संजय दत्त को माफी दिए जाने के लिए कुछ तर्क

संजय दत्त को जेल जाने से बचाने के तमाम उपाय नाकाम हो गए। एक प्रभावशाली व्यक्ति की रक्षा में देश के कई असरदार और पैसेवालों के खुलेआम सामने आने के बाद भी संजय दत्त को जेल जाना ही पड़ा और समर्पण समय में तो वे और उनके मित्रणगण अदालत पहुंचने के लिए पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ते भी देखे गए। अब जब वे जेल में हैं तो यह पूछा जा सकता है कि सजा माफी के लिए संजय दत्त से अच्छा पात्र कौन है?

संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट से हुई सजा को माफ किए जाने के सवाल पर लोगों की अलग अलग राय है। कुछ लोग इसे माफ किए जाने के पक्ष में हैं जबकि काफी लोगों का साफ मानना है कि सजा माफ नहीं होनी चाहिए। और संजय दत्त की सजा माफ किए जाने की बात इसलिए हो रही है कि वह बड़ा आदमी है। अब जब संजय गांधी ने समर्पण कर दिया है और जेल चले गए हैं तो भी यह मुद्दा खत्म नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि देश के संविधान में अगर सजा माफी का प्रावधान है तो वह किसके लिए है। और इसकी पात्रता कैसे तय होगी। अगर संजय दत्त इस माफी का हकदार नहीं है तो कौन हो सकता है।

संजय दत्त को माफी की बात करते ही लोग न्यायमूर्ति काटजू पर पिल पड़े थे और उन्हें सफाई भी देनी पड़ी थी।  जनता के दबाव के कारण ही उन्होंने एक अन्य अभियुक्त जैबुनिसा को भी माफी का हकदार माना है। संजय दत्त को माफी की बात चली तो जैबुनिसा को भी इसका हकदार बताया गया और यह अच्छी बात है कि संजय दत्त के साथ जैबुनिसा को माफी देने का मामला भी उठा है और न्याय का तकाजा है कि वह सुपात्र है तो उसे भी माफी मिले। पर मूल मुद्दा संजय दत्त की पात्रता का है। संजय दत्त के साढ़े तीन साल जेल में रहने से उसका, उसके परिवार, उसपर आश्रित लोगों, फिल्म उद्योग, उसके प्रशंसकों का चाहे जितना नुकसान हो जाए, देश का कोई भला नहीं होने वाला है। और ना ही इससे यह साबित होने जा रहा है कि सरकार फैसले करने लगी है या या भी कि अपराधियों को सजा मिलेगी ही।

दूसरी ओर, वह जेल के बाहर रहेगा तो लाखों कमाएगा, टैक्स भी देगा, लोगों का मनोरंजन भी करेगा और उसके साथ कइयों का घर भी चलेगा। संजय दत्त को माफी दिए जाने के पक्ष में अगर कोई तर्क है तो यह भी उनमें है जो दूसरे साधारण या गरीब कैदियों के मामले में नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनसे कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन प्राथमिकता या क्रम तो तय करना पड़ेगा। जहां तक गरीबों का सवाल है, मेरा मानना है कि उनके लिए जो जरूरी है वह भी हो ही रहा है और अगर पूरा नहीं हो रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि किसी बड़े, अमीर को उसके बदले परेशान किया जाए या वाजिब माफी जैसी सुविधा से वंचित किया जाए।

वैसे भी, गरीब कहां सुप्रीम कोर्ट तक लड़ पाता है। कई लोग तो जमानत की राशि या जमानती का बंदोबस्त भी नहीं कर पाते हैं इसलिए जेल में पड़े रहते हैं। दूसरी ओर, जायज तरीके से जमानत लेकर भी लोग भाग जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जो जमानती ला सकते हैं उन्हें जमानत न दी जाए। आम लोगों या साधारण कैदियों-अपराधियों के लिए कई गैर कानूनी तरीके भी हैं जिनका वे उपयोग करते हैं। वैसे तो यह तुलना करने वाली बात नहीं है फिर बात चली है तो, क्या आप जानते हैं कि कितने लोग जेल तोड़कर, सुरंग खोदकर, पेशी पर ले जाने के समय ऐसे-वैसे, जमानत या पैरोल पर छूटने के बाद फरार हो जाते हैं। ऐसे गरीब, साधारण अपराधी नाम बदलकर या वैसे भी कहीं और बस जाते हैं। लगभग चैन की जिन्दगी जीते हैं। इसमें बिट्टी मोबंती का मामला उल्लेखनीय है। हालांकि वह भी साधारण कैदी की श्रेणी में नहीं आएगा पर संजय दत्त के मुकाबले तो कम रसूख वाला है ही। फिर भी वह पकड़ा गया तो कहने की जरूरत नहीं है कि सही या गलत, संजय दत्त के पास यह विकल्प नहीं है।

