शहीद बाबूलाल की अंत्‍येष्टि के बाद उपजे सवाल दर सवाल

झारखंड में नक्सलियों के हाथों शहीद हुए इलाहाबाद के सपूत बाबूलाल की अंत्‍येष्टि पैतृक गांव शिवलाल के पूरा के पास स्थित श्रृंग्वेरपुर गंगाघाट पर हो गई। हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने गम, गुस्सा के माहौल में आंसुओं से नम आंखों से शहीद बाबूलाल को आखिरी विदाई दी। झारखंड के लातेहार जिले में सीआरपीएफ चौकी पर तैनात बाबूलाल पटेल (26 वर्ष) नक्सलियों की गोलियों का शिकार हो गया। 11 जनवरी को दोपहर डेढ़ बजे जैसे ही शहीद का शव नवाबगंज क्षेत्र स्थित पैतृक आवास शिवलाल का पूरा गांव पहुंचा, उपस्थित नौजवानों के जोशीले नारे फिजाओें में गूंजे- ‘बाबूलाल की यह कुर्बानी, याद करेगा हिंदुस्तानी।’

जिस बेटे को छुट्टी पूरी होने के बाद महीने भर पहले दिसंबर में ड्यूटी वापसी पर माता जगपती देवी, पिता मुन्नीलाल और पत्नी रेखा ने घर से विदा किया था, अचानक उसकी लाश की वापसी देख उनका कलेजा मुंह को आ गया। परिवार का इकलौता चिराग बुझ गया। पांच बहनों के बीच इकलौता भाई, दस महीने पहले ब्याह कर ससुराल आई चार माह की प्रेगनेंट रेखा के सामने अंधेरा ही अंधेरा है। महज एक बीघे से भी कम खेत पर किसी तरह गुजर-बसर करने वाले परिवार के सामने अनिश्चय भविष्‍य मुंह बाए खड़ा है। आसपास के गांव वालों, इलाकाई नेताओं का दरवाजे पर आकर सांत्वना देने की औपचारिकता का निर्वाह हो रहा है।

उपेक्षा और लापरवाही दर लापरवाही : शहीद बाबूलाल की मौत ने केंद्र, प्रदेश सरकार से लेकर सीआरपीएफ के अफसरों की लापरवाही की पोल खोल दी है। दिल्ली, बलिया और मथुरा जाकर सांत्वना व्यक्त करने वाले सीएम अखिलेश यादव शिवलाल का पूरा गांव भूल गए। यह वही ‘माटी का लाल’ है जिसे नक्सलियों ने गोली मारी, बाद में पेट फाड़ने के बाद भीतर ढाई किलो का बम प्लांट कर दिया था। जवानों के शव पर बम फिट करने की शायद यह पहली वारदात है।

घटना की पुष्टि के बाद जिस दिन शहीद के घर मातम था। पूरा देश मीडिया के जरिए जान गया पर क्षेत्रीय सांसद बसपा के कपिलमुनि करवरिया और सत्ताधारी दल से चुने गए विधायक अंसार अहमद शहीद के शवयात्रा तक में शामिल न हो सके। जिस समय इलाके के सैकड़ों ग्रामीण शहीद के दरवाजे पर सांत्वना देने इकट्ठा हुए थे।

उसी समय इलाकाई विधायक अंसार अहमद सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ शहीद के घर के बगल एक किमी दूर नवाबगंज हाइवे के पास पार्टी के रसूखदार नेता सीएम के चचेरे भाई व सांसद धर्मेंद्र यादव का माल्यार्पण कर उनकी शान में कसीदे काढ़ने के लिए डंटे हुए थे। शहीद के घर आने की जरूरत किसी सपाई ने नहीं समझी। तीन दिन बाद झारखंड से शव आने के बाद उठी शवयात्रा में केंद्र, प्रदेश सरकार का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हो सका। 12 जनवरी को मीडिया की खिंचाई के बाद इलाकाई सांसद और विधायक शहीद के दरवाजे पर सांत्वना देने पहुंचे।

