शैलेय के उपन्यास ‘‘हल़फनामा’’ के लोकार्पण के बहाने विस्थापन पर गंभीर मंत्रणा

रुद्रपुर (उत्तराखण्ड)। ‘‘विस्थापन आज समाज में सबसे भयानक रूप में व्याप्त है। महज जल, जंगल, जमीन से ही लोग महरूम नहीं हो रहे हैं, अपितु संवेदना, सृजनशीलता, सरोकार तक से विस्थापित हो रहे हैं। इसमें सारी आबादी डूब रही है। इंसानियत तक से विस्थापन हो रहा है। दरअसल विस्थापन शोषण का उपकरण है।’’ ये कहना है प्रसिद्ध इतिहासकार और संस्कृतिकर्मी डा. लाल बहादुर वर्मा का। मौका था सुपरिचित कवि एवं कथाकार शम्भू पाण्डे ‘शैलेय’ के उपन्यास ‘‘हल़फनामा’’ के लोकार्पण पर आयोजित विचार गोष्ठी का। विषय था ‘‘विस्थापन, विस्थापित और न्याय’’।

रविवार, 14 अक्टूबर को स्थानीय शहीद भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में कला, साहित्य और संस्कृति के मंच ‘उजास’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी के दौरान उपन्यास ‘हलफ़नामा’  (आधार प्रकाशन, पंचकूला,  हरियाणा से प्रकाशित) का विमोचन डा. वर्मा, प्रो. भूपेश कुमार सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार डा. दिनेश पाठक तथा सामाजिक कार्यकर्ता मुकुल ने किया।

अपने सारगर्भित वक्तव्य में डा. वर्मा ने कहा कि न्याय कोई निरपेक्ष शब्द नहीं है। जबतक दुनिया में समरूप समाज नहीं होगा, तब तक आमजन न्याय से वंचित रहेंगे। आज का समय जितना संश्लेषण का है उतना ही विश्लेषण का भी है। हल़फनामा की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि नायक एक व्यक्ति न होकर एक दम्पत्ति है, जिनके बीच याराना है। दूसरा, इसमें परिस्थितियां पात्रों का विकास करती हैं और निजी प्रतिशोध को सामूहिक संघर्ष तक पहुंचा देती हैं। याराना दुनिया का सबसे जनतांत्रिक रिश्ता है, यदि दुनिया के सभी लोगों में याराना (दोस्ताना संबंध) कायम हो जाए तो यह दुनिया बेहद खूबसूरत हो जाएगी और मानव की अधिकतम समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

टिहरी विस्थापितों पर केंद्रित इस उपन्यास पर बात करते हुए डा. पल्लवी मिश्रा ने इतिहास और वर्तमान के विस्थापनों, विस्थापितों की विविध स्थितियों का विस्तार से वर्णन किया। प्रो. भूपेश कुमार सिंह ने कहा कि एक के बाद एक हमारे अधिकार छीने जा रहे हैं तो केवल इसलिए कि सरकार हमारी नहीं है। उन्होंने कुछ वक्ताओं की अस्पस्टताओं पर प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहा कि सारे तर्क पक्षधरता से तय होते हैं। उन्होंने विस्थापन को एक त्रासदी बताते हुए कहा कि जब निर्णय की प्रक्रिया में लोगों की भागेदारी होगी तब यह देशाटन बन जाएगा। उन्होंने ‘हल़फनामा’ को संघर्षों की गवाही बताया – सरीक की ग़वाही, फ़रीक़ की गवाही।

मुकुल ने भू-अधिग्रहण और विस्थापन पर सरकारी षड्यंत्रों की विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि बांधों, खदानों, कारीडोर परियोजनाओं, एक्सप्रेस-हाइवे से लेकर सेज तक विस्थापन की नयी इबारत बन गये हैं। कहा कि बाजार के विस्तार के लिए जो सेज और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए भू-अधिग्रहण किया जा रहा है, उसमें भारतीय संविधान के नियमों और अंग्रेजों के बनाए कानूनों का भी पालन नहीं किया जा रहा। विरोध के हर स्वर को कुचलना व फर्जी मुक़दमों में फंसाना आम बात बन चुकी है।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार डा. दिनेश पाठक ने टिहरी की खूबसूरती से तबाही तक का चित्रण किया। उन्होंने कहा कि शैलेय का उपन्यास बड़ी खूबसूरती से बताता है कि जो जमीन के मालिक नहीं हैं उनके लिए न पुनर्वास है न मुआवजा। संगोष्ठी में दिनेश कर्नाटक, डा. आर.के. सिंह, डा. सिद्धेश्वर सिंह, रूपेश कुमार सिंह, कस्तूरीलाल तागरा, शिवजी धीर आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन दीपा पांडे ने किया।

संगोष्ठी में ललित सती, ललित मोहन तिवारी, सुभाष छाबड़ा, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, मनोज आर्य, नबी अहमद मंसूरी, प्रकाश भट्ट, विवेक पांडे, अविनाश गुप्ता, पद्यलोचन विश्वास, खेमकरण ‘सोमन’, डा. रूमा शाह, हरीशचंद्र पाठक, खीम सिंह, पान सिंह, पुष्पा गैड़ा, सोनिका, अमर सिंह, प्रभुनाथ मिश्रा, दिनेश जोशी सहित तमाम शिक्षक, साहित्यप्रेमी, लेखक-पत्रकार, छात्र-छात्राएं आदि मौजूद थे।

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ की रिपोर्ट.

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