वो चाहता है कि जी भर कर उससे नफरत करो

: बख्शीश सिंह के लिए ये कविताएं नहीं जिन्दगी की जद्दोजहद और अनुभूतियों के सूक्ष्म अनुभव के आत्मीय वर्णन हैं :
वो तुम्हारी
मुखालफत ही नहीं
बेइंसाफी का भी
हिस्सेदार होना चाहता है

वो चाहता है
जी भर कर उससे
नफरत करो
ताकि तुम
खुद के करीब होकर
नजदीक खिसककर
अपनी उंचाइयों को
गायब होते देख सको।

ये पंक्तियां पढ़कर अंदाज लगा सकते हैं, किस तरह के लोगों के लिए लिखी गई होंगी। कवि महोदय को कम्प्यूटर चलाना नहीं आता। जब भड़ास पढ़ाया तो यशवंत सिंह से इतने प्रभावित हुए कि बजाय कुछ कहने के अपनी यह कविता निकाल कर सामने रख दी। 67 साल के कवि सरदार बख्शीश सिंह ने बीस साल पहले ही अपने मन की तड़प को कागजों पर उड़ेलना शुरू किया है। हिन्दी और पंजाबी में समान रूप से सक्रिय बख्शीश सिंह की अब तक छह हिन्दी और सात पंजाबी काव्य संग्रह और पुस्तकें आ चुकी हैं।

हिन्दी में, ‘दरवाजे गिरवी रखे हैं’, ‘टुकड़ा-टुकड़ा ख्याल’, ‘अपनी-अपनी जमीन पर’, ‘पहला-पहला दुख’, ‘अधखुले दरीचों से’, ‘बाबा फरीद’, और पंजाबी में ‘दस्तक’, ‘बदला ते लिखी इबारत’, ‘रुदाद’, ‘सुपनांतरु’, ‘आवर्दा’ हैं। पिछले एकाध सालों से उन्होंने सूफी साहित्य पर काम शुरू किया है। गुरू ग्रंथ साहिब में समाहित संतों की मूल वाणियों का हिन्दी मे लिपियांतर, उनका अर्थ और भावार्थ को पुस्तक रूप दे रहे हैं। इस प्रयास के तहत अब तक ‘बाबा फरीद, प्रकाशित हो चुकी है। ’भक्त रविदास‘ और ’बुल्ले शाह‘ प्रकाशन की तैयारी में है।

ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, नई दिल्ली और पंजाबी साहित्य अकादमी, पटियाला के आजीवन सदस्य बख्शीश सिंह वर्ल्ड सिक्ख कन्वेंशन, सर्वभाषा कवि सम्मेलन और ‘गुरु ग्रंथ एंड इट्स कॉन्टेक्स्ट’ विषय पर आयोजित इंटरनेशनल सेमिनार

बख्शीश सिंह
में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं। बख्शीश सिंह साहित्य में दिमाग के साथ खेलों में भी हाथ आजमा चुके हैं। आगरा विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट में भाग ले चुके हैं। खड़गपुर में नेशनल फुटबॉल चैम्पियनशिप में साउथ ईस्टर्न रेलवे का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, जहां मोहन बागान, मोहम्डन स्पोर्टिंग, जेसीटी फगवाड़ा, ईस्ट बंगाल जैसी टीमों ने भी भाग लिया था। लखनऊ के शीशमहल क्रिकेट टूर्नामेंट में रेलवे का प्रतिनिधित्व करने के अलावा अजमेर में उन्होंने पंद्रह साल तक मुश्ताक अहमद रेलवे टूर्नामेंट आयोजित किया। 1997 में वे रेलवे स्पोटर्स क्लब के सचिव के नाते अजमेर में पहला और अब तक आखिरी भी डे-नाईट क्रिकेट टूर्नामेंट का सफल आयोजन कर चुके हैं। उम्र का दबाव बढ़ा तो रेलवे की नौकरी के साथ खेल भी पीछे छूट गए और उन्होंने कलम थाम ली।

किसी भी सच्चे सिक्ख की तरह उनके लिए भी यह गौरव हैं कि ’भक्त नामदेव‘, को शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर की धरम प्रचार कमेटी ने प्रकाशित करने का प्रस्ताव प्रारंभिक तौर पर स्वीकार कर लिया है। कमेटी की बैठक में इस पर अंतिम मुहर लगना बाकी है। बख्शीश सिंह की कविताओं में जिन्दगी की जद्दोजहद और अनुभूतियों के सूक्ष्म अनुभव के आत्मीय वर्णन मिलते हैं। कविताओं में मितव्ययता के साथ भावनाओं का सूक्ष्म उद्गार रहता है। शायद यही वजह है कि उन्हें ढेर सारे बिंबों और बड़े-बडे़ कथनों और वाक्यों की जरूरत नहीं पड़ती।

अब
नई बुनियाद
रखनी होगी
अपने आकाश की
एक तो वह
रंग बदलने लगा है
दूसरा
उसकी जमीन
उस कागज की
तरह है
जिसके चारों तरफ
हाशिये हैं।