सात जनवरी को नक्सलियों की गोलियों से घायल बाबूलाल ने पत्नी को फोन पर बताया था कि नक्सलियों से मुठभेड़ में वह घायल हो गया है। चार गोलियां लगी हुई हैं। फोन से जानकारी मिलने के बाद बाबूलाल की पत्नी घबड़ा गई। घर में कोहराम मच गया। खबर जंगल में आग की तरह फैली। आसपास के लोग दरवाजे पर जुट आए। इसके बाद बाबूलाल के फोन का संपर्क टूट गया।

सीआरपीएफ अफसरों को बाबूलाल के पिता ने कई बार फोन लगाकर इकलौते बेटे का कुशलक्षेम जानना चाहा पर फोन बार-बार काट दिया। कई घंटे की लगातार कोशिशों के बाद डिप्टी कमांडेट ने बाबूलाल के पिता मुन्नीलाल को बताया कि बाबूलाल को गोली नहीं लगी है। मुन्नीलाल ने रोते हुए फरियाद की, ठीक है साहब उससे बात करा दो। इस पर मुन्नीलाल को बताया गया कि वह लापता है, उसे खोजा जा रहा है। सात से लेकर दस जनवरी की दोपहर तक बाबूलाल के परिजनों को कोई जानकारी तक नहीं दी गई। शहीद के परिजनों और नातेदारों का तीन दिनों में एक एक पल पहाड़ सरीखे बीता। दस जनवरी को दोपहर बाद सीआरपीएफ की तरफ से शहीद के घर सूचना भेजी गई।

क्या राजकीय सम्मान का मतलब यही है?

शहीद का शव मकान की उस डेहरी तक नहीं पहुंच सका, जिस डेहरी पर बाबूलाल पला बढ़ा और जवान हुआ। वजह, घर तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है। शहीद की शवयात्रा में शामिल हुए हजारों लोग जिसमें कई जनप्रतिनिधि, अफसर भी थे, उनको नापदान के कीचड़ और उससे उठती दुर्गंध के चलते नाक दबाकर निकलने को मजबूर होना पड़ा। स्थानीय प्रशासन बुनियादी इंतजाम तक नहीं कर सका। इतना ही नहीं, चिता की लकड़ी तक का इंतजाम शासन-प्रशासन नहीं कर सका। आखिर में घर वालों को चिता की लकड़ी जुटानी पड़ी।

…और बगल से निकल गए प्रो. रामगोपाल

धर्मेंद्र यादव की ही तरह सपा के बड़े नेता, मुलायम सिंह के भाई और मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह के चाचा प्रो. रामगोपाल यादव शहीद के घर के बगल लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग से गुजर गए। 12 जनवरी को विधायक अंसार अहमद शहीद के दरवाजे पर बैठे सांत्वना दे रहे थे, उसी समय खबर पहुंची कि प्रो. यादव शहीद के दरवाजे आ सकते हैं। लोग इंतजार करते रहे और प्रो. यादव के गाड़ी का काफिला हूटर बजता हुआ गुजर गया। परिजनों के जिक्र करते ही चौंकते हुए विधायक ने ही उल्टे सवाल कर दिया-क्या प्रोफेसर साहेब इधर आ रहे हैं। बाद में जिलाध्यक्ष पंधारी यादव से प्रो. रामगोपाल यादव के इलाहाबाद में होने की पुष्टि फोन पर की।

परिजनों की इच्छा

शहीद बाबूलाल के परिजन, नातेदार से लेकर गांव के संगी-साथी तक चाहते हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह को शिवलाल का पूरा गांव आकर सांत्वना दें। शहीद की याद में गांव में शहीद स्मारक बने और हर साल यहां शहीद की याद में मेला लगे। ग्राम प्रधान संजय तिवारी स्मारक स्थल के लिए जमीन देने को तैयार हैं। देखिए यहां के लोगों की यह इच्छा कब तक पूरी हो पाती है।

शहीद के गांव से लौटकर शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

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