शुक्रिया ‘शुक्रवार’, लगा कि लोग पढ़ रहे हैं : आनंद प्रधान

Anand Pradhan : अपने लिखे हुए के प्रभाव पर भरोसा कुछ डिगने सा लगा था…कुछ भी लिखिए, कोई फर्क नहीं पड़ता!! लेकिन इधर साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में दो लेख लिखे और कोई दो सप्ताह से उत्तर भारत के कई छोटे शहरों/कस्बों से बिलकुल अनजान लोगों ने फोन करके उनकी तारीफ़ की और कहा कि आपने आर्थिक सुधारों के बारे में बिलकुल सही लिखा है…इतनी प्रतिक्रियाएं आईं कि हैरान और खुश दोनों हूँ…

क्या इतनी प्रतिक्रियाएं इसलिए आईं कि ‘शुक्रवार’ लेख/टिप्पणी के साथ फोन नंबर भी छापता है?…कारण चाहे जो हो लेकिन इससे पता लगा कि छोटे शहरों/जिलों/कस्बों में न सिर्फ लोग पढ़ रहे हैं बल्कि व्यग्र और बेचैन भी हैं…लगा कि लिखने का अर्थ और प्रभाव अब भी है…शुक्रिया ‘शुक्रवार’… वैसे अखबारों/पत्रिकाओं में लेख/टिप्पणियां लिखते हुए कोई १७ साल हो गए…हालाँकि ‘दिनमान’, ‘जनसत्ता’ और ‘समकालीन जनमत’ में घटनाओं/समस्याओं की इन-डेप्थ रिपोर्टिंग/विश्लेषण १९८५ से शुरू कर दी थी. उससे पहले इंटर-मिडीएट के विद्यार्थी के बतौर १९८३-८५ तक ‘आज’ (रांची) के लिए हजारीबाग से स्ट्रिंगर की तरह खबरें भेजता था…

लेकिन जब लेख/टिप्पणियां लिखनी शुरू कीं तो शुरूआती वर्षों में लोगों की खासकर अपने मित्रों की काफी प्रतिक्रियाएं मिलती थीं…अच्छा लगता था..अब कभी-कभार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं…इसलिए ही अपने लिखे पर शक होने लगा था लेकिन ‘शुक्रवार’ के लेखों पर आए फोन काल्स ने उत्साह बढ़ा दिया है… मतलब लोग पढ़ रहे हैं और लिखने का असर होता है…एक टिप्पणीकार को और क्या चाहिए?

आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से साभार.

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