श्यामरूद्र पाठक कोई सिरफिरे नहीं, आईआईटी के टॉपर हैं और यूपीएससी की परीक्षा भी मैरिट में पास की थी

श्यामरूद्र पाठक नाम के 'खतरनाक अपराधी' को 24 जुलाई को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया जाएगा। फिलहाल तिहाड़ जेल में बन्द श्यामरूद्र पर आरोप है कि उसने उच्च न्यायालयों में न्याय की प्रक्रिया भारतीय भाषाओं में भी सुनिश्चित करने के लिए यूपीए की शक्तिपीठ 10 जनपथ के सामने सत्याग्रह करके केन्द्र की सत्ता के नियंताओं की नींद में खलल डाला, देशप्रेम के नारे लगाकर अशांति फैलाई।

पाठक ने संविधान के अनुच्छेद 348 के प्रावधानों में संशोधन की मांग को लेकर 226 दिन तक गांधीवादी तरीके से सत्याग्रह चलाया। 17 जुलाई को उन्हें शांति भंग के अपराध में दफा 151 के तहत गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया गया। देश का मीडिया चुप। राजनीतिक दलों के नेताओं को टीवी चैनलों के स्टूडियो से फुरसत नहीं और सत्ताधारी दल के बारे में क्या कहें, एक सत्याग्रही को खतरनाक कैदी की भांति गिरफ्तार करके तिहाड़ भेजने का फैसला उसी का है।

श्यामरुद्र पाठक कोई सिरफिरे नहीं और न ही सुर्खियों में आने के प्रेमी। वे आईआईटी के टॉपर हैं और यूपीएससी की परीक्षा भी मैरिट में पास की थी। मल्टीनेशनल्स में नौकरी कर रहे होते तो उनके स्तर के स्कालर का पैकेज एक से दो करोड़ रुपए सालाना का होता। सरकारी नौकरी में होते तो वरीयता के आधार पर किसी प्रदेश के मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी बनने की स्थिति में होते। उन्होंने मल्टीनेशनल्स के मोटे पैकेज और कलेक्टरी की नौकरी को लात मारकर देश की 97 फीसदी अवाम की आहत अभिव्यक्ति बनना स्वीकार किया। उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं की स्थापना की लड़ाई पढ़ते वक्त ही छेड़ दी थी। आईआईटी में उन्होंने शोध प्रबंध के लिए जब हिन्दी भाषा चुना तो शिक्षा और सत्ता में बैठे लाट साहबों की भंवे तन गई।

मामला संसद में गूंजा और हाईकोर्ट पहुंचा, अन्तत: आईआईटी में पहली बार भारतीय भाषा में लिखे गए शोध प्रबंधन को मान्यता मिली। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में अंग्रेजी के अलावा भारतीय भाषाओं को शामिल करवाने की सफल लड़ाई श्यामरुद्र पाठक ने ही लड़ी, उसी तरह यूपीएसी में भी भारतीय भाषाओं का अभियान छेड़ा गया और सफलता मिली। श्री पाठक ने ये लड़ाइयां एकल योद्धा के रूप में प्रचारतंत्र से दूर रहते हुए लड़ीं। उनके ख्वाब में न तो अन्ना या रामदेव जैसी प्रचार की लालसा है और न ही केजरीवाल सरीखी राजनीतिक महत्वाकांक्षा। उनका लक्ष्य वस्तुनिष्ठ और स्पष्ट है और वह यह कि अपनी भाषा में न्याय जो कि हर भारतवासी का नैसर्गिक अधिकार है।

