…शर्म कीजिए डॉक्‍टर हिमांशु!

आत्‍महत्‍या को लेकर अलग-अलग धारणाएं और अलग-अलग मान्‍यताएं हैं, किसी के लिए बेचारगी का सबब है तो मुझे जैसे के लिए यह केवल कायरता है, एक ऐसा काम जिसे लेकर कितना भी बड़ा किंतु-परंतु हो मैं इस कदम से इत्‍तफाक नहीं रखूंगा. खासकर बात जब उस शख्‍स की हो जिसे 98-99 के दौर में सबने जेएनयू के कैंपस बेहद सक्रिय उर्जावान स्‍वरूप में देखा हो, वह शख्‍स जो जेएनयू के कैंपस में अभाविप के बैनर तले चुनाव लड़ रहा था. 

जो जेएनयू को जानते हैं, वे यह बखूबी जानते हैं कि यह वाम अतिवाद के हिमायतियों और शैदाइयों का समुंद्र कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. उस चुनाव का जो भी हश्र हुआ और जितनी विपरीत परिस्‍थितियों में वह चुनाव लड़ा गया, वह एक अलग मसला है, पर वह लड़का केवल मासूम सूरत ही नहीं बल्‍िक बेहद जुनूनी, गंभीरता से लबरेज, सकारात्‍मक धैर्यता और बेहद तार्किक था यह साबित तो उस चुनाव से हो ही गया, यह राहुल शर्मा था. वह एसपी बिलासपुर, जिसने खुद को गोलीमार खुदकुशी कर ली. हां, राहुल आप की खुदकुशी से मैं इत्‍तफाक कभी नहीं रखूंगा. मैं चुप ही रहता और कुछ भी नहीं कहता. अगर्चे डॉ. हिमांशु आपने शब्‍दों की चतुराई भरा प्रस्‍तुतिकरण करते हुए शातिर अंदाज नहीं अपनाया होता.

डॉ. हिमांशु, आपने त्‍वरित टिप्‍पणी लिखी है, राहुल की मौत के तीन दिन बाद. यह आलेख राहुल की मौत पर नहीं, राहुल की मौत के बाद आत्‍महत्‍या रूपी हत्‍या के लिए बकलम राहुल, दोषी जीपी सिंह पर हो रही कार्रवाई और चहुंओर निंदा और जनमानस के बीच तैरते प्रश्‍नों के साथ बढ़ते शिकंजे से उपजी छटपटाहट है, जिसे त्‍वरित टिप्‍पणी के स्‍वरूप से परोसा गया है. पर आप चूक गए हिमांशु. इस प्रदेश में मेरे जैसे जेएनयू को जानने वाले लड़के बस दो-चार ही नहीं हैं, कई हैं. इस प्रदेश में प्रायोजित पत्रकारिता और सत्‍तातंत्र से नियोग करते पत्रकारों को पहचानने वाले भी कई हैं. आप शायद यही बात भूल गए. देखो भैया यह तो सही है कि आत्‍महत्‍या कतई स्‍वीकार्य नहीं है, पर आपकी त्‍वरित टिप्‍पणी केवल यहीं तक केंद्रित रहती तब तो बात भी थी. दरअसल आप तो कुछ और ही कह रहे हैं.

आपकी कलम बडे़ सधे अंदाज में आत्‍महत्‍या को गलत मानने वाले लोगों को समेटती है और बडे़ तरीके से यह बताने की कोशिश करती है कि जीपी सिंह का रिकॉर्ड बड़ा उत्‍कृष्‍ट रहा है. कौन सा उत्‍कृष्‍ट रिकॉर्ड डॉ. हिमांशु यह तो आपने बताया ही नहीं. आप कहें तो मैं बता दूंगा कि यह शख्‍स कहां, किस पद पर रहा और हर बार विवादित ही नहीं विवादों के जनक के रूप में पहचाना गया. अपने लेख में आपने नीति वाक्‍य और सनातन धर्म के पंथ विशेष का उल्‍लेख करते हुए इस कदर खाका खींचा है कि बेचारे जीपी सिंह के साथ बड़ा गलत हो रहा है. गोया कि जीपी सिंह जीते जी शहीद हो रहा है बेचारा.

आपके सीधे-सच्‍चे या यूं कहें कि बिल्‍कुल भोले (?) आईजी साहब बहादुर की शान में आपने जो कसीदाकारी है, वह कोशिश तो बड़ी शानदार है इसमें कोई दो मत ही नहीं, लेकिन मुझ जैसे लौंडों की उम्र से दुगनी आपकी पत्रकारिता की उम्र है. आदरणीय हिमांशु जी, कमाल है कि अगर आप ईरादतन अपमान के लगातार दोहराव के सार्वजनिकरण के मामलों से अनभिज्ञ रहे हैं. कमाल है कि आप पीएचक्‍यू के गुटबाजी से अनजान रहे हैं. कितनी मासूमियत से आप कहते हैं कि ऐसे तो अब थानेदार भी सिपाही को कुछ कहने से हिचकेगा. वरिष्‍ठ अधिकारी मार्गदर्शन करते हैं, अपमान नहीं करते. एसपी के स्‍टाफ को बुलाकर.. थानेदारों को बुलाकर विशेष किस्‍म की हिदायत नहीं देते डॉक्‍टर हिमांशु.. आप कह सकते हैं कि आपको पता नहीं है.

