व्यवस्था बड़ी या सुब्रत राय जैसे लोग?

सहाराश्री सुब्रत राय की हठधर्मिता से करोड़ों भारतीयों का एक तरह से बड़ा फायदा हुआ है. और वो ये कि विगत ६० दशकों से किसी न किसी रूप में गरीबों का धन लूटने वाली चिटफंड / पोंजी योजनाओं के गड़बड़झाले खुलते जा रहे है. अब तक ऐसी योजनाओं पर ढुलमुल या चुप्पी साधने वाली सरकारें, अदालतें, रिजर्व बैंक, कार्पोरेट मंत्रालय, सेबी और ऐसी अनेक नियामक संस्थाओं के कमर कसने के साथ स्थानीय पुलिस, प्रशासन भी अपने-अपने स्तर पर कारवाई के मूड में आ गए है जिससे ये उम्मीद बंधने लगी है कि अब ऐसे नटवरलालों के फर्जीवाड़े और ठगी के कारनामे अब शायद न चल पायें और गरीब-अशिक्षित भारतीय लुटाई से बच सकें.

हालांकि अभी दिल्ली काफी दूर है क्योंकि ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जब मनी-मसल्स और सत्ता के गठजोड़ के आगे सरकार को हारना पडा है. ऐसा ही डर इस मामले में भी है क्योंकि इस मामले में ये नटवरलाल दक्ष है. अब सुब्रत राय को ही ले लें, लगभग ८ महीने हो गए है जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निवेशकों के २७ हजार करोड़ रु मय ब्याज के लौटाने के आदेश दिए थे. लेकिन सेबी, सुप्रीम कोर्ट रिजर्व बैंक जैसी संस्थाएं अभी तक अपने आदेशों पर अमल नहीं करा पाई हैं. ज़रा सोचिये भारत का वो ही क़ानून जो किसी की झूठी शिकायत पर किसी भी भारतीय को हवालात में बेकुसूर होने पर महीनों सड़ा सकता है, फर्जीवाड़े सिद्ध होने के बाद भी सुब्रत राय जैसों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं. वो चला रहे है और कोर्ट से लेकर नीति नियामक संस्थाएं घूम रहीं है.

जब सेबी कह रही है, कोर्ट कह रहा है कि नियमानुसार जनता से लिए गए धन को किसी अन्य योजना में नहीं लगा सकते, फिर भी आज सहारा खुलकर इन आदेशों का मजाक उड़ा रही है. कोर्ट कह रहा है कि जनता के धन की सुरक्षित वापसी के कारण राय की गिरफ्तारी के आदेश नहीं दे रहे है =वरना कृत्य तो गिरफ्तारी का ही है और राय इसे जमानत मान कर बजाय धन वापस करने के अपने बचाव में और गोलमाल करने में लगे है, कोर्ट और सेबी दोनों को चुनौती दे रहे है. क्या उनकी सामर्थ्य भारत की हर व्यवस्था से बड़ी है, क्या तुलसीदास सहारा श्री जैसे लोगों के लिए ही समरथ को नहीं दोष जैसी उक्ति गढ़ गए है.

आज सहारा और सहारा जैसी अनगिनत कम्पनियां व्यवस्था की इसी खामी का लाभ उठा कर ऐसी योजनाओं के माध्यम से जनता को लूट रहीं है और हमारा क़ानून मजबूर है. क्या ऐसी व्यवस्था उचित है जिसमें हम अपने देश के गरीब आदमी को लुटने के लिए छोड़ दें…

Harimohan Vishwakarma

vishwakarmaharimohan@gmail.com

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