: माया के इशारों पर ताथैया यूपी की मीडिया : क्या हुआ… क्या मिला… क्या किया… एक कंप्लीट कथा : लखनऊ : बसपा सुप्रीमो मायावती को अपने अलावा कोई आवाज नहीं अच्छी लगती है। न संगठन के अंदर न बाहर। पार्टी में प्रवक्ता नहीं है। यह काम सूचना विभाग करता है। बसपा नेताओं को मीडिया या अन्य किसी मंच पर मुंह खोलने की मनाही है। नैतिकता के नाते भी बसपा का कोई नेता विपक्षी दलों के नेताओं से बात नहीं कर सकता है। यहां तक की बसपा नेता अपनी बहनजी के सामने भी तभी जा पाते हैं जब उनकी ‘क्लास’ ली जाती है। जिन नेताओं की क्लास ली जाती है, उनके सामने मुंह लटका कर सुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं रखा जाता है।
मीडिया की अहमियत माया के लिए सिर्फ इतनी भर है कि जब उन्हें अपनी कोई बात मीडिया के माध्यम से जनता से कहनी होती है तो वह उसे बुलाकर अपनी बात रख देती हैं। मजाल है कोई मीडिया कर्मी उनसे सवाल कर सके। सवाल पूछने वाले को बुरी तरफ बेइज्जत करके ही छोड़ा जाता है। इसके पीछे कारण है। माया का हमेशा से मानना रहा है कि उनका वोटर न अखबार पढ़ता है न टेलीविजन में न्यूज देखता है। इसलिए वह मीडिया से क्यों खौफ खाएं। पिछले तीन कार्यकालों में भी माया का यही रंग-ढंग मीडिया के प्रति था और इस बार पूर्ण बहुमत ने उनको और भी अहंकारी बना दिया।
माया सरकार की लाल फीताशाही ने लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले मीडिया का गला घोंटने का काम किया है। छोटे अखबारों को विज्ञापन न देकर जहां उनकी उपेक्षा की। वहीं बड़े अखबारों तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया का मुंह करोड़ों रूपए के विज्ञापन से बंद कर दिया। एक तरफ माया हड़काती हैं तो दूसरी तरफ उनके करीबी अधिकारी मीडिया को आगाह करते रहते हैं कि वह सरकार की छवि खराब करने वाली कोई खबर न प्रकाशित करें और न दिखाएं। शासन में ही बैठे कुछ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि आज के जमाने में राजनेताओं के लिए मीडिया को धमकाना और अपने हित साधना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है।
अब कंधे पर थैला और उसमें कुछ कतरने, टूटे-फूटे चार-छह कलम और अखबारों की प्रतियां, तन पर बिना प्रेस किया पैजामा-कुर्ता और पुरानी चप्पल पहन पैदल या साइकिल लेकर खबरों के लिए निकल पड़ने वाले पत्रकार तो रहे नहीं। आधुनिक पत्रकारिता के दौर में पत्रकारों के कंधों पर थैलों की जगह अब लैपटाप और हाथों में महंगे मोबाइल रहते हैं। साइकिल की जगह मोटरसाइकिल और चार पहिया वाहनों ने ले ली है। एक-एक अखबार के कई-कई संस्करण निकल रहे हैं। पत्रकारिता व्यवसाय बन गया है। कोई जमीन का धंधा कर रहा है। तो किसी के स्कूल खुले हुए हैं। करीब-करीब सभी मीडिया समूह पत्रकारिता की ट्रेनिंग के नाम पर युवाओं से लाखों की फीस वसूलते हैं और बाद में ट्रेनिंग के नाम पर अपने संस्थान में कुछ माह रखने के बाद जगह होने पर वापस बुलाने की बात कहकर हटा देते हैं। ऐसे मीडिया समूह भी हैं जो बैंकिग, रियल स्टेट में अपना अरबों रुपया खपा रहे हैं। सरकारी जमीनों को आधे-पौने दाम पर कब्जाना आम बात है। किसी की चीनी मिले हैं तो कई ट्रांसपोर्ट के धंधे में लगे हैं।
