संसदीय समिति ने पेड न्‍यूज पर दी रिपोर्ट, पर मीडिया से गायब रही यह खबर

भारतीय मीडिया में पेड न्यूज़ पर एक बड़ी नई रिपोर्ट, बामुश्किल बड़ी खबर बन रही है। पिछले महीने सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिती द्वारा संसद में जमा की ये रिपोर्ट एक मनोहर विषय-वस्तु है। रिपोर्ट में विस्तारपूर्वक बताया गया है कि कैसे अखबार, टेलीविज़न चैनल और रेडियो स्टेशन सकारात्मक खबरों की कवरेज लिए कथित तौर पर पैसा लेते हैं। ये इस बात के लिए नियामक इकाईयों की पिछली रिपोर्टों और मीडिया प्रतिनिधियों, नियामकों और सरकारी अधिकारियों की व्यापक श्रेणी के ताज़ातरीन साक्ष्यों पर निर्भर रही।

रिपोर्ट, जो इस बात को इंगित करती है कि भारतीय मीडिया का आत्म-नियंत्रण पेड न्यूज़ के अभ्यासों को रोक पाने में असफल रहा है, में कुछ ध्यान आकर्षित करने वाले सुझाव हैं। वो ज्यादा शक्तिशाली नियामक और सख्त जुर्माने का सुझाव देती है, जिसमें आपराधिक अभियोग भी शामिल है। रिपोर्ट कहती है कि जो खबरों के लिए भुगतान स्वीकारते हैं, उन्हें जेल की सज़ा होनी चाहिए।

रिपोर्ट में दुविधापूर्ण काम करने के कारण इस मुद्दे से निपटने में असफल रहने हेतु सूचना और प्रसारण मंत्रालय को बुरी तरह फटकार लगाई गई है। रिपोर्ट कहती है कि “पेड न्यूज़ के उद्भव ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तत्वों का अवमूल्यन किया है।” लेकिन लोकसभा में 6 मई को जमा कराए इस दस्तावेज़ को मीडिया में बहुत कम कवरेज मिली। रिपोर्ट में नोट किया गया है कि पेड न्यूज़ का मुद्दा 2009 के राष्ट्रीय चुनावों में मीडिया परिदृश्य का एक कारक बना। रिपोर्ट में कहा गया कि ये आश्चर्यजनक है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस दुष्ट आचरण पर चुप्पी साधे हुए है।

बेनेट कोलमैन ऐंड कंपनी, जिसके पास भारत के सर्वाधिक प्रसार वाले अंग्रेजी दैनिक द टाइम्स ऑफ इंडिया का स्वामित्व है, के मुख्य कार्यकारी रविन्द्र धारीवाल ने कहा कि कमेटी की रिपोर्ट समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर कहती है। “ज्यादातर मीडिया पेड न्यूज़ नहीं चलाता,” श्री धारीवाल ने एक साक्षात्कार में कहा। “ये कहना कि हर एक दागदार है, गलत है।”

बेनेट कोलमैन उन चुनिंदा मीडिया कंपनियों में एक है, जिसका नाम रिपोर्ट में लिया गया है। कमेटी ने 2009 चुनावों के दौरान पेड न्यूज़ के कथित उदाहरणों से संबंधित 2010 में सरकार को आधिकारिक रूप से सौंपी भारतीय प्रेस परिषद द्वारा की जांच के एक हिस्से की दलील दी। उर्द्धत हिस्से में बेनेट कोलमैन को निजी-संधि समझौते का अगुवा करार दिया गया, एक समझौता जिसके द्वारा भारतीय मीडिया कंपनियां एक विज्ञापनदाता की कंपनी में विज्ञापन वाली जगह के लिए भुगतान की एवज़ में इक्विटी हिस्सेदारी स्वीकार करती हैं।

कमेटी की रिपोर्ट में पाया कि इस अभ्यास, जिसका शुरूआती अर्थ मार्केटिंग के लिए भुगतान से था, का इस्तेमाल कंपनियों द्वारा लाभदायक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए किया गया। रिपोर्ट ने किसी भी मीडिया कंपनी का ज़िक्र नहीं किया। श्री धारीवाल ने इन्कार किया कि बैनेट कोलमैन करीब 600 निजी-संधि समझौता साझेदारों के साथ अपने संबंधों को न्यूज़ कवरेज को प्रभावित करने की इजाज़त देती है। “हमारे कई निजी-संधि ग्राहक ऐसा नहीं करने के कारण हमसे नाराज़ हो जाते हैं,” उन्होंने कहा।

भारत की मीडिया को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक इकाई भारतीय प्रेस परिषद ने 2010 की रिपोर्ट में कहा कि उसके दिशानिर्देशों में इस बात का उल्लेख है कि खबरों को स्पष्ट तौर पर विज्ञापनों से अलग करना चाहिए। हालांकि, रिपोर्ट में परिषद द्वारा दिशानिर्देशों की अनदेखी करने वाली मीडिया कंपनियों को सज़ा ना दे सकने पर खेद जताया गया। परिषद के फैसलों को बाध्यकारी बनाने हेतु रिपोर्ट में कानून में बदलाव का सुझाव भी दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि पेड न्यूज़ कानूनी तौर पर सज़ा लायक होनी चाहिए।

कमेटी की ताज़ातरीन रिपोर्ट में ज्यादा शक्तिशाली नियामक की आवश्यकता को दोहराया गया है और परिषद के सुझावों को अनदेखा करने के लिए सरकार की आलोचना की गई है। इसने पाया कि अखबारों को चेतावनी देने, आलोचना करने और निंदा करने की वर्तमान नीति अपर्याप्त है। साथ ही ये भी कहा कि सरकार को जुर्माना लगाने, लाइसेंस के निरसन और बल्कि आपराधिक अभियोग के लिए कानूनी बदलावों पर विचार करना चाहिए।

एक मीडिया कंपनी कितना विस्तार कर सकती है, इस पर भारत में प्रतिबंध के अभाव पर भी रिपोर्ट में चिंता जताई गई। सरकार को एकाधिकार अभ्यासों के विकास को अनदेखा करने के लिए नियमों पर पुनर्विचार करना चाहिए, रिपोर्ट में कहा गया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने इस पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया। मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार उम्मीदतन अगस्त में इसका जवाब तैयार कर देगी।

“ये पहली बार है कि मंत्रालय इस तरह की रिपोर्ट का प्रबंधन कर रहा है,” अधिकारी ने कहा। “ये संवेदनशील मुद्दे हैं।” किसी समाधान पर पहुंचना आसान नहीं होगा, जैसा कि यूके के अनुभव में नज़र आया। यहां, शक्तिशाली मीडिया नियामक खड़ा करने के प्रयास मुक्त संभाषण की बहस में उलझ जाएगें। संसदीय कमेटी बाधाओं को स्वीकारती है। किसी के लिए पेड न्यूज़ को साबित करना कठिन है, वित्तीय लेन-देन पर आधारित होने के कारण वो अकसर अप्रकट होते हैं, रिपोर्ट में पाया गया।

हालांकि, मुद्दा अभी निर्गम नहीं लगता। परिषद ने पाया कि 61 उम्मीदवारों ने दिसबंर में गुजरात चुनावों के दौरान न्यूज़ कवरेज के लिए भुगतान की बात स्वीकार की थी। अब जबकि राष्ट्रीय चुनाव 2014 में होने हैं, मुद्दा निश्चित तौर पर एक बार फिर चर्चा में रहेगा, बेशक वो फीका रहे। (आईआरटी)

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