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संजय शर्मा यानि हिंदी पट्टी का एक सेल्फमेड पत्रकार, संपादक और मालिक

Yashwant Singh : जबसे लखनऊ से लौटा हूं, Sanjay Sharma भाई के कार्यक्रम से, तभी से सोच रहा हूं कि एक रिपोर्ट मैं भी इस पूरे आयोजन के बारे में लिखूं. पर अभी तक लिख न पाया. भाई Ashok K Sharma जी का वीकएंड टाइम्स और संजय शर्मा पर लिखा एक सचित्र स्टेटस देखा तो लगा कि चलो मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूं, इन्हीं के स्टेटस को शेयर करके धर्म का निर्वाह कर लूं. पर अब लग रहा है कि मैं भी कुछ बातें मन की संक्षेप में कह ही दूं, शेयर कर ही लूं आप सभी से… वो ये कि…

Yashwant Singh : जबसे लखनऊ से लौटा हूं, Sanjay Sharma भाई के कार्यक्रम से, तभी से सोच रहा हूं कि एक रिपोर्ट मैं भी इस पूरे आयोजन के बारे में लिखूं. पर अभी तक लिख न पाया. भाई Ashok K Sharma जी का वीकएंड टाइम्स और संजय शर्मा पर लिखा एक सचित्र स्टेटस देखा तो लगा कि चलो मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूं, इन्हीं के स्टेटस को शेयर करके धर्म का निर्वाह कर लूं. पर अब लग रहा है कि मैं भी कुछ बातें मन की संक्षेप में कह ही दूं, शेयर कर ही लूं आप सभी से… वो ये कि…

– उत्तर भारतीय हिंदी बेल्ट में जहां नौकरी करने और नौकरी करने के लिए किसी भी स्तर पर गिर जाने की मानसिकता है, वहां संजय शर्मा ने एक मिसाल कायम किया. खुद का अखबार निकालने. शासन-सत्ता से आर्थिक सहयोग न के बराबर लेने और शासन-सत्ता को ठोंकने के मामले में किसी भी स्तर पर कंप्रोमाइज न करने. यही कारण है कि दस साल में वीकएंड टाइम्स को यूपी सरकार की तरफ से सिर्फ साठ हजार रुपये के विज्ञापन मिले हैं जबकि अनजाने से अखबार वाले लाखों रुपये झटक लेते हैं.

-संजय शर्मा ने अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे जुटाकर प्रिंटिंग मशीन ले आए और ढेर सारा जाब वर्क मोबलाइज किया, अपनी मेहनत और भागमभाग से. इस तरह वो अखबार को अपने पांव पर खड़ा कर सके. यही हम लोग भी कहते रहे हैं कि अगर आप पत्रकारिता में जीने खाने भर नहीं पा रहे हैं या लालाओं के यहां रीढ़ निकालकर काम करने को मजबूर हो रहे हैं तो पहले खुद का एक आर्थिक जरिया डेवलप करिए और फिर अपने पत्रकारिता के पैशन को ब्लाग, वेब, मैग्जीन, वीकली अखबार आदि के जरिए पूरा करिए, जैसी आपकी आर्थिक स्थिति हो.

-लखनऊ में शासन-सत्ता और ब्यरोक्रेटों को लेकर मीडिया में छाई घनघोर चुप्पी के बीच संजय शर्मा गाहे-बगाहे कुछ हंगामा, सवाल करते रहते हैं. ऐसा तभी संभव है जब इनकी पूंछ किसी सरकारी तंत्र के तले न दबी हो. यानि जब आप सरकारी मकान, सरकारी अनुदान, सरकारी ज्ञान से दूर रह पाने में सक्षम होंगे तो आप खुद ब खुद साहस के साथ अपने मन मिजाज के सवाल, तर्क, स्टोरी पर काम कर सकेंगे और अपने यहां छाप सकेंगे.

-संजय शर्मा ने वीकएंड टाइम्स के दसवें साल में प्रवेश करने के मौके पर लखनऊ में जो आयोजन किया वह कई मायनों में अदभुत रहा. खुद संजय ने अपनी संघर्ष गाथा, अपने आर्थिक स्रोतों, अपने कष्ट के दिनों, अपने अतीत के अनुभवों को एक-एक कर विस्तार से रखा और सैकड़ों लोगों ने तालियां बजाकर उनकी हौसलाअफजाई की.

-संजय ने कई नई घोषणाएं भी की. जैसे ये कि इस साल यह अखबार दिल्ली से भी प्रकाशित होगा. यह भी कि यह अखबार आल पेज कलर होगा. ये स्वागतयोग्य है. यह दिलासा दिलाता है कि हमारे आप जैसा आम पत्रकार भी अपनी लगन, मेहनत, जुनून से अपनी मंजिल की तरफ जा सकता है. आगे बढ़ सकता है.

-आयोजन में मीडिया के कारपोरेटीकरण और बिकाऊ होने को लेकर जो बहस हुई, वह श्रोताओं-दर्शकों को काफी कुछ सिखा गई. एक तरफ ओम थानवी और मैंने मुख्यधारा की मीडिया के बिकाऊ होते जाने, पूंजीपतियों की दासी होते जाने के बारे में तर्क सहित बातें की तो दूसरी तरफ एनके सिंह व अजीत अंजुम ने अपने तर्कों से समझाया कि मीडिया को कभी कोई खरीद नहीं सकता और मीडिया वाले कभी अपने रास्ते से नहीं भटक सकते. इन लोगों का कहना था कि पतन चहुंओर है, और मीडिया में भी है. पर इससे निराश होने की जरूरत नहीं. मीडिया ने शानदार काम किया है.

-आयोजन में डेमोक्रेटिक स्पेस भरपूर रहा. एक तरफ जहां मैंने मंच से वीकएंड टाइम्स के विशेषांक में एक फोटो रिपीट होने (के. विक्रम राव के आलेख में हरीश मिश्रा की तस्वीर लगने) का जिक्र कर माहौल हल्का-फुल्का व भड़ासी सा बनाया वहीं आयोजन में शामिल नेताओं ने मीडिया पर प्रहार कर और मीडिया वालों ने नेताओं को उनकी लक्ष्मणरेखा बताकर चर्चा-परिचर्चा को इंटरेक्टिव व जीवंत बनाए रखा.

आखिर में यही कहेंगे कि वीर तुम बढ़े चलो. अपनी कलम और अपने अखबार से न सिर्फ लखनऊ के मोटी चमड़ी वाले पत्रकारों को आइना दिखाओ बल्कि नेताओं, अफसरों और मीडिया के घातक व जनविरोधी गठजोड़ पर भी प्रहार करो ताकि सच्ची पत्रकारिता जिंदा रहे.

लखनऊ में जहां किसी बनिये को पटाकर या किसी बनिये की दुकान बड़ी बनवाने का प्रलोभन देकर या  सरकारी रहमोकरम पर जिंदा रहकर या कारपोरेट के झंडे तले हाइली पेड लेकिन मुंहबंधुवा पत्रकार बनकर पत्रकारिता करने या फिर अपने मालिकों के आर्थिक हितों रूपी सीमा क्षेत्रों को ध्यान में रखकर शासन-सत्ता को लेकर मुंह पर ताला चुप्पी जड़ते हुए पत्रकारिता करने की परंपरा है, वहां पर संजय शर्मा जैसा थोड़ा सेल्फमेड होना, थोड़ जुनूनी होना अलग मायने रखता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


Ashok K Sharma : वक्त धड़कता है इस संपादक की कलम में. वीकेंड टाइम्स लखनऊ को दस साल हो गए, इस दौरान प्रधान संपादक संजय शर्मा की काबलियत इन अंकों में ख़ास तौर से नज़र आयी. बानगी देखिये. किस तरह वीकेंड टाइम्स ने पकड़ी समय की नब्ज़.

(यह टिप्पणी अराजनैतिक तथा अकादमिक है.)

यूपी के सूचना विभाग के अधिकारी अशोक के. शर्मा के फेसबुक वॉल से.


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