वो जो एचटी दफ्तर के बाहर दस साल से धरने पर बैठे हैं

कल भड़ास वाले यशवंत जी की फेसबुक वाल पर पता चला कि एचटी मीडिया के एक कर्मचारी पिछले दस सालों से धरने पर बैठे हैं. इसके बाद मैंने तय किया कि मुझे भी इनसे मिलना चाहिए. इसी सिलसिले में कनाट प्लेस के हिन्दुस्तान टाइम्स दफ्तर के सामने गया. सुना था कि पिछले 2004 से कोई अपने मैनेजमेंट के द्वारा प्रताड़ित, धरने पर बैठे हैं. एचटी हाउस के गेट पर पहुंचा तो सोचा कि देखूं कि कहां पर धरना दिया जा रहा. पहले तो पता नहीं चला कि कहां बैठे हैं, एचटी मीडिया के गेट के ठीक बगल में गौर से देखने पर ये पता चला कि यहां कोई तम्बूनुमा आकृति विद्यमान है, और जांच पड़ताल के बाद ये मालूम पड़ा कि यही वो धरनास्थल है.

जांच पड़ताल के बाद ये ज्ञात हुआ कि फटा हुआ पोस्टर और फटा हुआ तम्बू दोनों अपने संघर्ष साथियों की बयानी खुद कह रहे थे. 2004 की उस तारीख को जिसे भारतीय संविधान और भारत का आम जनमानस अपने पुनर्जागरण दिवस के रूप में मनाता आया है ठीक उसी दिन यानि हम सभी के जनजागृतकर्ता महात्मा गांधी के जन्मदिवस को हिन्दुस्तान के सबसे समर्थ मीडिया समूहों में से एक हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप ने अपने 362 कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकाल दिया.

भारत में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में, जिसकी जिम्मेदारी समस्त देश को सजग और सही जानकारी देने की है, उसने अचानक एक ऐसा कदम उठाया जिससे आम जनमानस (मजदूर वर्ग जो उससे जुड़ा हुआ था) को उदारीकरण और अपने आर्थिक हितों के चलते अचानक बाहर का रास्ता दिखा दिया. ये 362 कर्मचारी जो उस त्रासदी के शिकार हुए भारत के मीडिया तंत्र की अनियामक स्थिति का दंश झेलने को मजबूर हुए.
 
खैर, हमें इन बातों का यथार्थ में आकलन करना होगा, तो इस धरने के विषय में खोजबीन करने के बाद ये पता चला वे महोदय जो इस विरोध को पिछले 2004 से अब तक ढोते आ रहे हैं वो मौसम की धूप की मार से व्याकुल होकर अंडर सबवे में बैठे हुए हैं. उनसे मिलने गया कि जरा पता चले क्या हुआ था. मिला, नमस्कार करने के बाद जैसे ही बताया कि मैं मीडिया से जुड़ा हुआ हूँ इसी सिलसिले में आपसे बात करना चाहता हूँ तुरन्त बोल पड़े कि मुझे कोई बात नहीं करनी. तुम लोग आते हो अपनी रोटियां सेकते हो चले जाते हो. मैंने कहा अरे दादा हम कोई एनजीओ वाले नहीं, मीडिया से जुड़े हुए हैं. फिर जवाब, कि हाँ मैं जानता हूँ मीडिया वालों को, यहां आते हैं खबर बनाते हैं फिर मैनेजमेंट से बात करके अपनी सेटिंग करते हैं. एक मीडिया वाले की अपने ही पेशे से जुड़े दूसरे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय देखकर मैं चिन्तित हुआ कि मैं किस पेशे में आ गया हूं.

मुझे लग गया कि ये ऐसे बात नहीं करने वाले फिर उन्हीं के साथ वहीं जमीन पर बैठ कर इधर उधर की बात करने लगा. घर के हाल चाल की बात हुई तो उन्होंने बताया कि घर नैनीताल है. कुछ देर हालचाल के बाद जब फिर मुद्दे पर आया तो फिर वो अपनी मीडिया के प्रति नफरत कुछ कम कर चुके थे लेकिन जैसे ही मैं मुद्दे पर आता वो बार-बार कहते कि इस पर बात मत करो. धीरे-2 जो बात निकल कर आयी वो कुछ यूं थी क्यूंकि वो कुछ बताने को तैयार नहीं थे.

हिन्दुस्तान टाइम्स ने 2004 में अपना प्रिन्टिंग हाउस ग्रेटर नोएडा में स्थानान्तरित कर लिया था. लेकिन नयी जगह पर पुराने कर्मचारियों को नहीं रखा जायेगा. वहां संविदा पर लोगों की नियुक्ति की गयी और एचटी मीडिया ने अपने कामकाज को ठेके पर दे दिया. अब ये 362 कर्मचारी कहां जाते इसका ख्याल हिन्दुस्तान टाइम्स प्रबंधन को जरा भी नहीं आया. फिर इन कर्मचारियों ने एचटी से आर पार की लड़ाई का फैसला किया. एचटी मीडिया ने यूनियन के लोगों को तोड़कर अपने साथ मिलाकर लड़ाई को कमजोर कर दिया. फिर भी इन लोगों ने हार नहीं मानी और इस लड़ाई को कोर्ट में ले गये जहां अभी कुछ दिन पहले ही लेबर कोर्ट के द्वारा उनके हक में फैसला सुना दिया गया.

सनद रहे कि उपरोक्त क्रांतिकारी मीडियाकर्मी ने अपना नाम, अपना पता, अपनी फोटो तथा इस विरोध के बारे में कोई भी तर्क वितर्क अथवा कोई बात करने से साफ मना कर दिया. ये जानकारी आप तक तमाम प्रयासों के बाद, मार खाने की हद तक जिद्दी बनने के बाद तथा उनको ये अहसास दिलाने के बाद कि ये किसी मीडिया हाउस के लिये नहीं किया जा रहा है, किसी तरह ये थोड़ी बहुत जानकारी मैं जुटा सका. पुनः उनके पास जाकर और अधिक जानकारी लेकर आप सब तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा कि किस तरह एचटी मीडिया समूह ने अपने कर्मचारियों के साथ बर्ताव किया है.

अगर आप को कभी भी मौका लगे और आप कनाट प्लेस जायें तो कस्तूरबी गांधी मार्ग पर स्थित हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस जायें. किसी दुकान वाले से पूछने पर आपको उनके बारे में मालूम पड़ जायेगा. आप उन्हें ताकत दें ताकि वो इन शक्तिशाली लोगों से लड़ पाने में मजबूती पा सकें.

विवेक सिंह की रिपोर्ट.


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