बात क्‍या गजब लिखी है आपने. केवल एक सुसाइड नोट सरकार को एक टांग पर खड़ा कर देता है. और आपके जांबाज आईजी साहब बहादुर को मानसिक यंत्रणा मिल रही है. और उस यंत्रणा के कारण उन्‍हें भी पलायनवादी रवैया अपनाते हुए कुर्सी छोड़ जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है. क्‍या गजब की बात है. दरअसल आप सरकार विपक्ष सबको कखगघ समझा रहे हैं कि जाने दो एक सोसाइडल लेटर की औकात क्‍या है. मर गया तो मरने दो अब उसकी चिठठी पे ध्‍यान देकर कोई जांच कराकर वो जिंदा थोडे़ ही हो जाएगा. है न हिमांशु सर.

यह बात सोचने की है हिमांशु सर, कि जो अधिकारी नक्‍सल प्रभावित इलाकों में कोया कमांडो से लेकर हर मुमकिन रणनीति पर आगे आकर काम करता रहा. वह राहुल शर्मा, जिसने दबाव के आगे झुकने के बजाय इलेक्‍शन आर्ब्‍जवर की ही शिकायत कर दी, जो मीडिया से खुलकर साफ-साफ बात करता था और नक्‍सल मुददे पर क्‍या होना है वह दो टूक बगैर लाग लपेट के कहता था, वह शख्‍स, जो जहां गया उसे लोगों ने हाथोंहाथ लिया. उसने बिलासपुर जैसी जगह में खुदकुशी क्‍यों की वो भी बकौल आपके महज 22 दिनों में. लेकिन आप तो यह भी कहते हैं कि एक सोसाइड लेटर ही तो है..उस लेटर और उसकी दीगर पृष्‍ठभूमि पे आपका बेचारा दुलारा आईजी क्‍यों परेशान किया जा रहा है.

आपने कलम का दुरुपयोग किया है डॉक्‍टर हिमांशु. आपने मुझ जैसे अनुभवहीन लड़कों के विश्‍वास को ही हिला दिया जो आपकी कलम के इस कदर झुक जाने की उम्‍मीद सपने में नहीं करते थे. यह बातें नहीं लिखता अगर ऐसी शातिर हरकत डॉ. हिमांशु के अलावा किसी और ने की होती. मुझे दुख है कि यह आप हैं डॉक्‍टर हिमांशु.. खुद आप. और हां, आपने राहुल के परिजनों से माफी मांगी है कडे़ शब्‍दों के लिए, लेकिन उनके परिजन भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे और आपका पूरा मजमून उस सीबीआई जांच की सीधी हद में आने वाले आईजी साहब बहादुर के प्रति संवेदना से लबरेज है. मुझे नहीं लगता कि राहुल के परिजन इतने भी सहज होंगे कि आपकी कलम की कारीगरी को ना समझ पाएं.

सुनिए डॉक्‍टर हिमांशु द्विवेदी मैं भी माफी मांगता हूं आपसे. माफ कीजिएगा.  लेकिन वो क्‍या है कि सीबीआई जांच की घोषणा तो अब हो गई है. क्‍या है कि वो आपका आईजी साहब बहादुर जनचचर्चाओं में, राहुल के परिजनों की नजर में, राहुल के आखिरी खत में… कमबख्‍त खलनायक तो बन ही गया है. माफ कीजिएगा डॉक्‍टर हिमांशु उसे मैं भी इन सबके कारण खलनायक मानता हूं. विश्‍वास कीजिए मेरा मैंने उसे तब खलनायक नहीं माना जब वह बस्‍तर में कथित नक्‍सलियों के सरेंडर के दावे के साथ था और यह खबरें भी आ गईं कि कहानी फर्जी है. ऐसे ही बहुत कुछ और था जब मैंने उसे खलनायक नहीं माना. पर माफ कीजिएगा डॉक्‍टर हिमांशु द्विवेदी अब तो वह खलनायक मुझे भी लगने लगा है.

और हां.. मैं आपके उस आलेख की जिस इकलौती बात पर सहमत हूं, वह बस राहुल की खुदकुशी का फैसला है. चाहे जो हो उसे यह नहीं करना था. पर हां इसके आड़ में जो कथा आपने बांची है मैं उससे सहमति नहीं रखता. हो सके तो इस असहमति के लिए भी माफ कीजिएगा डॉक्‍टर हिमांशु. क्‍यों कि आप उम्र अनुभव पद सब में मुझसे बडे़ हैं और मेरे संस्‍कार मुझे यह सिखाते हैं कि अपने बुजुर्गों का हमेशा सम्‍मान करो. वर्ना मैं आपसे कहता..'शर्म कीजिए डॉक्‍टर हिमांशु'. 

लेखक याज्ञवल्‍क्‍य वशिष्‍ठ बीते बारह वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. इन दिनों सहारा समय मध्‍यप्रदेश-छत्‍तीसगढ से जुड़े हुए हैं.

 

 
 

 

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