मतलब, साफ है। सबके हित सरकार से सधते हैं तो सरकार अपने हित इन लोगों से साध रही है। गिव एंड टेक के फार्मूले पर काम हो रहा है। किस अधिकारी की पोस्टिंग कहां कराने से फायदा हो सकता है और किसके हटने से नुकसान, इस बात की चिंता ने मीडिया घरानों को तबादला-पोस्टिंग के काम में भी उतार दिया है। अक्सर बड़े मीडिया घरानों को किसी विशेष अधिकारी के पक्ष में लाबिंग करते देखा जा सकता है। अब कौन सी खबर जानी है और कोई सी नहीं। इस बात का फैसला संपादक नहीं अखबार का मालिक और विज्ञापन विभाग करता है। कई बड़े अखबारों में तो मालिक ही सम्पादक बन बैठे हैं। यह और बात है कि पत्रकारिता का कखहरा भी उनको नहीं आता। पत्रकारों को अक्सर खबर लिखने की गाइडलाइन संपादक से नहीं, विज्ञापन विभाग और अखबार मालिक से मिलती हैं। माया सरकार के सामने पूरी तरह नतमस्तक मीडिया के किसी पत्रकार ने कभी मुंह खोलने की हिम्मत भी दिखाई तो उसको मुंह की खानी पड़ी।
बात माया के सत्ता में आने के बाद मीडिया कर्मियों के उत्पीड़न की हो तो कई उदाहरण मिल जाएगें जब पत्रकारों के ऊपर सरकार का डंडा चला। माया ने जब सत्ता ग्रहण की तो राइटर के संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान की मुख्यमंत्री से चलते-फिरते बातचीत हुई। इस बातचीत के आधार पर शरत ने एक साक्षात्कार तैयार किया, जिसका सार था कि मायावती देश का प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, उत्तर प्रदेश की राजनीति तो एक पड़ाव मात्र है। यह साक्षात्कार कई जगह छपा। इसी बीच माया के करीबियों ने उन्हें समझा दिया कि इस साक्षात्कार का गलत असर पड़ सकता है। बस, बहनजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने न केवल खंडन जारी किया बल्कि शरत प्रधान से बात होने तक से इंकार कर दिया। इसके बाद से शरत प्रधान को मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में बुलाना भी बंद कर दिया गया। यह दौर काफी लम्बा खिंचा।
इसी प्रकार की एक और खबर अंग्रेजी समाचार पत्र के लखनऊ संस्करण में छपी। खबर में तथ्यों सहित कहा गया था कि बसपा सरकार प्रदेश में किसी विपक्षी दलित नेता को कोई सभा करने की अनुमति नहीं देती है। दक्षिण भारत से आए संपादक जी ने इस खबर को कायदे से हाईलाइट किया। खबर ‘बहनजी’ को इतनी नागवार गुजरी की अगले ही दिन संपादक जी को बोरिया-बिस्तर बांध कर बैरंग वापस जाना पड़ गया। मीडिया पर उत्पीड़न का सिलसिला यहीं नहीं थमा। जब बहनजी ने अपने खिलाफ लिखने वालों को आड़े हाथों लिया तो उनके नौकरशाहों ने भी अपने आका की राह पकड़ ली। कैबिनेट सचिव शशांक शेखर के खिलाफ मध्य प्रदेश के अलावा लखनऊ से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्र के संवाददाता अरविंद शुक्ल ने लिखना शुरू किया तो पहले तो पत्रकार की मान्यता रद्द कर दी गई, इसके बाद श्री शुक्ल जब प्रेस काउंसिल से अपनी मान्यता बहाल करा लाए तो इस वर्ष उनकी मान्यता फिर रोक दी गई। इसी तरह से प्रमुख सचिव सूचना विजय शंकर पांडेय ने अपने कार्यकाल में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह की न केवल मान्यता रद्द करा दी, वरन उनके सचिवालय प्रवेश को भी प्रतिबंधित करा दिया। एक दौर तो यह भी रहा जब पत्रकारों में ही आपसी गुटबंदी हो गई, जिसका मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसरों ने जमकर लाभ उठाया। ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति मीडिया में खूब अपनाई गई। यही वजह थी कि जब लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ के प्रबंध संपादक निशीथ राय का मकान खाली कराने के लिए उनके और उनके परिवार का उत्पीड़न किया गया, तो कोई भी पत्रकार संगठन सहानुभूति में आगे नहीं आया।