संविधान का मूलपाठ तैयार करने के बाद डा. बी.आर. अम्बेडकर ने कहा था कि यह संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं, सर्वजन हिताय यदि आवश्यक हो तो बिना लागलपेट के इसमें संशोधन किए जाने चाहिए। भारतीय संविधान लागू होने के बाद एक के बाद एक अनेक संशोधन हुए लेकिन इन संशोधनों का मन्तव्य राजनीतिक ज्यादा रहा सर्वजन हिताय कम। साहबानो केस और हाल ही में पदोन्नति में आरक्षण के मामले में यही हुआ। गिरफ्तारी के बहाने श्यामरूद्र पाठक की संविधान के 348 वें अनुच्छेद में संशोधन की मांग ऐसे मौके पर आई, जब राजनीतिक दलों में जनप्रनिधित्व कानून के उस प्रावधान में संशोधन की सहमति बनाई जा रही है जिसके तहत अपराध दर्ज होने, हिरासत में रहने और सजा पड़ने पर चुनाव लड़ने में रोक, सदस्यता से बर्खास्तगी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है। संभव है कि संसद के पावस सत्र में इस आशय की पहल भी हो। श्यामरूद्र पाठक का सत्याग्रह भारतीय राजनीति के दोगले चरित्र और जनविरोधी मन्तव्यों का पर्दाफाश करता है।

मैंने संविधान की किताब को तफ्सील से नहीं पढ़ा, पर मोटे तौर पर जिन प्रावधानों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी है, उसके अनुसार कई विरोधाभाषी बातें उभरकर सामने आती है, उदाहरण के तौर पर अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिन्दी होगी। जबकि अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे। हिन्दी के प्रसार की वकालत करने वाले साइनबोर्ड हर सरकारी दफ्तर में मिल जाएंगे, पर दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के 65 साल बाद भी सुप्रीमकोर्ट की किसी भी कार्यवाही में हिन्दी व भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर पूर्णत: प्रतिबंध है। यह प्रतिबंध संविधानिक व्यवस्था में ही सुनिश्चित किया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 348 के खण्ड 1 के उपखण्ड (क) में कहा गया है कि सुप्रीमकोर्ट और प्रत्येक हाईकोर्ट में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। हालांकि इसी अनुच्छेद के खण्ड 2 के तहत किसी राज्य का राज्यपाल यदि चाहे तो राष्ट्रपति की सहमति से हाईकोर्ट में हिन्दी या उस राज्य की मान्य भाषा में प्रयोग की अनुमति दे सकता है। पर ऐसी अनुमति उस हाईकोर्ट पर दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होती। यदि संविधानिक प्रमुख चाहें तो भी भारतीय भाषाओं के प्रयोग का दायरा बेहद सीमित है।

भाषायी व्यवहार के मामले में संसद की स्थिति सुप्रीमकोर्ट व हाईकोर्ट से भिन्न है। संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है। श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुने अथवा हिन्दी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें जो उन्हें उसी समय उपलब्ध कराया जाता है। यह स्थिति कितनी विडम्बनापूर्ण है कि संसद में राजनेताओं ने अपनी सुविधानुसार व्यवस्थाएं करवा ली लेकिन न्यायालय जहां आमजनता का सबसे ज्यादा वास्ता पड़ता है वहां अभी भी उसे उसकी जुबान में न्याय नहीं मिलता। यहां अंग्रेजी शोषण का सबसे संगठित व्यवसाय है। संविधान में व्यवस्था तो है कि हर नागरिक अपने मुकदमें की स्वयं पैरवी कर सकता है, वहीं दूसरी ओर उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी की अनिवार्यता उसे इस संवैधानिक अधिकार से वंचित करती है। देश में न्याय इसीलिए महंगा है। साधारण व्यक्ति ऊंची फीस देकर महंगा अंग्रेजीदां वकील नहीं कर पाता, इसलिए हिन्दुस्तान की जेलें गरीबों के लिए बनी है और उसे उसकी संपत्ति से बेदखल कर दिया जाना या हड़प लिया जाना उसकी नियति।

…पढ़ने के लिए न्यूज की उपरोक्त कटिंग पर ही क्लिक कर दें…


गांधी के रास्ते पर चल रहे श्यामरूद्र पाठक की यही चिन्ता है और उनके संघर्ष का सबब भी। उनकी लड़ाई देश के 97 फीसदी अवाम की लड़ाई है, आज नहीं तो कल जरूर रंग लाएगी। कारपोरेटी अखबार और हिरोइन की जचकी का लाइव कवरेज करने वाले टीवी चैनल देश की किस्मत नहीं तय कर सकते। यदि वे श्यामरूद्र पाठक और शर्मीला एरोम को नहीं जानते तो न जाने यही उनके लिए बेहतर होगा।

लेखक जयराम शुक्ल हिंदी दैनिक स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *