कर्नाटक में बीजेपी की हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थितियों बीजेपी कोई सबक लेगी? क्या उसके नेता अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कांग्रेस को परास्त करने की रणनीति पर काम करेंगे? आने वाले कुछ ही महीनों में चार बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी भले ही संसद में बहुत हंगामा कर ले, देश के हित में बड़ी बड़ी बयानबाजी कर ले, और भले ही संघ परिवार के सान्निध्य में नैतिकता का नारा देकर गम भुलाने का प्रयास करें, लेकिन बीजेपी कुल मिलाकर पूरी तरह परास्त हो गई है।
एक प्रदेश की हार ने उसे करारा झटका दिया है। उधर, राष्ट्रीय राजनीति में मनोवैज्ञानिक रूप से अपनी इज्जत खो चुकी कांग्रेस को कर्नाटक चुनाव से संजीवनी मिली गई है। इस संजीवनी के सहारे वह बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों को कुछ समय तक करारा जवाब देती रहेगी।
कर्नाटक की करारी हार से बीजेपी एक कदम पीछे आ गई है। जबकि भ्रष्टाचार, महंगाई और चीन के मुददे पर मुंह छुपाती कांग्रेस को कर्नाटक में जीत से मुदित होने का मुखौटा मिल गया है। कांग्रेस इसी मुखौटे से अपने विरोधियों का सामना करेगी। कर्नाटक में सरकार बनाकर बीजेपी ने अपने बूते दक्षिण में सरकार बनाकर एक बड़ी सफलता अर्जित की थी। लेकिन नेताओं की आपसी होड़ और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की मानसिकता के कारण कर्नाटक में लगातार उठा-पटक चलती रही। और इसी कारण कर्नाटक की जिस जनता ने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए बीजेपी को सरकार में लाया था, उसी जनता ने बीजेपी को सड़क पर सुला दिया। राजनीति में, और खासकर चुनावी राजनीति में राजनेता क्या सोचते हैं इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि उनके बारे में जनता क्या सोचती है। ताजा माहौल में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीजेपी को दक्षिण में अपने एकमात्र किले के हाथ से जाने का कितना दर्द है? क्या बीजेपी के बड़े नेता अपना मन बड़ा करने के लिए तैयार हैं?
बीजेपी अकसर इस बात पर बहुत खुश होती रही है कि उमा भारती और कल्याण सिंह की ही तरह बाबूलाल मरांडी, येदियुररप्पा और गुजरात के नेता पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई पटेल जैसे कई नेताओं को बगावत करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ। बात सही है कि बीजेपी से अलग होकर उनको फायदा तो नहीं हुआ, पर इससे बीजेपी को बहुत बड़ा नुकसान हुआ। इतना बड़ा नुकसान कि बीजेपी की आनेवाली कई पीढ़ियां उसका भुगतान नहीं कर पाएंगी। लेकिन बीजेपी के सीरे ही बड़े नेताओं ने अपनी पार्टी से जाते हुए इन सारे ही नेताओं को तो देखा ही, अपनी पार्टी की हुई दुर्गति को भी हंसते-हंसते देखा। उन्हें कोई मलाल नहीं हुआ।
अहम के बिना राजनीति नहीं होती और राजनीति में अहम होता ही है, इसी कारण प्रतिस्पर्द्धाएं भी होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि जहां खड़े हैं, वह जमीन ही धंसती जाए, फिर भी हम अपने अहम पर खुश होते रहें। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही हो रहा है। नितिन गड़करी और गोपीनाथ मुंडे की आपसी जंग बीजेपी को वास्तव में ठिकाने लगाने का ही काम कर रही है। लेकिन बीजेपी को सबसे ताजा और सबसे अधिक नुकसान पार्टी छोड़कर गए पूर्व मुख्यमंत्री येदियुररप्पा के कारण हुआ है। इसी तरह की स्थिति का सामना वाघेला, पटेल, मरांडी, कल्याणसिंह आदि के मामले में बीजेपी पहले भी कर चुकी है। लेकिन सबक न लेने और नेताओं के महत्व को कम आंकने के कारण बीजेपी को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात का उदाहरण सबके सामने है। राजनीति में सबक सीखने के अवसर
हमेशा आते रहते हैं। लेकिन जो लोग समय रहते सीख ले लेते हैं, वे ही हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं। फिर आज बीजेपी जैसा दल अपना अखिल भारतीय नेतृत्व नरेंद्र मोदी में खोज रहा है तो यह उसका अपना मामला है। लेकिन भारतीय राजनीति में लोकप्रियता भी तो कोई अचल संपत्ति की तरह नहीं होती, कि जो जिसकी है, उसी की बनी रहेगी। कर्नाटक की हार से मोदी की लोकप्रियता पर भी तो आंच आई ही है।
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.





