‘शैलेन्द्र चौहान संपादक, प्रकाशक, मीडिया, व्यवस्था किसी के भी प्रिय नहीं’

शैलेन्द्र चौहान की रचनाओं और व्यक्तित्व में ऐसा बहुत कुछ है जो साहित्यकारों को आसानी से हजम नहीं होता। उनकी रचनाएँ सर्वप्रथम जनसंघर्ष के प्रति उद्देश्यपरक मित्रता का सम्बन्ध रखती हैं। वे भावात्मक न होकर विश्लेष्णात्मक होती हैं। वहां नारेबाजी नहीं होती और वे छद्म व पाखण्ड से कोसों दूर होती हैं। शैलेन्द्र की रचनाएँ और भाषा उलझने वाली न होकर सहज होती है। उनकी रचनाओं में सघन व्यंजना होती है। उपमाएं, प्रतीक और बिम्ब शैलेन्द्र के यहाँ जादू न होकर वस्तु जगत के अनुरूप ही आते हैं।

उनका अतिरिक्त आग्रह वहां नहीं होता। दूसरी ओर सत्ता सहयोग की ध्वनियाँ वहां कतई मौजूद नहीं होती। शैलेन्द्र एक खांटी ईमानदार कवि -आलोचक हैं। न वे गलत स्थितियों से समझौता करते हैं न दबाव में ही आते हैं। आज के कवि – लेखक जहाँ छपने के लिए, चर्चा के लिए, सम्मान पुरस्कार पाने के लिए जमीन-आसमान के कुलाबे मिलाने में लगे रहते हैं वहीँ शैलेन्द्र किसी ऐसे अनैतिक उपक्रम में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करते।

उनकी समझ एकदम साफ़ है कि यह सब महज एक अतृप्त कामना का खेल है उन्हें इसमें नहीं फंसना है। वह व्यवस्था के नचाये नहीं नाचते बल्कि उससे आवश्यकतानुसार सीधी मुठभेड़ करते हैं जबकि एनी इन स्थितियों से कतराते हैं और समझौते का रास्ता अपनाते हैं। इसिलए संपादक,प्रकाशक, मीडिया, व्यवस्था इनमें से शैलेन्द्र किसी के प्रिय नहीं हैं। उनसे सर्वाधिक दुखी उनके समकालीन रचनाकार तो रहते ही हैं ऐसे नामवर भी उनसे दुखी रहते हैं जिन्होंने अपने गढ़ और मठ बना रखे हैं। शैलेन्द्र चौहान इनके बीच में अकेले दिखते हैं पर वह कभी अकेले नहीं होते। सामाजिक प्रतिबद्धता उन्हें सदैव जन सामान्य के करीब रखती है और जन सामान्य को उनके करीब।

विनीता शर्मा

भ्रमर अपार्टमेंट
दिलशाद गार्डन
दिल्ली
Vinita Sharma
vinita_2010@yahoo.in

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