लखनऊ के एक पत्रकार शीलेष त्रिपाठी को शशांक शेखर के विरूद्ध खबर लिखने के मामले में कानपुर की पुलिस ने जेल तक भेज दिया। हरदोई के पत्रकार अजय दी़क्षित ने जब मंत्री अब्दुल मन्नान के भ्रष्टाचार की खबर छापनी शुरू की तो उन्हें ऐसे मामलों में फंसाया गया कि महीनों उनकी जमानत नहीं हुई। ऐसे एक नहीं दर्जनों मामले हैं जिसमें किसी भी पत्रकार संगठन ने पीड़ित पत्रकार की कोई मदद नहीं की।
बसपा सुप्रीमो पत्रकारों के प्रति कितनी कठोर हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अबकी बार उन्होंने पत्रकारों की पेंशन योजना (पत्रकारों की पेंशन के लिए चलने वाली जीवन बीमा निगम की पालिसी की आधी रकम जिसका वहन सरकार करती है) के लिए दिए जाने वाले 20 लाख रूपये के अनुदान पर ही रोक लगा दी। माया के चहेते सूचना निदेशक बादल चटर्जी के अड़ंगे के कारण ऐसा हुआ, जबकि बजट में इसका प्रावधान है। बादल की तरह ही पूर्व में प्रमुख सविच सूचना रहे विजय शंकर पांडेय भी अपने पूरे कार्यकाल में पत्रकारों के हितों की कटौती में लगे रहे, उन्होंने उन पत्रकारों को अवश्य फायदा पहुंचाया जो उनके करीबी थे। बादल और विजय शंकर के बीच की एक और कड़ी हैं आईएएस दिवाकर त्रिपाठी। वह भी कुछ समय के लिए सूचना निदेशक रहे। उनके कार्यकाल में पत्रकारों के साथ सरकार का रवैया कुछ सुधरा दिखा लेकिन वह ज्यादा समय तक इस कुर्सी पर टिक नहीं पाए। श्री त्रिपाठी की छवि पत्रकारों के बीच अच्छी थी, इसका फायदा भी माया सरकार ने भरपूर उठाया। उनके माध्यम से कई सरकार विरोधी खबरों का प्रकाशन रोका गया। दिवाकर रिटायर्ड हो गए तो उन्हें माया ने ओएसडी (प्रेस) बना दिया। वह कुछ समय तक तो इस कुर्सी पर काम करते रहे लेकिन चुनाव नजदीक आते ही समय की नाजुकता भांप उन्होंने इस पद से छुट्टी ले ली। हद तो तब हो गई जब बिजनौर से प्रकाशित होने वाले एक समाचार पत्र के लखनऊ संवाददाता सुधीर लहरी की असामयिक मौत के बाद उनको सरकारी मदद का आश्वासन तो दिया गया, लेकिन एक पैसा भी परिवार वालों को मदद के रूप में नहीं मिल पाया। सुधरी लहरी को इस बात का सदमा लगा था कि उनके काफी प्रयास के बाद भी उन्हें सरकारी आवास आवंटित नहीं हुआ था। लहरी का परिवार अब गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
कुछ माह पूर्व मीडिया से बदसलूकी को लेकर उस समय हो हल्ला मचा जब आईबीएन-7 के पत्रकार से पुलिस कार पार्किंग को लेकर कहासुनी हो गई, जिसे लेकर इलेक्ट्रानिक चैनलों ने दबाव बनाया, नतीजतन, मुख्यमंत्री के सचिव नवनीत सहगल के हस्तक्षेप के बाद संबंधित अपर पुलिस अधीक्षक और क्षेत्राधिकारी को निलंबित कर दिया गया। चूंकि बात बड़े और इलेक्ट्रानिक मीडिया की थी, इसलिए दबाव काम आ गया, जबकि गाजीपुर जिले के एक थाने में ‘भड़ास4मीडिया’ पोर्टल के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह की माता को अकारण अपमानित किए जाने के मामले में पत्रकारों के काफी हाय-तौबा मचाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। राजधानी लखनऊ के एक-दो मामलों को तो प्रशासन-पुलिस ने संज्ञान में ले भी लिया, लेकिन माया राज में पूरे राज्य में पत्रकारों के उत्पीड़न की सैकड़ों वारदातों मे खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