तर्क प्रस्तुत करने, उसका जवाब देने, उसे  काटने और काटे को बेअसर  करने वाली दलीलें ही सुनवाई हैं। इसके आधार पर जरूरी नहीं है कि सभी फैसले सही ही हों। ऐसा नहीं है कि निर्दोष  को सजा नहीं होती। निचली अदालतों के फैसले ऊपर की अदालतों में बदले और पलटे ही जाते हैं पर जो ऊपर की अदालत तक जा ही नहीं पाते वे तो सजा भुगतते ही हैं। यह सब तब हो रहा है जब न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि दोषी छूट जाए तो छूट जाए, निर्दोष को सजा न हो। इसीलिए, अपील का प्रावधान है। इसके साथ ही न्याय में देरी का मतलब है, न्याय न होना। फिर भी न्याय देने में देरी हो ही रही है। संजय दत्त का मामला भी कोई आज का नहीं है। इसके अलावा उसपर आरोप तो कई सारे ठोक दिए गए थे। पर सब साबित नहीं हुए। बाकी के लिए उसका जो अपमान हुआ, जो परेशानी हुई, उसे गलत साबित करने में जो खर्च हुआ उसकी भरपाई कैसे होगी।

माफी देना न्याय करना नहीं है। यह पूरी तरह, माफी देने वाले के विशेषाधिकार का मामला है।  यहां फैसला विवेक से होता है जो विशेषाधिकार भी है। न्याय करने और माफी देने में फर्क है। न्याय करने के लिए तथ्य चाहिए माफ करने के लिए भावना या कह सकते हैं बहाना। माफी मांगने के लिए तो न वकील करने की जरूरत है और न शारीरिक रूप से माफी देने वाले के पास जाने की। गरीब भी माफी मांग सकता है। मांगता भी है। फिर संजय दत्त कैसे माफी से अयोग्य हो गए। आइए अब जरा माफी देने वाले की बात करें। जैसा न्यायमूर्ति काटजू ने कहा है, ‘‘अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 राज्यपाल को माफ करने का अधिकार देता है। और ये दोनों अनुच्छेद इसका उल्लेख नहीं करते हैं कि कौन अपील कर सकता है। यह भी नहीं लिखा है कि किन बुनियादों पर माफी दी जा सकती है।”

ऐसे में मामला पूरी तरह माफी देने वाले के विवेक पर निर्भर है।  संजय दत्त को माफी दे सकने वाली दो हस्तियां हैं, महाराष्ट्र के राज्यपाल और देश के राष्ट्रपति। राष्ट्रपति की बात न करें तो देश में कैसे-कैसे राज्यपाल हुए हैं और राजभवनों में क्या कुछ होता रहा है यह किसी से छिपा नहीं है और कहा जा सकता है कि राजभवन में रहने वालों ने जो अपराध किए हैं, संजय दत्त का अपराध उससे ज्यादा नहीं है। सजा पहले भी माफ हुई है। और छोटे मोटों की क्या बात करें देश के मंत्री एक नहीं, तीन-तीन खूंखार अपराधियों को बाइज्जत विशेष विमान से उसके साथियों के पास पहुंचाने का महान करतब कर चुके

संजय कुमार सिंह
संजय कुमार सिंह
हैं। तब सारा देश सांस रोक कर इंतजार कर रहा था कि अब क्या होगा। तब शायद ही किसी ने कहा हो खूंखार अपराधी पहले ही कितनों को मार चुका है, आगे पता नहीं क्या करे, इसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इससे पहले भी देश के गृहमंत्री की बेटी के बदले खूंखार अपराधी छोड़े जा चुके हैं। अधिकारियों को छोड़ने-छुड़ाने के लिए छोटे-मोटे कई सौदे होते रहते हैं। पर संजय दत्त को माफी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वह यह सब नहीं करेगा, नहीं कर सकता है। 

लेखक संजय कुमार सिंह हिंदी दैनिक जनसत्ता में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के बतौर सक्रिय हैं और अनुवाद का काम उद्यम के तौर पर संचालित कर रहे हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या 09810143426 के जरिए किया जा सकता है.

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