाऊं जो खुद सब समझते जानते हैं. आठवें फ्लोर की उनकी खिड़की से गाजियाबाद, नोएडा, दिल्ली का कंकरीट का शहर दिखता है. वे जाने किस बात पर कह पड़ते हैं कि इसी आठ मंजिला से कूद जाऊंगा… ये भी कोई जीना है.. मैं यह सुन कांप गया. कैसा वक्त है जब अच्छे लोग को जीने नहीं दिया जाता… अभी हाल में ही एक साथी खुर्शीद आलम ने कई आरोपों से खिन्न होकर कूद कर जान दे दी थी. अब बीमारी से परेशान वीरेन दा ऐसी बातें कर रहे हैं… उफ्फ… मैं भी क्या क्या सोचा करता हूं.. मैंने अपना सिर झटक दिया.. जाने क्या क्या समझाने की कोशिश करने लगा वीरेन दा को… वीरेन दा भी गंभीरता भांपकर हंसने मुस्कराने लगे…

मैं वीरेन दा के सामने खुद को हमेशा मूर्ख किस्म का बालक ही मानता रहा हूं. और, सच कहूं तो हूं भी यही. विद्वानों की संगत कभी रास न आई और विद्वान बनने का शौक कभी चर्राया नहीं. सपाट और बेबाक स्वभाव के कारण स्वभाव में अराजकता व दुस्साहस का मिश्रण ज्यादा रहा. जो पसंद आए उन्हें भरपूर पसंद किया. वीरेन दा उन्हीं में से हैं. जितने बेहतरीन मनुष्य हैं, उससे बड़े कवि हैं. उनकी कविताएं न सिर्फ समझ में आती हैं बल्कि भीतर तक धंस जाती हैं, देर तक सम्मोहित करती हैं, सीखने व बदलने को प्रेरित करती हैं. अभी 'कबाड़खाना' ब्लाग पर देखा उनकी वो दो नई कविताएं प्रकाशित हैं जिनका जिक्र वो कल कर रहे थे. उन्हीं दोनों को यहां प्रकाशित करते हुए उनकी डायरे के कुछ पन्नों की तस्वीरें भी दे रहा हूं.. और, एक अनुरोध भी कि आप सभी दुआ करें कि अप्रैल महीने में होने वाली तीन-चार कीमियोथिरेपी के बाद अब कोई कीमियोथिरेपी की जरूरत उन्हें न पड़े और पांच अगस्त तक वह भले चंगे होकर अपने जन्मदिन के जश्न में हम सब के साथ बेहद प्रसन्न मन से शरीक हों.


कविता

-वीरेन डंगवाल-

एक…

पिछले साल मेरी उम्र 65 की थी
तब मैं तकरीबन पचास साल का रहा होऊंगा
इस साल मैं 65 का हूँ
मगर आ गया हूँ गोया 76 के लपेटे में.

ये शरीर की एक और शरारत है.
पर ये दिल, मेरा ये कमबख्त दिल
डाक्टर कहते हैं कि ये फिलहाल सिर्फ पैंतीस फीसद पर काम कर रहा है
मगर ये कूदता है, भागता है, शामी कबाब और आइसक्रीम खाता है
शामिल होता है जुलूसों में धरनों पर बैठता है इन्कलाब जिंदाबाद कहते हुए
या कोई उम्दा कविता पढ़ते हुए अभी भी भर लाता है इन दुर्बल आखों में आंसू
दोस्तों – साथियों मुझे छोड़ना मत कभी
कुछ नहीं तो मैं तुम लोगों को  देखा करूँगा प्यार से
दरी पर सबसे पीछे दीवार से सटकर बैठा.

दो….              

शरणार्थियों की तरह कहीं भी
अपनी पोटली खोलकर खा लेते हैं हम रोटी
हम चले सिवार में दलदल में रेते में गन्ने के धारदार खेतों में चले हम
अपने बच्चों के साथ शरद की भयानक रातों में
उनके कोमल पैर लहूलुहान महीनों चले हम

पैसे देकर भी हमने धक्के खाये  
तमाम अस्पतालों में
हमें चींथा गया छीला गया नोचा गया
सिला गया भूंजा गया झुलसाया गया
तोड़ डाली गईं हमारी हड्डियां
और बताया ये गया कि ये सारी जद्दोजेहद
हमें हिफाजत से रखने की थीं.

हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से
पंजर दबता जाता है उनके बोझे से
मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिए
ओ मेरी मातृभूमि ओ मेरी प्रिया
कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं .
 


वीरेन दा के साथ बैठ कर, उनकी बातें कर मुझे अमर उजाला, कानपुर के वे उजले दिन जरूर याद आते हैं जिसमें उनसे हर पल पत्रकारीय पाठ सीखने के साथ मस्ती, संघर्ष, सपोर्ट, उन्मुक्तता, जीवंतता, मनुष्यता को समझने जीने की भरपूर संभावना हुआ करती थी, और हम लोग अपने अपने रिसीविंग कैपासिटी के हिसाब से इसे ग्रहण करते, समझ पाते, अपनाते थे. आज वीरेन दा मुश्किल में हैं. उनकी सेहत ने उन्हें थका-सा दिया है. तब उनके लिए बहुत सारी दुवाओं की जरूरत है. भरपूर स्नेह और समर्थन की जरूरत है. उम्मीद है हम सब मिलकर उन्हें अपनी सामूहिक प्रार्थनाओं और साझा प्रेम के जरिए स्वस्थ करा पाएंगे.

लेखक यशवंत अमर उजाला, कानपुर में वीरेन डंगवाल के संपादकत्व वाले दिनों में प्रशिक्षु उपसंपादक के रूप में कार्य कर चुके हैं. इन दिनों भड़ास से जुड़े हुए हैं.


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