बहरहाल, बात माया की कि जाए तो मीडिया घरानों की नकेल कसने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए पत्रकारों की नकेल कसना काफी आसान हो गया है। माया के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर का काम मीडिया घरानों के मालिकानों को साधने का है तो मुख्यमंत्री के सचिव नवनीत सहगल पत्रकारों के लिए अघोषित रूप से गाइड लाइन जारी करते हैं। यही वजह हैं कई खबरें समाचार पत्रों की डेस्क या फिर पत्रकारों की जेब में ही दम तोड़ देती हैं। मालिकान खबरें छपने ही नहीं देते हैं। सरकार की तरफ से संरक्षण नहीं मिलने के कारण भी पत्रकार ऐसी खबरों को लिखने से कतराने लगे हैं जिससे उनकी नौकरी को खतरा हो सकता है।
बात विज्ञापन के गुणा-भाग की कि जाए तो इस खेल में बड़े अखबार और इलेक्ट्रानिक चैनल लगातार छोटे और मझोले अखबारों का हक मारते रहे हैं। सूचना और जनसम्पर्क विभाग जिसके कंधों पर पत्रकारों के हितों की जिम्मेदारी है, वह सरकार के हितों को साधने में लगा है। हाल के दिनों में माया सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने में पीछे नहीं रही। लखनऊ में तो हर बिजली के खंभे पर माया के चित्र वाली छोटी होर्डिंग (क्यास) लगाई गई हैं। आटो रिफ्लेक्शन वाली इस क्यास की कीमत 7,650 रूपए थी। लखनऊ में ऐसे दो हजार से अधिक क्यास एयर पोर्ट से लेकर वीआईपी मार्ग और गोमती नगर तक में लगाई गई थीं। सभी प्रमुख स्थानों पर दस हजार से तीस हजार तक की कीमत वाली सैकड़ों होर्डिंग साढे़ चार साल तक लगी रहीं। राजधानी लखनऊ के अतिरिक्त गाजियाबाद, नोयडा सहित सभी मंडल मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों पर भी सूचना विभाग द्वारा ऐसे क्यास@होर्डिंग लगवाई गईं थीं। इन होडिंग के निर्माण और संबंधित विज्ञापन एजेंसियों को किराये के रूप में पूरे कार्यकाल में 415 करोड़ रूपए से अधिक का भुगतान सरकारी और गैर-सरकारी स्तर से किया गया। इनमें कई होर्डिंग का किराया तो पांच लाख रूपए वार्षिक तक था। जिन विज्ञापन एजेंसियों को यह होर्डिंग लगाने का कार्य सौंपा गया उसमें मुख्य रूप से दीक्षा, आर्यावर्त, हिन्दुस्तान एडवरटाइजिंग, भारत, कांस्ट्रक्शन तथा नोयडा की ओरिजिंस एजेंसी शामिल हैं।
राज्य के प्रमुख छहः समाचार पत्रों और एक दर्जन इलेक्ट्रानिक मीडिया को चालू वित्तीय वर्ष के आठ माह (एक अप्रैल से 30 नवबंर 11 तक) में विज्ञापन राशि के मद में 33 करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया। इसमें सबसे अधिक दैनिक जागरण को 8.98 करोड़, अमर उजाला को 6.24 करोड़, टाइम्स आफ इंडिया को 1.51 करोड़, दैनिक हिन्दुस्तान को 3.03 करोड़, हिन्दुस्तान टाइम्स को 1.28 करोड़, राष्ट्रीय सहारा को 74 लाख रूपए का भुगतान किया गया। इनमें वह राशि शमिल नहीं है जिसके बिल भुगतान के लिए सूचना विभाग में अभी लम्बित हैं। इसी अवधि में इलेक्ट्रानिक मीडिया के न्यूज चैनल ‘आज तक’ को 2.45 करोड़, ‘एनडीटीवी‘ और ‘स्टार न्यूज’ को डेढ़-डेढ़

अजय कुमार
लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.