बकौल बख्शीश सिंह, अनुभूति क्षणांश मे ही कविता के दर्शन मिल जाते हैं। यही कारण है कि उनकी छोटी-छोटी कविताएं भी उसी तरह बड़ी बात कह जाती हैं, जिस तरह सूफी संतों की वाणी अपना प्रभाव छोड़ती हैं।

उस दिन की
तलाश में हूं
जिसका सातों दिन से
कोई नाता न हो
जिसकी न सुबह हो
न दोपहर
न शाम हो
हां रोशनी हो ऐसी
जिसकी आब में
अनदेखा
प्रकट हो जाए

और एक कविता देखिए

वो मासूम और सच्चा था
उसकी सच्चाई का रंग
झूठ के झोंकों ने
स्याह कर दिया
उसके पास खुद को
ढांपने के लिए
कोई पर्दा न था
न मोटा न झीना
हां एक पर्दा था
मासूमियत का
वह भी उस हवा ने
तार-तार कर दिया।

कविताओं में पंजाब के लोक जीवन का अच्छा असर दिखाई देता है। भाशा की रवानगी में जन्म स्थली बलुचिस्तान से कर्मस्थली अमृतसर-जालंधर तक के जनजीवन की धड़कन धड़कती महसूस होती है।

वह
इतिहास के छान-बीन की
बात करता रहा
उन लोगों के बीच
जिनकी जिंदगी थी
छांव में उगी
घास की तरह
बातों के भावार्थ
करते-करते
अचानक गिर पड़ा
जब चेतना लौटी
खुद को
ऐसे लोगों में पाया
जिनकी आत्माएं
अफीम घुले पानी की
तरह थीं।

फिल्म ‘रॉक स्टार’ में रहमान ने एक गीत गाया है, ‘नादां परिंदे घर आ जा।’ इसकी एक कड़ी है, ‘अगर कदर मोरी, इतनी अरज तोसे, चुन चुन खइयो मांस, खइयो ना तू नैना मोरे पिया के मिलन की आस।’ बख्शीश सिंह बताते हैं कि असल में यह बाबा फरीद की वाणी है। इसके उदाहरण से वे संतों की मूल वाणी के हिन्दी मे लिपियांतर, उनका अर्थ और भावार्थ प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। उनकी पुस्तक ‘बाबा फरीद’ में इसी वाणी को देखिए –

कागा करंग ढढोलिआ सगला खाई आ मास।
ऐ दुइि नैना मति छुहअ पिर देखन की आस।।

(कागा-कौए, करंग-पिंजर, ढढोलिआ-नौंच लिया, सगला-सारा, ऐ-यह, दुइि-दोनों, नैना-नैत्र)

अर्थ – फरीदा, हे कागों सारा शरीर तुमने नोच डाला है और मांस भी सारा खा लिया है पर मेरी इन दो आंखों को ना छेड़ना, मत छूना। अभी मुझे अपने प्यारे को देखने की उम्मीद है।

भावार्थ -भगवान के भक्त प्रेमी की मानसिकता के बारे में बाबा फरीद कहते हैं, उसके प्रेम में कितने भी कश्ट हों, उन्हें सहकर भी निराश नहीं होते। सांसारिक पदार्थों के सेवन में मांस तो खा लिया अब पिंजर शेश रह गया है। अब इसे वह न खाए। दुहाई देकर कहते हैं कि हे चिंता इन आखों को छोड़ दे। मुझे प्यारे के दर्शन की आस है कि न जाने कब दर्शन हो जाएं। अंतिम समय तक प्रभु मिलन की इच्छा है। चाहे मृत्यु ही क्यों न आ जाए।

बख्शीश सिंह की चारों सूफी कृतियों, ‘बाबा फरीद’, ‘भक्त रविदास’, ‘बुल्ले शाह’ और ‘संत नामदेव’ में इन संतों की अमर वाणी का इसी तरह उल्लेख किया गया है। यह अब तक पहला प्रयास है, जो आम आदमी के लिए बेहद उपयोगी है। अपनी कविताओं और संतों की इन वाणियों को अर्थ और भावार्थ सहित वे संगीतमय ऑडियो प्रस्तुति देने की योजना पर भी काम कर रहे हैं। कविता को वह खुद क्या मानते हैं। इसका जवाब देते हुए बख्शीश सिंह कहते हैं- ‘जज्बात और अहसास की आधी-अधूरी बातें कहने की कोशिश करता हूं और उन्हें कागज पर लाते-लाते उलझ जाता हूं। शायद इसी उलझन में आहिस्ता-आहिस्ता कुछ किरणें फूटेंगी और मेरे बेचैन मन को कुछ चैन मिल सकेगा।

मेरी सोच और
अक्ल में
क्या रिश्ता है
एक नजूमी से पूछा
उसने घूरा
अचरज से, फटी हुई आंखों से
और बोला
उल्लू अपना दिन
अंधेरे में काटता है
और
गिद्ध सूरज को देखते हुए।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. राजेंद्र जी से संपर्क 09549155160 या 09829270160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए कर सकते हैं. राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं.

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